23 जून जयंती विशेष
Upgrade Jharkhand News. भारतीय राजनीति और राष्ट्रीय जीवन में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने पद, प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठकर राष्ट्र एवं समाज की सेवा को ही अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। ऐसे ही महान राष्ट्रनिष्ठ नेताओं में श्री जगन्नाथ राव जोशी का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। भारतीय जनसंघ के स्थापना काल से लेकर अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक उन्होंने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ज्योति को प्रज्वलित रखने का कार्य किया। अपने ओजस्वी वक्तृत्व, अदम्य साहस, संगठन क्षमता और त्यागमय जीवन के कारण वे पूरे देश में लोकप्रिय हुए तथा विशेष रूप से कर्नाटक में संगठन को गांव-गांव तक पहुंचाने के कारण उन्हें ‘कर्नाटक केसरी’ की उपाधि प्राप्त हुई।23 जून 1920 को कर्नाटक के नरगुंड गांव में जन्मे जगन्नाथ राव जोशी का जीवन राष्ट्रसेवा, संघर्ष और समर्पण की एक प्रेरणादायी गाथा है। उनकी जयंती केवल एक राजनीतिक नेता को स्मरण करने का अवसर नहीं, बल्कि राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानने वाली उस विचारधारा को समझने का भी अवसर है जिसके लिए उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।
जगन्नाथ राव जोशी का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता नरगुंड गांव के धर्मस्थलों की देखरेख का दायित्व निभाते थे। उनके परिवार में कर्नाटक और महाराष्ट्र दोनों संस्कृतियों का समन्वय था। पिता कर्नाटक मूल के थे जबकि माता महाराष्ट्र की थीं। यही कारण था कि बचपन से ही उन्हें कन्नड़ और मराठी दोनों भाषाओं पर समान अधिकार प्राप्त हो गया। आगे चलकर यही बहुभाषिक क्षमता उनके सार्वजनिक जीवन में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई। प्रारम्भिक शिक्षा उन्होंने अपने गांव में प्राप्त की। तीसरी कक्षा तक की पढ़ाई के बाद वे अपने मामा के पास पुणे चले गये। वहीं उनकी आगे की शिक्षा सम्पन्न हुई। उन्होंने अंग्रेजी विषय के साथ बी.एड. की उपाधि प्राप्त की और अंग्रेजी भाषा पर भी उत्कृष्ट अधिकार स्थापित किया। इस प्रकार वे कन्नड़, मराठी और अंग्रेजी—तीनों भाषाओं के प्रभावशाली वक्ता बन गये।पुणे में अध्ययन के दौरान उनका संपर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा से हुआ। संघ के अनुशासन, राष्ट्रभक्ति और समाज-सेवा के विचारों ने उनके जीवन को नई दिशा दी। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने कुछ समय सरकारी सेवा में कार्य किया, किन्तु उनका मन नौकरी में नहीं लगा। राष्ट्रकार्य की प्रेरणा इतनी प्रबल थी कि उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर संघ के पूर्णकालिक प्रचारक का जीवन स्वीकार कर लिया।प्रचारक के रूप में वे कर्नाटक भेजे गये। वहां उनकी निकटता तत्कालीन प्रांत प्रचारक श्री यादवराव जोशी से हुई। यादवराव जोशी के व्यक्तित्व और कार्यशैली का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। संगठन निर्माण, कार्यकर्ताओं के प्रति आत्मीयता और राष्ट्रकार्य के प्रति पूर्ण समर्पण जैसे गुण उन्होंने उनसे ही सीखे।
