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Jamshedpur हिमालय का रक्षक: सुंदरलाल बहुगुणा और चिपको आंदोलन की अमर गाथा Protector of the Himalayas: The Immortal Saga of Sunderlal Bahuguna and the Chipko Movement

 


Upgrade Jharkhand News. ​26 मार्च 1974 की वह सुबह उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश का हिस्सा) के चमोली जिले के रेणी गांव में रोज़ जैसी ही थी। पुरुष सरकारी काम और मुआवजे के सिलसिले में शहर गए हुए थे। अचानक जंगल में कुल्हाड़ियों की खनक और बूटों की आवाज गूंजी। ठेकेदारों के आदमी पेड़ों को काटने आ धमके थे। उस दौर में जब दिल्ली और लखनऊ के वातानुकूलित कमरों में 'विकास' की परिभाषाएं गढ़ी जा रही थीं, तब हिमालय की इस सुदूर घाटी में विनाश का एक खेल शुरू होने वाला था।​लेकिन ठेकेदारों के गुर्गों ने यह नहीं सोचा था कि उनका सामना एक ऐसी ताकत से होगा जिसके पास न बंदूकें थीं, न कोई कानूनी महारत। गौरा देवी के नेतृत्व में 27 महिलाओं ने पेड़ों को अपनी बाहों में भर लिया। उन्होंने कहा—"पहले कुल्हाड़ी हमारे बदन पर चलेगी, फिर पेड़ पर।"


​यह 'चिपको आंदोलन' का वह ऐतिहासिक क्षण था, जिसने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया। लेकिन इस आंदोलन को एक विचार, एक दर्शन और एक वैश्विक पहचान देने वाले व्यक्ति थे— सुन्दरलाल बहुगुणा। एक ऐसा तपस्वी, जिसने अपना पूरा जीवन हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी को बचाने में होम कर दिया। मई 2021 में भले ही उनका भौतिक शरीर शांत हो गया, लेकिन आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है, बहुगुणा जी के विचार किसी मरुस्थल में ठंडी हवा के झोंके की तरह प्रासंगिक नजर आते हैं।  देवभूमि का वह तपस्वी,शुरुआती सफर और गांधीवादी संस्कार है।


​9 जनवरी 1927 को उत्तराखंड के टिहरी जिले के मरोड़ा गांव में जन्मे सुंदरलाल बहुगुणा बचपन से ही असाधारण चेतना के धनी थे। महज 13 वर्ष की अल्पायु में वे अमर शहीद श्रीदेव सुमन के संपर्क में आए, जिन्होंने उन्हें स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक न्याय का ककहरा सिखाया।​बहुगुणा जी के जीवन पर महात्मा गांधी और आचार्य विनोबा भावे का गहरा प्रभाव था। जब भारत आज़ाद हुआ, तो कई युवा नेताओं के लिए राजनीति में ऊंचे पद और सत्ता के गलियारे खुले थे। बहुगुणा जी भी चाहते तो सक्रिय राजनीति में एक रसूखदार नाम बन सकते थे, लेकिन उन्होंने अपनी पत्नी विमला नौटियाल के साथ मिलकर एक कठिन रास्ता चुना। विमला जी ने विवाह के लिए एक ही शर्त रखी थी— शहरी और राजनीतिक जीवन को छोड़कर ग्रामीण इलाकों में काम करना होगा।​इस दंपति ने टिहरी में 'पार्वतीय नवजीवन मण्डल' की स्थापना की और दलितों, शोषितों तथा शराबखोरी के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। गांधीवादी दर्शन उनके भीतर इस कदर रच-बस गया था कि उन्होंने खादी पहनी, पैरों में चप्पल की जगह पैदल चलने को तरजीह दी और अहिंसा को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया।


​चिपको आंदोलन,जब पेड़ अर्थव्यवस्था नहीं, पारिस्थितिकी बन गए है।​1970 के दशक तक आते-आते उत्तराखंड के जंगलों की बेरहमी से कटाई शुरू हो चुकी थी। सड़कें बनाने, खेल का सामान बनाने वाली कंपनियों (विशेषकर साइमन कंपनी) को ठेके देने और औद्योगिक मांग को पूरा करने के लिए 'वन विभाग' खुद ही जंगलों का दुश्मन बन बैठा था। इसके परिणामस्वरूप 1970 में अलकनंदा नदी में एक भयानक बाढ़ आई, जिसने पूरे इलाके को तबाह कर दिया। ​सुंदरलाल बहुगुणा और उनके सहयोगी चंडी प्रसाद भट्ट ने यह समझ लिया था कि पहाड़ों में आ रही ये आपदाएं प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानव-निर्मित हैं। बहुगुणा जी ने गांव-गांव घूमकर लोगों को जगाना शुरू किया। उन्होंने नारा दिया कि जंगल केवल लकड़ी और राजस्व का जरिया नहीं हैं, बल्कि वे पहाड़ों की रीढ़ हैं।


