Upgrade Jharkhand News. 1650 ईस्वी में जन्मे धनाजी जाधव मराठा साम्राज्य के उन वीर सेनानायकों में थे, जिन्होंने अपने अदम्य साहस, सैन्य कौशल और स्वराज्य के प्रति अटूट निष्ठा के बल पर मुगल साम्राज्य की नींव तक हिला दी थी। वे केवल एक योद्धा नहीं थे, बल्कि छत्रपति शिवाजी महाराज की उस दूरदर्शी परंपरा के प्रतिनिधि थे, जिसने स्वराज्य को किसी व्यक्ति विशेष से ऊपर उठाकर एक राष्ट्रीय चेतना का रूप दिया था।शिवाजी महाराज के जीवनकाल में ही धनाजी ने युद्धकला का प्रशिक्षण प्राप्त कर लिया था। वे मराठा सेना के उन चुनिंदा वीरों में शामिल थे जिन्होंने कम उम्र में ही अपने साहस और नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। शिवाजी महाराज के स्वर्गवास के बाद जब संभाजी महाराज ने शासन संभाला, तब भी धनाजी जाधव स्वराज्य की रक्षा के लिए अग्रिम पंक्ति में डटे रहे।
1689 में संभाजी महाराज की क्रूर हत्या के बाद मराठा साम्राज्य पर अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया। औरंगजेब स्वयं दक्षिण में उतर आया था और उसे विश्वास था कि अब मराठा शक्ति का अंत निश्चित है। रायगढ़ किला मुगलों के कब्जे में चला गया, अनेक सरदार मारे गए या बंदी बना लिए गए और स्वराज्य चारों ओर से संकटों से घिर गया। लेकिन इसी कालखंड में धनाजी जाधव और संताजी घोरपड़े जैसे वीरों ने मराठा प्रतिरोध को नई ऊर्जा प्रदान की।धनाजी जाधव ने गुरिल्ला युद्ध पद्धति को अपनी सबसे बड़ी शक्ति बनाया। वे मुगल सेना पर अचानक हमला करते, उनके रसद मार्गों को नष्ट कर देते, खजाने लूट लेते और फिर इतनी तेजी से स्थान बदलते कि दुश्मन उन्हें पकड़ ही नहीं पाता था। औरंगजेब की विशाल सेना संख्या और संसाधनों में भले ही मराठों से कहीं अधिक थी, लेकिन धनाजी की रणनीति के सामने वह बार-बार असहाय सिद्ध होती थी।उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे केवल युद्ध लड़ने वाले सेनापति नहीं थे, बल्कि परिस्थितियों को समझकर रणनीति बनाने वाले कुशल सैन्य योजनाकार भी थे। उन्होंने कई बार मुगल सेनापतियों को ऐसी परिस्थितियों में फंसा दिया कि उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा। मराठा सैनिकों में उनका प्रभाव इतना अधिक था कि उनके नेतृत्व में छोटी-सी टुकड़ी भी बड़े-बड़े मुगल दस्तों को परास्त कर देती थी।संताजी घोरपड़े और धनाजी जाधव की जोड़ी उस समय मराठा शक्ति की रीढ़ बन गई थी। दोनों ने मिलकर औरंगजेब की सेना को लगातार परेशान किया। इतिहासकारों का मानना है कि यदि इन दोनों सेनानायकों का नेतृत्व न मिला होता, तो संभवतः मराठा प्रतिरोध इतनी लंबी अवधि तक कायम नहीं रह पाता। उनके हमलों ने मुगल सेना का मनोबल तोड़ दिया और उन्हें यह एहसास करा दिया कि स्वराज्य को समाप्त करना आसान नहीं है।
1690 के दशक में धनाजी जाधव ने अनेक महत्वपूर्ण सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया। उन्होंने कर्नाटक, महाराष्ट्र और दक्कन क्षेत्र में मुगल चौकियों पर लगातार आक्रमण किए। उनकी सफलता का मुख्य कारण उनकी गति, गोपनीयता और स्थानीय भूगोल की गहरी समझ थी। वे अपने सैनिकों के साथ कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी संघर्ष करते थे और स्वयं युद्धभूमि में अग्रिम पंक्ति में दिखाई देते थे।जब छत्रपति राजाराम महाराज ने जिन्जी किले में शरण ली, तब धनाजी जाधव ने स्वराज्य के विभिन्न क्षेत्रों में संघर्ष जारी रखा। उन्होंने न केवल मराठा क्षेत्रों की रक्षा की, बल्कि मुगलों को लगातार रक्षात्मक स्थिति में रहने पर मजबूर कर दिया। उनकी कार्यशैली ने यह सिद्ध कर दिया कि किसी भी युद्ध में केवल सेना की संख्या नहीं, बल्कि नेतृत्व और रणनीति भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
1700 में राजाराम महाराज के निधन के बाद महारानी ताराबाई ने शासन की बागडोर संभाली। इस कठिन समय में भी धनाजी जाधव ने स्वराज्य के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी। उन्होंने ताराबाई के नेतृत्व में मराठा सेना का संचालन किया और मुगलों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। उनके नेतृत्व में मराठा शक्ति पुनः संगठित हुई और औरंगजेब के लिए दक्षिण भारत का अभियान एक अंतहीन संघर्ष बन गया। औरंगजेब ने लगभग 27 वर्षों तक दक्कन में युद्ध किया, लेकिन वह स्वराज्य को समाप्त नहीं कर सका। इसके पीछे जिन वीर सेनानायकों का सबसे बड़ा योगदान था, उनमें धनाजी जाधव का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। उन्होंने अपनी युद्धकुशलता से मुगल साम्राज्य की आर्थिक और सैन्य शक्ति को गंभीर क्षति पहुंचाई।1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलीं। इसी समय छत्रपति शाहू महाराज को मुगल कैद से मुक्त किया गया। धनाजी जाधव ने तत्कालीन परिस्थितियों का आकलन करते हुए शाहू महाराज का समर्थन किया। उनके इस निर्णय ने मराठा साम्राज्य के भविष्य को नई दिशा प्रदान की। शाहू महाराज की सत्ता स्थापना में भी धनाजी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
धनाजी जाधव को उनकी असाधारण सेवाओं के लिए "सरनोबत" अर्थात मराठा सेना के प्रधान सेनापति का पद प्राप्त हुआ। यह पद केवल सैन्य नेतृत्व का प्रतीक नहीं था, बल्कि स्वराज्य के प्रति उनके योगदान की सर्वोच्च मान्यता भी थी। 27 जून 1708 को इस महान योद्धा का निधन हो गया।

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