जगन्नाथ राव जोशी का जीवन केवल विचारों तक सीमित नहीं था। वे संघर्ष को राष्ट्रजीवन का आवश्यक अंग मानते थे और हर आंदोलन में अग्रिम पंक्ति में दिखाई देते थे।स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पहला प्रतिबंध लगाया गया, तब उन्होंने जेल जाकर भी अपने विचारों से समझौता नहीं किया। वे कारावास में रहे, लेकिन उनका मनोबल कभी नहीं टूटा।गोवा मुक्ति आंदोलन में अग्रणी भूमिका भारत की स्वतंत्रता के बाद भी गोवा पुर्तगाल के कब्जे में था। गोवा को स्वतंत्र कराने के लिए देशभर में आंदोलन चला। इस आंदोलन में जगन्नाथ राव जोशी ने अग्रणी भूमिका निभाई। उन्होंने पहले सत्याग्रही दल का नेतृत्व किया और गोवा की मुक्ति के लिए संघर्ष किया।इस आंदोलन के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और लगभग पौने दो वर्ष जेल में रहना पड़ा। जेल में उन्हें अनेक प्रकार की यातनाएं सहनी पड़ीं। इन अत्याचारों का प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर जीवनभर बना रहा, लेकिन उन्होंने कभी इसका प्रदर्शन नहीं किया। वे मानते थे कि राष्ट्रकार्य में कष्ट सहना गौरव की बात है, उसका बखान करना नहीं।गोवा की मुक्ति के बाद सरकार ने अनेक सत्याग्रहियों को सम्मानस्वरूप मकान दिए, लेकिन जगन्नाथ राव जोशी ने कोई लाभ स्वीकार नहीं किया। उनका मानना था कि राष्ट्र के लिए किया गया कार्य पुरस्कार पाने के लिए नहीं होता।
भारतीय जनसंघ के निर्माण और विस्तार में जगन्नाथ राव जोशी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। वे उन नेताओं में थे जिन्होंने जनसंघ को केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्जागरण का माध्यम माना।1965 में भारत-पाकिस्तान संघर्ष के बाद हुए कच्छ समझौते का उन्होंने जोरदार विरोध किया। इसके लिए उन्होंने पूरे देश का व्यापक दौरा किया और अपने प्रभावशाली भाषणों से जनता को जागरूक किया। उनकी वाणी में ऐसा ओज था कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे।उनके भाषण केवल राजनीतिक नहीं होते थे, बल्कि उनमें इतिहास, संस्कृति, राष्ट्रभाव और सामाजिक चेतना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता था। यही कारण था कि वे देश के सर्वाधिक लोकप्रिय वक्ताओं में गिने जाते थे।1967 में वे लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। संसद में भी उन्होंने राष्ट्रहित के प्रश्नों को पूरी निर्भीकता से उठाया। वे सत्ता के दबाव में आने वाले नेताओं में नहीं थे। उनकी पहचान स्पष्टवादिता और निडरता थी।1975 में जब देश में आपातकाल लागू किया गया, तब लोकतंत्र के अनेक प्रहरी मौन हो गये थे, लेकिन जगन्नाथ राव जोशी उन नेताओं में थे जिन्होंने इसका खुलकर विरोध किया।कहा जाता है कि जब एक सांसद ने उन्हें जेल जाने का भय दिखाया तो उन्होंने तीखे शब्दों में उत्तर दिया—"जेल का डर किसे दिखाते हो? जो सालाजार से नहीं डरे, जो पुर्तगालियों से नहीं डरे, वे तुमसे क्या डरेंगे?"