​पर्यावरण का वह कालजयी नारा है। ​बहुगुणा जी ने चिपको आंदोलन के दौरान एक नारा दिया जो आगे चलकर वैश्विक पर्यावरण आंदोलन का मूलमंत्र बन गया: ​"क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार। मिट्टी, पानी और बयार, जिंदा रहने के आधार।" ​इस एक नारे ने तत्कालीन अर्थशास्त्रियों की उस सोच पर प्रहार किया, जो जंगलों को केवल 'टैक्स' और 'पैसे' के चश्मे से देखते थे। बहुगुणा जी ने स्थापित किया कि जंगल की असली उपज लकड़ी नहीं, बल्कि वह ऑक्सीजन, साफ पानी और उपजाऊ मिट्टी है, जिसके बिना मानव जीवन की कल्पना भी असंभव है। ​कश्मीर से कोहिमा तक,4800 किलोमीटर की वह ऐतिहासिक पदयात्रा है।​सुंदरलाल बहुगुणा केवल भाषण देने वाले पर्यावरणविद नहीं थे; वे 'कर्मयोगी' थे। चिपको आंदोलन की गूंज को देश के नीति-निर्धारकों के कानों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने 1981 से 1983 के बीच हिमालय क्षेत्र में एक अभूतपूर्व पदयात्रा शुरू की। 


​यात्रा का दायरा: कश्मीर से शुरू होकर यह यात्रा हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश (अब उत्तराखंड), नेपाल, पश्चिम बंगाल, सिक्किम और भूटान होते हुए कोहिमा (नागालैंड) तक पहुंची। ​दूरी: लगभग 4,800 किलोमीटर की यह कठिन चढ़ाई उन्होंने पैदल तय की। ​उद्देश्य: इस यात्रा का एकमात्र उद्देश्य था— हिमालय के नाजुक पर्यावरण के प्रति लोगों और सरकारों को सचेत करना।​इस यात्रा के दौरान उन्होंने देखा कि कैसे बड़े पैमाने पर हो रहे वनों के कटान से बारहमासी स्रोत सूख रहे हैं और पहाड़ मरुस्थल में बदल रहे हैं। इस यात्रा का प्रभाव यह हुआ कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सुंदरलाल बहुगुणा की बात को गंभीरता से सुना और हिमालयी क्षेत्रों में व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए हरे पेड़ों की कटाई पर 15 वर्षों के लिए पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में पर्यावरण संरक्षण की सबसे बड़ी जीतों में से एक थी।


​ टिहरी बांध आंदोलन, विकास बनाम विनाश की बहस है।​चिपको आंदोलन की सफलता के बाद बहुगुणा जी के जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई भागीरथी नदी पर बन रहे टिहरी बांध के खिलाफ थी। यह आंदोलन उनके जीवन का सबसे भावुक और संघर्षपूर्ण अध्याय था। ​बड़े बांधों के खिलाफ तर्क है।​बहुगुणा जी आधुनिक अर्थों में 'विकास विरोधी' नहीं थे, लेकिन वे ऐसे विकास के सख्त खिलाफ थे जो प्रकृति की छाती को चीरकर हासिल किया जाए। टिहरी बांध के खिलाफ उनके मुख्य बिंदु निम्नलिखित थे।​टिहरी का इलाका 'सेंट्रल हिमालयन थ्रस्ट' पर स्थित है, जो भूकंप के लिहाज से 'जोन-5' में आता है। बहुगुणा जी का तर्क था कि यदि यहाँ कोई बड़ा भूकंप आया, तो बांध टूटने से ऋषिकेश, हरिद्वार और पश्चिम उत्तर प्रदेश के कई शहर ताश के पत्तों की तरह बह जाएंगे।​सांस्कृतिक और आध्यात्मिक नुकसान है ।गंगा (भागीरथी) केवल एक नदी नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की आस्था का केंद्र है। बांध बनने से उसका प्राकृतिक प्रवाह रुक गया, जिससे गंगाजल की वह अनूठी शुद्धता प्रभावित हुई जो सदियों से उसकी पहचान थी।​विस्थापन का दर्द है।इस परियोजना के कारण पुरानी टिहरी का ऐतिहासिक शहर और दर्जनों गांव जलमग्न हो गए। हजारों लोगों को अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़कर जाना पड़ा। बहुगुणा जी के लिए यह उन लोगों के मानवाधिकारों का हनन था।


