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Jamshedpur उत्कृष्ट लेखक, प्रेरक वक्ता और राष्ट्रनिष्ठ विचारक थे भैया जी सहस्रबुद्धे Bhaiya Ji Sahasrabuddhe was an excellent writer, motivational speaker and a nationalist thinker.

 


Upgrade Jharkhand News.  भारतीय समाज जीवन में कुछ ऐसे व्यक्तित्व होते हैं, जिनका प्रभाव केवल उनके जीवनकाल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनकी विचारधारा, लेखनी और कर्म आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन जाते हैं। प्रभाकर गजानन सहस्रबुद्धे ऐसे ही बहुआयामी व्यक्तित्व थे। वे प्रभावी वक्ता, उत्कृष्ट लेखक, कुशल संगठक तथा विनम्र और मधुर व्यवहार के धनी थे। राष्ट्र, समाज और संस्कृति के प्रति उनका समर्पण जीवनपर्यंत बना रहा। उन्होंने संगठन कार्य, साहित्य सृजन और वैचारिक जागरण के माध्यम से समाज को नई दिशा देने का प्रयास किया। 14 मई 2007 को उनका निधन हुआ, किंतु उनके विचार और साहित्य आज भी जीवंत हैं।भैया जी सहस्रबुद्धे का जन्म 18 सितम्बर 1917 को खण्डवा में हुआ था। उनके पिता पेशे से अधिवक्ता थे। उनका परिवार मूलतः टिटवी ग्राम का निवासी था। बचपन से ही जीवन ने उन्हें कठिन परिस्थितियों से परिचित करा दिया। जब वे मात्र नौ वर्ष के थे, तभी उनकी माताजी का निधन हो गया। माँ की ममता से वंचित बालक प्रभाकर और उनके भाई-बहनों का पालन-पोषण विभिन्न रिश्तेदारों के यहाँ हुआ। इस संघर्षपूर्ण वातावरण ने उनके भीतर आत्मविश्वास, अनुशासन और सहनशीलता जैसे गुणों का विकास किया।


उन्होंने इन्दौर में अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण की। विद्यार्थी जीवन से ही उनमें अध्ययन के प्रति विशेष रुचि थी। बाद में वे अपनी बुआ के पास नागपुर आ गये। नागपुर उस समय राष्ट्रीय चेतना और वैचारिक आंदोलनों का महत्वपूर्ण केंद्र था। वहीं 1935 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आये और स्वयंसेवक बने। संघ का अनुशासन, राष्ट्रभक्ति और संगठनात्मक कार्यशैली उन्हें अत्यंत प्रभावित करती थी। यही से उनके जीवन की दिशा बदल गयी।


संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से उनका निकट संपर्क बना। वे नियमित रूप से डॉ. हेडगेवार के घर जाया करते थे। डॉ. हेडगेवार का व्यक्तित्व और राष्ट्रसेवा का भाव भैया जी के मन में गहरे उतर गया। यही कारण था कि आगे चलकर उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समाज और राष्ट्र के कार्य के लिए समर्पित कर दिया। 1940 में उन्होंने मराठी विषय में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। इसके साथ ही उन्होंने वकालत की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने नागपुर के जोशी विद्यालय में अध्यापन कार्य प्रारंभ किया। वे एक कुशल शिक्षक भी थे। विद्यार्थियों के बीच उनकी सरलता और प्रभावशाली शैली उन्हें लोकप्रिय बनाती थी। परंतु उनका मन केवल नौकरी तक सीमित नहीं था। वे समाज जीवन में सक्रिय भूमिका निभाना चाहते थे।1942 में बाबा साहब आप्टे की प्रेरणा से उन्होंने प्रचारक जीवन स्वीकार कर लिया। यह निर्णय आसान नहीं था, क्योंकि प्रचारक जीवन का अर्थ था—व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं का त्याग कर राष्ट्रकार्य के लिए पूर्णकालिक समर्पण। भैया जी ने इसे पूरे मन से स्वीकार किया।