उनकी निर्भीकता सत्ता को असहज कर देती थी। परिणामस्वरूप उन्हें दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद कर दिया गया। परंतु जेल जाने से उनका उत्साह कम नहीं हुआ। वे लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत रहे।1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद अनेक नेताओं को महत्वपूर्ण पद प्राप्त हुए। जगन्नाथ राव जोशी को भी राज्यपाल बनने का प्रस्ताव दिया गया। सामान्यतः कोई भी राजनेता ऐसे पद को सम्मानपूर्वक स्वीकार करता, लेकिन उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया।उन्होंने सत्ता और पद की अपेक्षा संगठन निर्माण को अधिक महत्व दिया। उनका मानना था कि राष्ट्रजीवन में स्थायी परिवर्तन मजबूत संगठन और जागरूक समाज के माध्यम से ही संभव है। इसलिए उन्होंने राज्यपाल बनने के बजाय पूरे देश में घूमकर संगठन को सशक्त बनाने का कार्य चुना।
जगन्नाथ राव जोशी की पहचान केवल एक राजनेता या संगठनकर्ता के रूप में नहीं थी। वे एक उत्कृष्ट वक्ता, रोचक कथाकार और विलक्षण हाजिरजवाब व्यक्ति भी थे।वे कथा, कहानी, चुटकुले, शब्द पहेलियां और रोचक प्रसंग सुनाने में निपुण थे। उनकी सभाओं में गंभीर विषयों के साथ-साथ हास्य का भी अद्भुत समावेश होता था। वे कठिन से कठिन विषय को सरल और मनोरंजक शैली में प्रस्तुत कर देते थे।लोग उनकी तुलना बीरबल से करते थे। किसी भी प्रश्न का उत्तर वे इतनी सहजता और चतुराई से देते थे कि सामने वाला निरुत्तर हो जाता था।उनके एक मित्र ने उनके क्रोध की तुलना ‘प्रेशर कुकर’ से की थी। उनका कहना था कि जगन्नाथ जी का क्रोध प्रेशर कुकर की सीटी की तरह होता था—तेज आवाज करता था, लेकिन कुछ ही क्षणों में शांत भी हो जाता था। वे मन में किसी के प्रति दुर्भावना नहीं रखते थे।जगन्नाथ राव जोशी का सबसे बड़ा योगदान कर्नाटक में संगठन का व्यापक विस्तार माना जाता है। उन्होंने गांव-गांव जाकर कार्यकर्ताओं का निर्माण किया और संगठन को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का प्रयास किया।उनकी मेहनत का परिणाम यह हुआ कि कर्नाटक में जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी की मजबूत नींव तैयार हुई। आज जिस राजनीतिक और वैचारिक विस्तार को देखा जाता है, उसमें जगन्नाथ राव जोशी जैसे कर्मयोगियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।उनके इसी योगदान के कारण उन्हें प्रेमपूर्वक ‘कर्नाटक केसरी’ कहा गया।
त्याग और सादगी की अनुपम मिसाल -आज जब राजनीति में संपत्ति, वैभव और व्यक्तिगत लाभ की चर्चा अधिक होती है, तब जगन्नाथ राव जोशी का जीवन एक आदर्श प्रस्तुत करता है। वे कई वर्षों तक सांसद रहे, देशभर में प्रसिद्ध नेता थे, लेकिन उन्होंने कभी निजी संपत्ति अर्जित नहीं की। गांव में उनके हिस्से की खेती भूमि कानूनों के अंतर्गत चली गई। माता के निधन के बाद उन्होंने अपने पुश्तैनी घर पर भी अधिकार छोड़ दिया।जीवनभर सार्वजनिक जीवन में रहने के बावजूद उनके पास व्यक्तिगत संपत्ति के नाम पर लगभग कुछ भी नहीं था। उनका पूरा जीवन संघ के प्रचारक और राष्ट्रसेवक की भावना का जीवंत उदाहरण था।
लगातार प्रवास, अनियमित दिनचर्या और अत्यधिक परिश्रम के कारण वे मधुमेह से पीड़ित हो गये। बाद में अंगूठे में लगी चोट गंभीर हो गई और गैंग्रीन के कारण उनका पैर काटना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने कार्य करना नहीं छोड़ा।स्वास्थ्य निरंतर गिरता गया और अंततः 15 जुलाई 1991 को इस महान राष्ट्रभक्त का निधन हो गया। उनका शरीर भले ही पंचतत्व में विलीन हो गया, लेकिन उनके विचार, त्याग और राष्ट्रनिष्ठा आज भी लाखों कार्यकर्ताओं को प्रेरणा देती है।जगन्नाथ राव जोशी का जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व पद, प्रतिष्ठा और सत्ता से नहीं, बल्कि त्याग, समर्पण और राष्ट्रहित के प्रति अटूट निष्ठा से निर्मित होता है। उन्होंने संघर्ष किया, जेल गए, यातनाएं सहीं, लेकिन कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उन्होंने संगठन को स्वयं से बड़ा माना और राष्ट्र को व्यक्तिगत जीवन से ऊपर रखा।
आज उनकी जयंती पर उन्हें स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि अर्पित करना नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लेना भी है। राष्ट्रसेवा, सादगी, ईमानदारी और संगठन के प्रति समर्पण की जो विरासत उन्होंने छोड़ी, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बनी रहेगी।

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