​गंगा के किनारे सत्याग्रह और उपवास - ​अपने विरोध को दर्ज कराने के लिए बहुगुणा जी ने बांध के ठीक बगल में एक छोटी सी कुटिया बनाई और वर्षों वहां रहे। उन्होंने टिहरी बांध के विरोध में 74 दिनों तक लंबा उपवास रखा। जब सरकार ने उन्हें आश्वासन दिया कि परियोजना की समीक्षा की जाएगी, तभी उन्होंने अपना अनशन तोड़ा। हालांकि, तमाम विरोधों के बावजूद बांध बनकर तैयार हुआ, लेकिन बहुगुणा जी ने दुनिया के सामने यह बहस हमेशा के लिए छोड़ दी कि "क्या बड़े बांध वाकई विकास के प्रतीक हैं, या वे आने वाले कल के विनाश के दस्तावेज हैं?" ​बहुगुणा जी का अर्थशास्त्र: 'इकोलॉजी ही स्थायी इकोनॉमी है'।​आज कॉर्पोरेट जगत में 'सस्टेनेबल डेवलपमेंट'  शब्द का बहुत फैशन है। बड़ी-बड़ी कंपनियां और सरकारें इस पर कॉन्फ्रेंस करती हैं। लेकिन सुंदरलाल बहुगुणा ने दशकों पहले इस दर्शन को एक लाइन में समेट दिया था:


​"इकोलॉजी इज परमानेंट इकोनॉमी" - पारिस्थितिकी ही स्थायी अर्थव्यवस्था है)​उनका मानना था कि यदि हम प्रकृति के मूल स्रोतों को नष्ट कर देंगे, तो दुनिया की कोई भी फैक्ट्री या शेयर मार्केट इंसानों को बचा नहीं पाएगी। उनका यह विचार पश्चिमी उपभोक्तावादी पर सीधा प्रहार था। वे अक्सर गांधी जी के इस कथन को दोहराते थे कि "इस पृथ्वी के पास हर इंसान की जरूरत को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन किसी एक इंसान के लालच को पूरा करने के लिए कुछ भी नहीं।"​उन्होंने सुझाव दिया कि पहाड़ों में ऐसे पेड़ लगाए जाने चाहिए जो मिट्टी को पकड़कर रखें, पानी के स्रोतों को बढ़ाएं और स्थानीय लोगों को चारा, फल और ईंधन दें। वे 'मोनोकल्चर' (जैसे केवल चीड़ के पेड़ लगाना) के विरोधी थे, क्योंकि चीड़ की पत्तियां पहाड़ों की आग को बढ़ाती हैं और पानी को सोख लेती हैं। वे चौड़ी पत्ती वाले पेड़ों जैसे— बांझ (Oak) और बुरांश के जंगलों के समर्थक थे।


​सुंदरलाल बहुगुणा के कार्यों की गूंज सिर्फ भारत में नहीं बल्कि सात समंदर पार भी सुनाई दी। उन्हें दुनिया भर के पर्यावरण संगठनों ने आमंत्रित किया। ​राइट लाइवलीहुड अवार्ड  1987 में उन्हें चिपको आंदोलन के लिए इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिसे 'वैकल्पिक नोबेल पुरस्कार' भी कहा जाता है। 1981 में जब भारत सरकार ने उन्हें 'पद्म श्री' देने की घोषणा की, तो उन्होंने इसे लेने से विनम्रतापूर्वक इनकार कर दिया। उनका कहना था कि जब तक हिमालय में हरे पेड़ों की कटाई जारी है, वे किसी सम्मान के हकदार नहीं हैं। यह उनके नैतिक साहस का प्रमाण था।साल 2009 में देश के प्रति उनके ऐतिहासिक योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्म विभूषण' से अलंकृत किया।​इन तमाम बड़े पुरस्कारों के बावजूद बहुगुणा जी की सादगी कभी कम नहीं हुई। वे हमेशा एक साधारण धोती, सिर पर एक कपड़ा बांधे और चेहरे पर एक सात्विक मुस्कान लिए मिलते थे। उनकी कुटिया के दरवाजे हर उस व्यक्ति के लिए खुले थे जो पर्यावरण और समाज की चिंता लेकर उनके पास आता था।


