Upgrade Jharkhand News. हिन्दी साहित्य के इतिहास में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार बन जाते हैं। डॉ. नामवर सिंह एक ऐसा ही नाम है। उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के एक छोटे से गाँव जियानपुर से शुरू हुआ उनका सफर दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के गलियारों तक पहुँचा और अंततः हिन्दी आलोचना का 'नया प्रतिमान' बन गया। आज उनके जन्मदिवस पर जब हम उनके योगदान का आकलन करते हैं, तो पाते हैं कि उन्होंने साहित्य को केवल पढ़ना नहीं, बल्कि उसे समाज और राजनीति के चश्मे से परखना सिखाया।नामवर सिंह का जन्म एक शिक्षक परिवार में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव में हुई, लेकिन उनकी बौद्धिक चेतना का विकास 'महासुना' काशी (वाराणसी) में हुआ। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में उन्हें आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे गुरु मिले, जिन्होंने नामवर जी के भीतर की जिज्ञासा को 'दूसरी परंपरा' की ओर मोड़ा। द्विवेदी जी के सानिध्य में ही उन्होंने यह समझा कि साहित्य केवल शास्त्र नहीं है, बल्कि वह मनुष्य की जिजीविषा का प्रतिबिंब है।
नामवर सिंह से पहले, हिन्दी में आलोचना को अक्सर एक दोयम दर्जे का कार्य माना जाता था। लोग मानते थे कि जो कविता नहीं लिख सकता, वह आलोचक बन जाता है। लेकिन नामवर जी ने अपनी धारदार भाषा और वैज्ञानिक दृष्टि से यह साबित किया कि आलोचना भी उतनी ही सृजनात्मक होती है जितनी कि कविता या कहानी। उन्होंने 'कविता के नये प्रतिमान' के माध्यम से यह दिखाया कि मुक्तिबोध की जटिल कविताओं को कैसे समाजशास्त्रीय और सौंदर्यशास्त्रीय दृष्टिकोण से समझा जा सकता है। 1971 में प्रकाशित उनकी पुस्तक 'कविता के नये प्रतिमान' ने हिन्दी साहित्य में हड़कंप मचा दिया था। इस पुस्तक के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। इसमें उन्होंने 'नई कविता' के दौर की कविताओं का सूक्ष्म विश्लेषण किया। उन्होंने अज्ञेय से लेकर मुक्तिबोध तक की कविताओं के बहाने आधुनिकता, तनाव और संघर्ष को परिभाषित किया। इसी पुस्तक ने गजानन माधव मुक्तिबोध को हिन्दी साहित्य के केंद्र में स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई।
नामवर सिंह की सबसे चर्चित पुस्तकों में से एक है—'दूसरी परंपरा की खोज'। यह पुस्तक उन्होंने अपने गुरु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के सम्मान में लिखी थी। इसमें उन्होंने यह तर्क दिया कि भारतीय साहित्य में हमेशा से दो परंपराएं रही हैं—एक वह जो राजदरबारों और शास्त्रों की थी, और दूसरी वह जो लोक की, विद्रोह की और कबीर जैसे संतों की थी। उन्होंने द्विवेदी जी को उस दूसरी (विद्रोही और लोकपरक) परंपरा का सबसे बड़ा संवाहक बताया।नामवर सिंह एक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी थे, लेकिन वे कट्टरपंथी नहीं थे। उन्होंने मार्क्सवादी सिद्धांतों को भारतीय संदर्भों में ढालने का काम किया। उन्होंने रामविलास शर्मा की प्रखर मार्क्सवादी आलोचना और हजारी प्रसाद द्विवेदी की सांस्कृतिक आलोचना के बीच एक सेतु का काम किया। उनका मानना था कि साहित्य को केवल 'वर्ग संघर्ष' तक सीमित नहीं किया जा सकता, उसमें मनुष्य की संवेदनाओं और उसकी सांस्कृतिक जड़ों का भी महत्व होता है।
हिन्दी आलोचना में 'छायावाद' पर बहुत कुछ लिखा गया था, लेकिन नामवर जी की पुस्तक 'छायावाद' ने इस पूरे कालखंड को देखने का नजरिया बदल दिया। उन्होंने जयशंकर प्रसाद, निराला और पंत की कविताओं को केवल रहस्यवाद या प्रकृति चित्रण तक सीमित नहीं माना, बल्कि उसे भारतीय पुनर्जागरण और आजादी के आंदोलन की अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुत कियानामवर सिंह जितने महान लेखक थे है।कहीं बड़े वक्ता थे। उन्हें 'वाचक' कहा जाता था। उनके व्याख्यान सुनने के लिए दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम से लेकर JNU के कमरों तक में भीड़ उमड़ पड़ती थी। वे बिना किसी कागज के घंटों तक धाराप्रवाह बोल सकते थे। उनकी बातों में किस्सागोई, कटाक्ष और गहरा पांडित्य होता था। उनके कई व्याख्यानों को बाद में पुस्तकाकार दिया गया, जैसे 'कहानी: नयी कहानी'।जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र की स्थापना और उसे पहचान दिलाने में नामवर जी का अमूल्य योगदान रहा। उन्होंने वहाँ एक ऐसा वातावरण तैयार किया जहाँ छात्र निर्भीक होकर बहस कर सकते थे। उन्होंने सिखाया कि असहमति ही लोकतंत्र और साहित्य की जान है।