प्रचारक के रूप में उन्होंने उत्तर प्रदेश के देवरिया, आजमगढ़, जौनपुर और गाजीपुर जैसे क्षेत्रों में कार्य किया। इन क्षेत्रों में उन्होंने संगठन को मजबूत करने और युवाओं में राष्ट्रभावना जागृत करने का कार्य किया। बाद में वे ग्वालियर नगर तथा विभाग प्रचारक बने। उनका कार्य करने का तरीका अत्यंत आत्मीय था। वे लोगों को आदेश देकर नहीं, बल्कि प्रेम और तर्क से प्रेरित करते थे।उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी—विनम्रता। वे किसी भी व्यक्ति से बड़े स्नेह और सम्मान से मिलते थे। उनके व्यवहार में मिठास थी और वाणी में गंभीरता। इसी कारण वे जहाँ भी गये, वहाँ लोगों के प्रिय बन गये। उनके संपर्क में आने वाला व्यक्ति स्वयं को उनसे जुड़ा हुआ महसूस करता था।


1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। यह संघ और उसके कार्यकर्ताओं के लिए अत्यंत कठिन समय था। उस समय भैया जी को लखनऊ केंद्र बनाकर सहप्रांत प्रचारक का दायित्व दिया गया। प्रतिबंध के दौरान संगठन का कार्य भूमिगत रूप से चलाना पड़ता था। भैया जी ने अत्यंत साहस और सूझबूझ के साथ यह कार्य संभाला। इन्हीं दिनों कुछ उपद्रवियों ने उनके घर में आग लगा दी। उनका उद्देश्य केवल संपत्ति नष्ट करना नहीं था, बल्कि परिवार को नुकसान पहुँचाना भी था। सौभाग्य से कुछ सज्जनों के सहयोग से उनके पिता जीवित बच गये। यह घटना उस दौर के वैचारिक संघर्ष और सामाजिक तनाव का प्रतीक थी। भैया जी ने इन कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और संयम नहीं छोड़ा।1950 में प्रतिबंध हटने के बाद उन्हें मध्यभारत का प्रांत प्रचारक बनाया गया। उन्होंने संगठन को पुनः सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। लेकिन 1952 में पारिवारिक परिस्थितियाँ अत्यंत कठिन हो गयीं। परिवार की जिम्मेदारियों को देखते हुए उन्होंने प्रचारक जीवन से निवृत्ति लेकर गृहस्थ जीवन स्वीकार किया। यह निर्णय उन्होंने संगठन के वरिष्ठ नेतृत्व की अनुमति से लिया।


इसके बाद उन्होंने इन्दौर में वकालत प्रारंभ की। कुछ समय बाद वे खामगाँव के एक विद्यालय में प्राध्यापक बन गये। शिक्षक के रूप में भी उनका प्रभाव अत्यंत प्रेरणादायी था। वे विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रखते थे, बल्कि उन्हें जीवन मूल्यों और राष्ट्रभक्ति की शिक्षा भी देते थे।हालाँकि उन्होंने गृहस्थ जीवन अपना लिया था, परंतु संघ कार्य और सामाजिक गतिविधियों से उनका जुड़ाव कभी समाप्त नहीं हुआ। वे लगातार वैचारिक कार्यक्रमों, प्रशिक्षण वर्गों और बौद्धिक गोष्ठियों में सक्रिय रहे।1975 में देश में आपातकाल लागू हुआ। लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया। इस समय अनेक राष्ट्रवादी और लोकतांत्रिक विचारों से जुड़े लोगों को जेल भेजा गया। भैया जी भी नागपुर जेल में बंद रहे। जेल में रहते हुए भी उनका मनोबल अडिग रहा। वे मानते थे कि सत्य और राष्ट्रहित के लिए संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता।आपातकाल समाप्त होने के बाद उन्होंने नौकरी से अवकाश ले लिया और स्वयं को पूर्णतः अध्ययन तथा लेखन में समर्पित कर दिया। यही वह समय था, जब उनकी साहित्य साधना अपने उत्कर्ष पर पहुँची।भैया जी सहस्रबुद्धे एक विलक्षण लेखक थे। उन्होंने बच्चों, युवाओं और वृद्धों—सभी वर्गों के लिए साहित्य की रचना की। मराठी भाषा में उन्होंने लगभग 125 पुस्तकों का लेखन किया। उनकी रचनाओं में राष्ट्रभक्ति, संस्कृति, नैतिक मूल्य, चरित्र निर्माण और समाज चेतना प्रमुख विषय रहे।