​आज के परिप्रेक्ष्य में बहुगुणा के विचारों की प्रासंगिकता है।आज साल 2026 में जी रहे हैं। यदि हम अपने आस-पास नजर दौड़ाएं, तो पाएंगे कि सुंदरलाल बहुगुणा ने जिन खतरों के प्रति 40 साल पहले आगाह किया था, वे सब आज हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं।हाल के वर्षों में हमने उत्तराखंड के जोशीमठ में जमीन धंसने की भयानक तस्वीरें देखी हैं। सड़कें चौड़ी करने के नाम पर लाखों पेड़ काटे गए, सुरंगें बनाने के लिए पहाड़ों के सीने में डायनामाइट लगाए गए। जब जोशीमठ के घर दरकने लगे, तो देश को समझ आया कि सुंदरलाल बहुगुणा किस विनाश की बात करते थे। पहाड़ों का अपना एक मिजाज होता है; वे मैदानी इलाकों की तरह भारी मशीनों का बोझ नहीं सह सकते। बहुगुणा जी की अनुपस्थिति में आज पूरा हिमालय अनाथ महसूस कर रहा है, क्योंकि वहां की बेजुबान पहाड़ियों की आवाज बनने वाला अब कोई नहीं है।​आज की युवा पीढ़ी पर्यावरण को लेकर सजग तो है, लेकिन यह सजगता अक्सर सोशल मीडिया के 'हैशटैग्स' और पर्यावरण दिवस पर स्टेटस लगाने तक सीमित रह जाती है।​सुंदरलाल बहुगुणा का जीवन हमें सिखाता है कि वास्तविक बदलाव 'कीबोर्ड' से नहीं बल्कि 'जमीन पर कदम रखने' से आता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन जंगलों में, धूल-मिट्टी में और अभावों के बीच बिताया। वे कोई डिग्रीधारी पर्यावरण वैज्ञानिक नहीं थे, लेकिन प्रकृति के साथ उनके सीधे जुड़ाव ने उन्हें वह ज्ञान दिया जो दुनिया की बड़ी से बड़ी यूनिवर्सिटी नहीं दे सकती।


​मई 2021 में ऋषिकेश के एक अस्पताल में कोविड-19 के कारण इस महान आत्मा ने अंतिम सांस ली। लेकिन क्या सुंदरलाल बहुगुणा जैसे लोग कभी मरते हैं? नहीं। ​वे जीवित हैं हर उस पेड़ की पत्ती में जिसे कटने से बचाया गया। वे जीवित हैं भागीरथी की अविरल लहरों में। वे जीवित हैं हर उस युवा कार्यकर्ता के संकल्प में जो आज भी जंगलों को बचाने के लिए कॉर्पोरेट्स और सरकारों से लोहा ले रहा है।​सुंदरलाल बहुगुणा केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं है, वे एक विचार हैं। एक ऐसा विचार जो हमें याद दिलाता है कि हम प्रकृति के मालिक नहीं, बल्कि उसके बच्चे हैं। यदि बच्चे अपनी मां का आंचल फाड़ने की कोशिश करेंगे, तो उनका खुद का अस्तित्व मिटना तय है। अखबार के इस पन्ने के माध्यम से आज जरूरत इस बात की है कि हम बहुगुणा जी को केवल श्रद्धांजलि न दें, बल्कि उनके दिखाए रास्ते पर चलने का एक छोटा सा संकल्प लें। अपने घर के आस-पास एक पेड़ लगाएं, पानी की बर्बादी रोकें और जब भी विकास के नाम पर विनाश का खेल हो, तो अपनी आवाज बुलंद करें। यही उस 'हिमालय के रक्षक' के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। ​"जब तक गंगा में पानी रहेगा, जब तक हिमालय पर बर्फ रहेगी, सुंदरलाल बहुगुणा का नाम इस देश के पर्यावरण के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में चमकता रहेगा।"



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