28 जून पुण्यतिथि पर विशेष
Upgrade Jharkhand News. भारत के आधुनिक विकास की कहानी केवल राजनीतिक स्वतंत्रता, औद्योगिक प्रगति या वैज्ञानिक उपलब्धियों की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन महान व्यक्तित्वों की भी कहानी है जिन्होंने अपने ज्ञान और दूरदृष्टि से राष्ट्र के भविष्य को दिशा दी। ऐसे ही महान व्यक्तित्वों में एक नाम अत्यंत सम्मान और गौरव के साथ लिया जाता है—प्रशांत चंद्र महालनोबिस। उन्हें भारत में आधुनिक सांख्यिकी का जनक कहा जाता है। उन्होंने केवल संख्याओं और आंकड़ों के अध्ययन को नई ऊँचाइयाँ नहीं दीं, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि सही आंकड़े किसी राष्ट्र के विकास की सबसे बड़ी शक्ति बन सकते हैं। वैज्ञानिक और योजनाकार का निधन हुआ था। उनकी पुण्यतिथि केवल एक व्यक्ति को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह उस वैज्ञानिक दृष्टिकोण को स्मरण करने का अवसर भी है जिसने स्वतंत्र भारत की आर्थिक योजनाओं, औद्योगिक विकास और नीति-निर्माण की आधारशिला रखी। आज जब दुनिया डेटा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीकों के युग में प्रवेश कर चुकी है, तब महालनोबिस के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं।
प्रशांत चंद्र महालनोबिस का जन्म 29 जून 1893 को कोलकाता में एक प्रतिष्ठित और शिक्षित बंगाली परिवार में हुआ था। उनका परिवार सामाजिक सुधार, शिक्षा और वैज्ञानिक चिंतन के लिए प्रसिद्ध था। प्रारंभिक शिक्षा कोलकाता में प्राप्त करने के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय का रुख किया। वहाँ उन्होंने भौतिकी और गणित का अध्ययन किया तथा उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।कैम्ब्रिज में अध्ययन के दौरान ही उनकी रुचि सांख्यिकी की ओर बढ़ी। एक दिन उनके हाथ प्रसिद्ध शोध पत्रिका ‘बायोमेट्रिका’ लगी, जिसमें सांख्यिकी के आधुनिक सिद्धांतों पर शोध प्रकाशित होते थे। इस पत्रिका ने उनके मन में एक नया विचार जगाया कि आंकड़ों का उपयोग केवल गणितीय अभ्यास के लिए नहीं, बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था की समस्याओं को समझने तथा उनके समाधान खोजने के लिए भी किया जा सकता है।भारत लौटने के बाद उन्होंने महसूस किया कि विविधताओं से भरे इस विशाल देश की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए वैज्ञानिक आंकड़ों की आवश्यकता है। यही विचार आगे चलकर उनके जीवन का मिशन बन गया।
बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों में सांख्यिकी को एक सीमित अकादमिक विषय माना जाता था। लेकिन महालनोबिस ने इसे राष्ट्र निर्माण का एक प्रभावी साधन बना दिया। उन्होंने समझ लिया था कि किसी भी सरकार की योजनाएँ तभी सफल हो सकती हैं जब उनके पीछे वास्तविक और विश्वसनीय आंकड़े हों।उन्होंने कृषि, जनसंख्या, उद्योग, स्वास्थ्य और सामाजिक परिस्थितियों का अध्ययन करने के लिए वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग शुरू किया। उनके प्रयासों ने यह साबित किया कि आंकड़े केवल संख्या नहीं होते, बल्कि वे समाज की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। महालनोबिस का मानना था कि बिना विश्वसनीय डेटा के बनाई गई योजनाएँ अंधेरे में तीर चलाने के समान होती हैं। इसलिए उन्होंने डेटा संग्रहण, विश्लेषण और उसके आधार पर नीति निर्माण को अत्यधिक महत्व दिया।भारतीय सांख्यिकी संस्थान की स्थापना भारत में सांख्यिकी के विकास का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय 17 दिसंबर 1931 को लिखा गया, जब महालनोबिस ने कोलकाता में इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट (ISI) की स्थापना की।शुरुआत में यह संस्थान बहुत छोटे स्तर पर कार्य करता था। सीमित संसाधनों और कम कर्मचारियों के बावजूद महालनोबिस ने इसे विश्वस्तरीय शोध केंद्र बनाने का सपना देखा। उनकी अथक मेहनत और नेतृत्व क्षमता के कारण कुछ ही वर्षों में यह संस्थान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हो गया।आईएसआई ने सांख्यिकी, गणित, अर्थशास्त्र, जनसंख्या अध्ययन, कंप्यूटर विज्ञान और डेटा विश्लेषण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस संस्थान से निकलने वाले अनेक वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने देश-विदेश में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया।
