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Jamshedpur भूमिगत क्रांति और नारी शिक्षा की अग्रदूत : लीला रॉय Pioneer of underground revolution and women's education: Leela Roy

 


Upgrade Jharkhand News. भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल पुरुष क्रांतिकारियों के साहस और बलिदान की गाथाओं तक सीमित नहीं है। इस इतिहास में अनेक ऐसी वीरांगनाओं के नाम भी स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं, जिन्होंने अपने साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति से स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा प्रदान की। ऐसी ही महान क्रांतिकारी, शिक्षाविद्, पत्रकार और समाज सुधारिका थीं लीला रॉय। उनका जीवन राष्ट्रसेवा, महिला सशक्तिकरण और स्वतंत्रता संघर्ष के प्रति समर्पण का अद्वितीय उदाहरण है।लीला रॉय का जन्म 2 अक्टूबर 1900 को तत्कालीन पूर्वी बंगाल के ढाका में एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उनका प्रारंभिक नाम लीला नाग था। बचपन से ही वे प्रतिभाशाली, स्वाभिमानी और राष्ट्रवादी विचारों से प्रभावित थीं। उस समय भारतीय समाज में महिलाओं की शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी अत्यंत सीमित थी, किंतु लीला नाग ने इन सामाजिक बंधनों को चुनौती देते हुए उच्च शिक्षा प्राप्त की और समाज में महिलाओं की भूमिका को नई पहचान दिलाने का कार्य किया।


उन्होंने ढाका विश्वविद्यालय और कलकत्ता में शिक्षा प्राप्त की। अध्ययन काल में ही वे राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़ गईं। इसी दौरान उनका संपर्क क्रांतिकारी संगठन "मुक्ति संघ" से हुआ। उन्होंने अनुभव किया कि देश की आधी आबादी अर्थात महिलाएं यदि शिक्षित और जागरूक नहीं होंगी, तो स्वतंत्रता का सपना अधूरा रहेगा। इसी विचार को साकार करने के लिए उन्होंने "दीपाली संघ" की स्थापना की। यह संगठन देखने में एक सामाजिक और शैक्षणिक संस्था था, किंतु इसके माध्यम से युवतियों को राष्ट्रभक्ति, आत्मरक्षा और संगठन की शिक्षा भी दी जाती थी।


दीपाली संघ के अंतर्गत उन्होंने "दीपाली स्कूल", "नारी शिक्षा मंदिर", "शिक्षा भवन" और "शिक्षा निकेतन" जैसी अनेक संस्थाओं की स्थापना की। इन संस्थानों का उद्देश्य केवल औपचारिक शिक्षा प्रदान करना नहीं था, बल्कि महिलाओं में आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्रीय चेतना का विकास करना भी था। अंग्रेजी शासन की गुप्तचर रिपोर्टों में भी उल्लेख मिलता है कि इन संस्थाओं में कई युवतियों को क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए प्रेरित और प्रशिक्षित किया जाता था।भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने में लीला रॉय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। प्रसिद्ध क्रांतिकारी और प्रथम महिला शहीदों में गिनी जाने वाली प्रीतिलता वाड्डेदार भी उनके मार्गदर्शन से प्रभावित थीं। लीला रॉय ने अनेक युवतियों को देशभक्ति और त्याग का पाठ पढ़ाया। उनके प्रयासों से महिलाओं में यह विश्वास पैदा हुआ कि वे केवल घर-परिवार तक सीमित रहने वाली शक्ति नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं।


लीला रॉय ने अपने पति अनिल रॉय के साथ मिलकर कई गुप्त क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन किया। वे पुलिस और ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों की निगाहों से बचते हुए "मुक्ति संघ" और बाद में "श्री संघ" के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन को संगठित करती रहीं। ढाका के पुलिस महानिरीक्षक लोमैन की हत्या के पीछे भी उनके संगठन की भूमिका बताई जाती है। ब्रिटिश सरकार उनकी गतिविधियों से चिंतित थी और अंततः उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।जेल जीवन की कठिन परिस्थितियों ने उनके संकल्प को कमजोर नहीं किया। उन्होंने कारावास के दौरान भी अपने विचारों और सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। वर्ष 1937 में रिहा होने के बाद वे पुनः राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय हो गईं। इस समय तक उनका व्यक्तित्व केवल एक क्रांतिकारी के रूप में ही नहीं, बल्कि एक प्रभावशाली सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक चिंतक के रूप में भी स्थापित हो चुका था।


स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने "जयश्री" नामक राष्ट्रवादी पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। इस पत्रिका के माध्यम से वे महिलाओं की समस्याओं, राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक सुधारों के मुद्दों को प्रभावशाली ढंग से उठाती थीं। उस समय जब पत्रकारिता पर ब्रिटिश शासन का कठोर नियंत्रण था, तब ऐसी पत्रिका का प्रकाशन स्वयं एक साहसिक कार्य था।नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ भी उनके घनिष्ठ संबंध रहे। जब नेताजी को कांग्रेस से अलग होना पड़ा, तब लीला रॉय ने उनका खुलकर समर्थन किया। वे नेताजी के विचारों और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से अत्यंत प्रभावित थीं। उन्होंने जीवन भर नेताजी के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी और उनके विचारों के प्रचार-प्रसार में योगदान दिया।भारत की स्वतंत्रता के बाद लीला रॉय की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई। वे संविधान सभा की सदस्य बनीं और देश के भविष्य को आकार देने वाली बहसों में सक्रिय रूप से भाग लिया। संविधान निर्माण की प्रक्रिया में शामिल चुनिंदा महिलाओं में उनका नाम प्रमुखता से लिया जाता है। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सामाजिक समानता से जुड़े मुद्दों पर प्रभावी ढंग से अपने विचार रखे।


विशेष रूप से हिंदू कोड बिल के संदर्भ में महिलाओं को संपत्ति और उत्तराधिकार के अधिकार दिलाने की दिशा में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। उस समय महिलाओं के अधिकारों को लेकर समाज में व्यापक मतभेद थे, किंतु लीला रॉय ने दृढ़ता के साथ महिलाओं की समानता और सम्मान की वकालत की। उनके विचार आधुनिक भारत में महिला अधिकारों की मजबूत नींव साबित हुए।लीला रॉय का जीवन यह प्रमाणित करता है कि शिक्षा और संगठन समाज परिवर्तन के सबसे प्रभावी साधन हैं। उन्होंने यह दिखाया कि राष्ट्र निर्माण केवल राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक चेतना, महिला सशक्तिकरण और समान अवसरों की स्थापना भी उतनी ही आवश्यक है।


11 जून 1970 को उनका निधन हो गया। यद्यपि उन्हें अपने योगदान के अनुरूप प्रसिद्धि नहीं मिल सकी, फिर भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, महिला शिक्षा और सामाजिक सुधारों के इतिहास में उनका स्थान अत्यंत सम्मानजनक है। आज आवश्यकता है कि नई पीढ़ी उनके जीवन और कार्यों से परिचित हो तथा उनसे प्रेरणा ग्रहण करे।लीला रॉय का संपूर्ण जीवन त्याग, साहस, शिक्षा और राष्ट्रसेवा का प्रतीक था। उन्होंने जिस नारी शक्ति का स्वप्न देखा था, वह आज भारत की प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए हम यह संकल्प लें कि शिक्षा, समानता और राष्ट्रहित के उनके आदर्शों को आगे बढ़ाने का कार्य निरंतर करते रहेंगे। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 


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