उनकी पुस्तक ‘जीवन मूल्य’ विशेष रूप से लोकप्रिय हुई। इस पुस्तक में उन्होंने जीवन को सही दिशा देने वाले मूल्यों की सरल और प्रभावशाली व्याख्या की है। उनकी अनेक पुस्तकों का हिंदी सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ। इससे उनके विचारों का व्यापक प्रसार हुआ।लोकहित प्रकाशन ने उनकी 25 से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन किया। उनकी भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और प्रेरक होती थी। वे कठिन विषयों को भी सहज ढंग से प्रस्तुत करने की क्षमता रखते थे। वे केवल साहित्यकार ही नहीं, बल्कि शोधपरक चिंतक भी थे। उन्होंने प्रसिद्ध इतिहासकार हरिभाऊ वाकणकर के साथ वैदिक सरस्वती नदी पर शोधकार्य किया। भारतीय इतिहास और संस्कृति के प्रति उनकी गहरी रुचि थी। उन्होंने भारतीय परंपराओं को वैज्ञानिक और ऐतिहासिक दृष्टि से समझने का प्रयास किया।भैया जी एक प्रभावशाली वक्ता भी थे। उनके भाषणों में तथ्य, तर्क और उदाहरणों का अद्भुत समन्वय होता था। वे श्रोताओं को केवल भावुक नहीं करते थे, बल्कि विचार करने के लिए प्रेरित करते थे। उनकी वाणी में ओज था, परंतु उसमें कटुता नहीं होती थी।


1981 में वे संघ शिक्षा वर्ग (तृतीय वर्ष) के सर्वाधिकारी बने। यह अत्यंत महत्वपूर्ण दायित्व माना जाता है। उस समय भी उनकी अनुशासनप्रियता और समयपालन की चर्चा होती थी। वे प्रतिदिन निर्धारित समय से पहले संघस्थान पहुँच जाते थे। यह उनके व्यक्तित्व की गंभीरता और समर्पण को दर्शाता है। भैया जी सहस्रबुद्धे का जीवन सादगी का प्रतीक था। वे स्वयं को सामान्य बुद्धि का व्यक्ति बताते थे। जब कोई उनके ‘सहस्रबुद्धे’ उपनाम की चर्चा करता, तो वे विनम्रता से कहते कि शायद हमारे पूर्वजों में कोई अत्यंत बुद्धिमान व्यक्ति रहा होगा, मैं तो साधारण व्यक्ति हूँ। उनकी यही विनम्रता उन्हें महान बनाती थी।


आज के समय में जब समाज में वैचारिक असहिष्णुता, स्वार्थ और नैतिक मूल्यों का संकट दिखाई देता है, तब भैया जी सहस्रबुद्धे का जीवन हमें नई प्रेरणा देता है। उन्होंने दिखाया कि विचारों की शक्ति, सादगीपूर्ण जीवन और समाज के प्रति समर्पण से व्यक्ति बिना किसी पद या प्रचार के भी समाज पर गहरा प्रभाव छोड़ सकता है। 14 मई 2007 को यवतमाल में 90 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। उनका जाना भारतीय वैचारिक और साहित्यिक जगत की बड़ी क्षति थी। किंतु उनका साहित्य, उनके विचार और उनका प्रेरक जीवन आज भी समाज के लिए पथप्रदर्शक बने हुए हैं। उनकी पुण्यतिथि केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी अवसर है। हमें यह विचार करना चाहिए कि क्या हम अपने जीवन में उन मूल्यों को स्थान दे पा रहे हैं, जिनके लिए भैया जी ने पूरा जीवन समर्पित किया। राष्ट्रप्रेम, अनुशासन, सादगी, विनम्रता और समाजसेवा—ये केवल शब्द नहीं, बल्कि भैया जी के जीवन के आधार थे। ऐसे महान साहित्य साधक, प्रेरक वक्ता और राष्ट्रनिष्ठ चिंतक को उनकी पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि।



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