आज भी भारतीय सांख्यिकी संस्थान विश्व के प्रतिष्ठित अनुसंधान संस्थानों में गिना जाता है और डेटा विज्ञान, मशीन लर्निंग तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे आधुनिक क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। यह महालनोबिस की दूरदृष्टि का ही परिणाम है कि लगभग एक सदी पहले स्थापित यह संस्थान आज भी ज्ञान और अनुसंधान का केंद्र बना हुआ है।वैज्ञानिक जगत में पी. सी. महालनोबिस का सबसे प्रसिद्ध योगदान ‘महालनोबिस दूरी’ है। उन्होंने 1936 में इस अवधारणा को विकसित किया था।साधारण भाषा में कहें तो यह एक ऐसी सांख्यिकीय तकनीक है जो विभिन्न डेटा समूहों के बीच वास्तविक अंतर को मापने में सहायता करती है। यह केवल सामान्य दूरी नहीं मापती, बल्कि डेटा के भीतर मौजूद संबंधों और विविधताओं को भी ध्यान में रखती है। उस समय शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यह सिद्धांत भविष्य में डिजिटल क्रांति का आधार बनेगा। आज महालनोबिस दूरी का उपयोग अनेक आधुनिक तकनीकों में किया जा रहा है—कृत्रिम बुद्धिमत्ता मशीन लर्निंग डेटा साइंस कंप्यूटर विजन चेहरे की पहचान तकनीक मेडिकल डायग्नोस्टिक्स वित्तीय जोखिम विश्लेषण साइबर सुरक्षा डेटा में छिपी विसंगतियों को पहचानने और पैटर्न खोजने में यह तकनीक अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज की डेटा-आधारित दुनिया में महालनोबिस का यह योगदान एक मजबूत आधारशिला के समान है।
महालनोबिस ने भारत में सैंपल सर्वेक्षण की आधुनिक प्रणाली विकसित की। इससे पहले किसी भी विषय पर व्यापक जानकारी जुटाने के लिए पूरे समूह का अध्ययन करना पड़ता था, जो समय और धन दोनों की दृष्टि से कठिन था।उन्होंने सिद्ध किया कि यदि वैज्ञानिक ढंग से चुने गए सीमित नमूनों का अध्ययन किया जाए तो पूरे समाज की स्थिति का विश्वसनीय अनुमान लगाया जा सकता है।उनकी इस पद्धति ने कृषि उत्पादन, जनसंख्या, रोजगार, उपभोग और सामाजिक परिस्थितियों से संबंधित आंकड़ों को एकत्र करने में क्रांति ला दी। बाद में इसी सोच के आधार पर भारत में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की स्थापना हुई, जिसने नीति निर्माण के लिए महत्वपूर्ण आंकड़े उपलब्ध कराए। आज भी भारत सरकार और विभिन्न अनुसंधान संस्थान सैंपल सर्वेक्षण की उसी वैज्ञानिक पद्धति का उपयोग करते हैं जिसकी नींव महालनोबिस ने रखी थी।1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत अनेक चुनौतियों से घिरा हुआ था। देश की अर्थव्यवस्था कमजोर थी, औद्योगिक आधार सीमित था, कृषि पिछड़ी हुई थी और व्यापक गरीबी व्याप्त थी।ऐसे समय में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ देश के विकास की योजना बनाने का निर्णय लिया। महालनोबिस इस प्रयास के प्रमुख स्तंभ बने।उन्होंने योजना आयोग के साथ मिलकर भारत के आर्थिक विकास का दीर्घकालिक खाका तैयार किया। उनका विश्वास था कि भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए भारी उद्योगों और पूंजीगत वस्तुओं के उत्पादन पर विशेष ध्यान देना होगा।
भारत की दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956–1961) महालनोबिस के आर्थिक मॉडल पर आधारित थी, जिसे फेल्डमैन–महालनोबिस मॉडल कहा जाता है।इस मॉडल का मूल विचार यह था कि यदि भारत को दीर्घकालिक आर्थिक विकास हासिल करना है तो उसे उन उद्योगों में निवेश करना होगा जो मशीनें, उपकरण और उत्पादन के साधन तैयार करते हैं।इस योजना के अंतर्गत—इस्पात उद्योग का विस्तार हुआ। भारी मशीनरी निर्माण को बढ़ावा मिला।बिजली उत्पादन में वृद्धि हुई। सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े उद्योग स्थापित हुए।वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा को प्रोत्साहन मिला।भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर जैसे विशाल इस्पात संयंत्रों की स्थापना इसी सोच का परिणाम थी। इन उद्योगों ने आगे चलकर भारत के औद्योगिक विकास की मजबूत नींव रखी।यद्यपि समय-समय पर इस मॉडल की आलोचनाएँ भी हुईं, लेकिन अधिकांश अर्थशास्त्री इस बात से सहमत हैं कि स्वतंत्रता के बाद भारत की औद्योगिक क्षमता के निर्माण में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
