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bhopal व्यंग्य -गांधी जी के तीन बंदर और लोकतंत्र की सीढ़ियाँ Satire - Gandhi's three monkeys and the steps to democracy

 


Upgrade Jharkhand News.  घर की वह चौड़ी संगमरमरी सीढ़ियाँ उस दिन किसी पार्लियामेंट्री ब्लॉक से कम नहीं लग रही थीं। दोपहर की तपती धूप बाहर थी, लेकिन अंदर का पॉलिटिकल ड्रामा उससे कहीं अधिक गर्माया हुआ था। आज की राजनीति की तरह यहाँ भी कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं था। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच की रेखाएँ सीढ़ियों के पायदानों पर खिंची हुई थीं। सबसे ऊपर की पॉवर सीट पर बैठा था,सबसे छोटा सदस्य, राजेश। वह अपनी आँखों पर दोनों हथेलियाँ मजबूती से टिकाए हुए था। उसके चेहरे पर वह मासूम लेकिन जिद्दी लोकतांत्रिक अहंकार था, जो कहता है, 'मैं वही देखूँगा जो मुझे देखना है और अगर मुझे नहीं देखना, तो सत्य निरर्थक हो जाएगा।' यह आज के सिलेक्टिव विजन वाले लोकतंत्र का सटीक उदाहरण था, जहाँ सच को ढंकना ही सबसे बड़ी कला है। यदि सरकार चलने के लिए समर्थन की आवश्यकता हो तो सबसे छोटा दल सबसे ज्यादा पावर फुल है, जो हर कहीं भागता फिरता  है। 


राजेश के ठीक नीचे बैठी अनन्या ने अपने कानों को कसकर बंद कर रखा था। उसे बखूबी पता था कि जनता की चीखें, महँगाई का शोर या विपक्ष की दलीलें सुनना प्रशासनिक सुशासन के लिए हानिकारक हो सकता है। उसका इग्नोरेंस,  ऐसी नीति थी जिसे हम आज की तारीख में डिफेंसिव इग्नोरेंस पॉलिटिक्स या सुविधाजनक बहरापन कह सकते हैं। सबसे नीचे, सीढ़ी के आखिरी पायदान पर बैठी थी सबसे बड़ी आरोही। उसने अपने मुँह पर हाथ रख रखा था। यह उस लोकतांत्रिक मर्यादा का प्रतीक था जिसे आज के दौर में संविधान का सम्मान करने के नाम पर चुप रहने के लिए मजबूर किया जाता है। सबसे बड़ा दल भी यदि पूर्ण बहुमत में नहीं होता तो वह सरकार साधने के लिए खुद चुप रहना ही उचित समझता है। उसे एक ऐसे मूक-दर्शक की तरह चुप रहना पड़ता है, जो जानती है कि अन्याय हो रहा है, लेकिन अनुशासन की लक्ष्मण रेखा को लांघना, अपनी ही कुर्सी को संकट में डालना है।


तीनों बच्चों की छुट्टियाँ चल रही थीं, और रिमोट पर कब्जा जमाए समाचार चैनल लोकतंत्र की नई परिभाषा लिख रहे थे। कोई चिल्ला रहा था कि देश खतरे में है, तो कोई कह रहा था कि विकास की आंधी में सब उड़ गया है। शोर इतना था कि अर्थ खो चुका था। बच्चों ने ऊबकर टीवी बंद किया और सीढ़ियों को ही लोकसभा बना लिया। दादी, जो इस घर की संविधान सभा की एकमात्र जीवित सदस्य थीं, चश्मा उतारते हुए उनके पास आईं। उन्होंने मुस्कुराकर पूछा, "यह कौन सा नया खेल है?"


 आरोही ने इशारा किया, 'गांधी जी के तीन बंदर।'

 दादी ने एक गहरी सांस ली। उनकी आँखों में अतीत की वह पीढ़ियाँ तैर गईं, जिन्होंने देश को आजाद होते देखा था। उन्होंने कहा, "बेटा, तुम लोग गांधी जी के बंदरों को गलत समझ बैठे हो। वे बुरा न देखने, न सुनने और न बोलने का संदेश इसलिए नहीं दे रहे थे कि तुम कायर बन जाओ। या लोकतंत्र ही गूंगा, बहरा, और अंधा बन जाए। वे इसलिए थे कि तुम अपनी इंद्रियों को शुद्ध रखो। लेकिन आज का लोकतंत्र तो उन बंदरों का मिसयूज कर रहा है।"  दादी ने बच्चों के पास बैठकर उस कड़वे सच को उजागर किया जो आज सत्ता के गलियारों में दफन है। "राजेश, अगर तू आँखें बंद कर लेगा, तो गिरे हुए को कौन उठाएगा? अनन्या, अगर तू कान बंद कर लेगी, तो भूख की आह कौन सुनेगा? और आरोही, अगर तू मुँह बंद रखेगी, तो तानाशाहों की गलतियां कौन बताएगा?"


तीनों बच्चों ने धीरे-धीरे अपने हाथ हटाए। राजेश की आँखों में अब वह  हकीकत थी जिसे उसने अपने स्वार्थ के लिए जानबूझकर अनदेखा किया था। आरोही के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो सवाल पूछने का साहस रखती थी। दादी ने कहा, "प्रगति की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए लोकतंत्र की सीढ़ियों का हर पायदान जवाबदेही माँगता है। बुराई को देखना, उसे सुनना और समय आने पर उसके विरुद्ध आवाज उठाना ही असली लोकतांत्रिकता है,अन्यथा, यह घर भी किसी अखाड़े जैसा हो जाएगा जहाँ बंदर तो बहुत हैं, लेकिन इंसान कोई नहीं।" उस दिन घर की सीढ़ियों पर कोई शोर नहीं हुआ, पर एक वैचारिक क्रांति हो गई। लोकतंत्र की असली शक्ति किसी बंद कमरे के फैसलों में नहीं, बल्कि उन लोगों की खुली आँखों और मुखर आवाजों में है जो जानते हैं कि कब देखना है, कब सुनना है और कब पूरी ताकत से सच बोलना है।


सीढ़ियों से उठते हुए बच्चों को समझ आ गया था, कि अब बंदर बनकर रहने का युग समाप्त हो चुका है। अब भविष्य को 'सजग पीढ़ी' की जरूरत है, जो लोकतंत्र को केवल शब्दों में नहीं, अपने साहस में जीती है। (लेखक इन दिनों लंदन में निवासरत हैं। विवेक रंजन श्रीवास्तव



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