'आलोचना' पत्रिका का संपादन -एक संपादक के तौर पर उन्होंने 'आलोचना' (त्रैमासिक) पत्रिका को जो ऊंचाइयां दीं, वे आज भी एक मानक हैं। उन्होंने इस पत्रिका के माध्यम से नए लेखकों को मंच दिया और साहित्य में चल रहे समकालीन विमर्शों को एक दिशा दी।जहाँ प्रसिद्धि होती है, वहाँ विवाद भी होते हैं। नामवर जी पर अक्सर आरोप लगे कि उन्होंने अपनी पसंद के लेखकों को बढ़ावा दिया या वे 'अकादमिक राजनीति' के केंद्र में रहे। लेकिन इन विवादों के बीच भी उनकी विद्वता पर कभी सवाल नहीं उठा। उन्होंने हर विरोध का उत्तर अपनी बौद्धिक गरिमा के साथ दिया।भले ही नामवर जी दिल्ली के बौद्धिक जगत के चमकते सितारे थे, लेकिन उनके भीतर का 'भोजपुरी' मन हमेशा जीवित रहा। वे अक्सर अपनी बातचीत में लोक मुहावरों का प्रयोग करते थे। वे मानते थे कि कोई भी साहित्य तब तक बड़ा नहीं हो सकता जब तक वह अपनी मिट्टी की खुशबू से न जुड़ा हो।
आज जब हिन्दी साहित्य में आलोचना का संकट महसूस किया जा रहा है, नामवर सिंह की कमी और अधिक खलती है। डॉ. नामवर सिंह ने हिन्दी आलोचना को वह गरिमा प्रदान की जिससे वह विश्व साहित्य के समकक्ष खड़ी हो सकी। उन्होंने हमें सिखाया कि किसी लेखक की जय-जयकार करना आलोचना नहीं है, बल्कि उसकी रचना के माध्यम से समय को पहचानना आलोचना है। वे हिन्दी के ऐसे 'शिखर पुरुष' थे जिन्होंने मरते दम तक अपनी वैचारिक धार को कुंद नहीं होने दिया। 28 अप्रैल को उनका जन्मदिन केवल एक तारीख नहीं, बल्कि हिन्दी की उस 'दूसरी परंपरा' के उत्सव का दिन है।
'इतिहास और आलोचना' डॉ. नामवर सिंह की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और आधारभूत वैचारिक पुस्तक है। यह पुस्तक न केवल साहित्य के विद्यार्थियों के लिए, बल्कि इतिहास और समाजशास्त्र को समझने वालों के लिए भी एक मार्गदर्शिका के समान है। इस पुस्तक के मुख्य पहलुओं को हम निम्नलिखित बिंदुओं में समझ सकते हैं।नामवर सिंह का मानना था कि आलोचना इतिहास से कटी हुई कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं है। वे तर्क देते हैं कि किसी भी साहित्यिक कृति की सही परख तभी संभव है जब उसे उस समय के ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ में रखकर देखा जाए। उनके लिए इतिहास केवल राजाओं की वंशावली नहीं, बल्कि मनुष्य के संघर्ष और चेतना का विकास है।इस पुस्तक में नामवर जी की मार्क्सवादी और द्वंद्वात्मक भौतिकवादी दृष्टि स्पष्ट रूप से उभरकर आती है। वे साहित्य को 'वर्ग-चेतना' और 'उत्पादन संबंधों' के व्यापक ढांचे के भीतर रखकर विश्लेषित करते हैं। हालांकि, वे यांत्रिक मार्क्सवाद के विरोधी थे; वे साहित्य की अपनी विशिष्टता और कलात्मकता को भी महत्व देते थे।नामवर जी इस पुस्तक में परंपरा के उस रूप को स्वीकार करते हैं जो प्रगतिशील है। वे 'अतीत के मोह' और 'अतीत के गौरव' के बीच अंतर स्पष्ट करते हैं। उनके अनुसार, इतिहास से हमें वह सब कुछ ग्रहण करना चाहिए जो वर्तमान को बदलने और भविष्य को बेहतर बनाने में सहायक हो।
इसमें उन्होंने शोध की वैज्ञानिक पद्धति पर जोर दिया है। 'इतिहास और आलोचना' की भाषा अत्यंत सटीक, तर्कपूर्ण और प्रहारक है। नामवर जी की यह खूबी थी कि वे जटिल दार्शनिक बातों को भी बहुत ही सरल और मुहावरेदार भाषा में समझा देते थे। निष्कर्षसंक्षेप में कहें तो, 'इतिहास और आलोचना' यह स्थापित करती है कि आलोचना का धर्म केवल प्रशंसा या निंदा करना नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में सत्य की खोज करना है।


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