वैज्ञानिक सोच और नीति निर्माण -महालनोबिस केवल सांख्यिकीविद नहीं थे, बल्कि वे एक वैज्ञानिक चिंतक भी थे। उनका मानना था कि किसी भी नीति का आधार तथ्यों और प्रमाणों पर होना चाहिए।उन्होंने सरकार को यह समझाया कि योजनाएँ भावनाओं या अनुमान के आधार पर नहीं, बल्कि विश्वसनीय आंकड़ों और वैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर बनाई जानी चाहिए।आज जिस “Evidence Based Policy Making” की चर्चा पूरी दुनिया में होती है, उसकी भावना महालनोबिस के कार्यों में दशकों पहले दिखाई देती है।उन्होंने प्रशासन, अर्थव्यवस्था और समाज के हर क्षेत्र में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया। यही कारण है कि उन्हें आधुनिक भारत के प्रमुख राष्ट्र-निर्माताओं में गिना जाता है।
पी. सी. महालनोबिस की प्रतिभा केवल भारत तक सीमित नहीं रही। उनकी ख्याति विश्वभर में फैली। वे अनेक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक संगठनों और समितियों से जुड़े रहे।संयुक्त राष्ट्र सहित कई वैश्विक संस्थानों ने उनकी विशेषज्ञता का लाभ लिया। विश्व के प्रमुख सांख्यिकीविदों और अर्थशास्त्रियों ने उनके कार्यों की सराहना की।उनके शोधपत्र आज भी दुनिया के विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों में पढ़ाए जाते हैं। सांख्यिकी के क्षेत्र में उनका नाम सम्मान और प्रेरणा का प्रतीक माना जाता है।राष्ट्र निर्माण में उनके असाधारण योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें अनेक सम्मानों से अलंकृत किया। वर्ष 1968 में उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों द्वारा पुरस्कार, मानद उपाधियाँ और सदस्यताएँ प्रदान की गईं। लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान यह था कि उनके विचारों ने करोड़ों भारतीयों के जीवन को प्रभावित किया।
भारत सरकार ने पी. सी. महालनोबिस के सम्मान में उनके जन्मदिवस 29 जून को राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस घोषित किया।इस दिवस का उद्देश्य सांख्यिकी के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना और युवाओं को डेटा आधारित निर्णय लेने के लिए प्रेरित करना है।हर वर्ष इस अवसर पर देशभर में संगोष्ठियाँ, व्याख्यान, शोध कार्यक्रम और जागरूकता अभियान आयोजित किए जाते हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि आधुनिक विकास की नींव विश्वसनीय आंकड़ों और वैज्ञानिक विश्लेषण पर टिकी होती है। भारत डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, बिग डेटा और मशीन लर्निंग के युग में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सरकार से लेकर निजी क्षेत्र तक, हर जगह डेटा आधारित निर्णयों का महत्व बढ़ गया है।कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, वित्त, रक्षा, मौसम पूर्वानुमान, स्मार्ट शहर और डिजिटल शासन—सभी क्षेत्रों में सांख्यिकी की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो चुकी है।ऐसे समय में महालनोबिस के विचार हमें यह सिखाते हैं कि प्रगति का सही मार्ग तथ्यों, वैज्ञानिक सोच और सटीक आंकड़ों से होकर गुजरता है। उनकी दूरदृष्टि आज भी भारत के विकास पथ को दिशा प्रदान कर रही है।
पी. सी. महालनोबिस का जीवन ज्ञान, विज्ञान और राष्ट्रसेवा का अद्भुत संगम था। उन्होंने सिद्ध किया कि आंकड़े केवल कागजों पर लिखी संख्याएँ नहीं होते, बल्कि वे किसी राष्ट्र के भविष्य को आकार देने की शक्ति रखते हैं। उन्होंने सांख्यिकी को प्रयोगशालाओं से निकालकर खेतों, कारखानों, विश्वविद्यालयों और सरकारी नीतियों तक पहुँचाया।आज जब भारत विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में स्थान बनाने की ओर अग्रसर है, तब महालनोबिस की विरासत और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए हम यह संकल्प ले सकते हैं कि विज्ञान, तर्क और तथ्य आधारित सोच को अपने जीवन और समाज का आधार बनाएँगे। यही उस महान सांख्यिकीविद और राष्ट्रनिर्माता के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी, जिसने भारत को डेटा की शक्ति से परिचित कराया और आधुनिक विकास की राह है।


No comments:
Post a Comment