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Bhopal तंबूरे के बाद का सन्नाटा: मद्धिम हुई पंडवानी की धड़कन The silence after the tamboura: the beat of Pandavani slows down

 


Upgrade Jharkhand News.  तीजन बाई नहीं रही, यह केवल एक महान लोक कलाकार के निधन का समाचार नहीं है,यह उस लोक-संसार की मद्धिम पड़ती धड़कनों का भी समाचार है, जिसने उन्हें जन्म दिया, गढ़ा और दुनिया के सामने प्रस्तुत किया।  कुछ लोग चले जाते हैं, लेकिन उनके साथ एक पूरा युग भी विदा होने लगता है। तीजन बाई का जाना ऐसा ही क्षण है। यह किसी एक कलाकार का अंत नहीं, बल्कि उस जीवित सांस्कृतिक परंपरा की क्षति है, जिसमें गीत केवल गाए नहीं जाते, पीढ़ियों से जिए जाते हैं,कथाएँ केवल सुनाई नहीं जातीं, बल्कि सामूहिक स्मृति बनकर समाज की आत्मा में बसती हैं।  लोक की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि उसका कोई एक रचनाकार नहीं होता। वह किसी एक कवि, लेखक या संगीतकार की निजी संपत्ति नहीं होती। लोक को पूरा समाज रचता है। अनगिनत कंठ, असंख्य अनुभव, सदियों की स्मृतियाँ और अनाम लोगों का जीवन मिलकर उसे आकार देते हैं। इसलिए जब कोई लोक कलाकार विदा होता है, तो उसके साथ केवल एक स्वर नहीं टूटता, बल्कि स्मृतियों का एक पुल भी दरकने लगता है।


आज प्रश्न यह नहीं है कि हम केवल तीजन बाई के निधन पर शोक व्यक्त करें। प्रश्न यह भी है कि क्या हम उस लोक-जगत के क्षरण को पहचान पा रहे हैं, जिसकी सबसे सशक्त आवाज़ वे थीं? क्या हम उस सांस्कृतिक भूगोल के विलुप्त होने का दर्द महसूस कर रहे हैं, जहाँ से पंडवानी जैसी परंपराएँ जन्म लेती हैं? पिछले कुछ दशकों में भारतीय गाँवों का स्वरूप तेजी से बदला है। खेत छोटे होते गए, खेती महँगी और कठिन होती गई। रोज़गार की तलाश में लाखों लोग गाँव छोड़कर शहरों की ओर चले गए। जिन चौपालों पर संध्या उतरते ही आल्हा, पंडवानी, बिरहा, कजरी और लोककथाओं की स्वर-लहरियाँ देर रात तक गूँजती थीं, वहाँ अब जल्दी सन्नाटा उतर आता है। घर अब भी खड़े हैं, लेकिन उनके भीतर बसने वाला सामूहिक जीवन धीरे-धीरे विरल होता जा रहा है। लोक का सबसे बड़ा विद्यालय कोई भवन नहीं होता। उसका विद्यालय होता है,साथ बैठना, साथ गाना, साथ सुनना और साथ याद रखना। लोक परंपरा पुस्तकों से कम और मनुष्यों के बीच अधिक जीवित रहती है। वह रिश्तों की ऊष्मा, साझा श्रम और सामूहिक स्मृतियों में साँस लेती है। जब यह साझापन टूटता है, तब केवल समाज नहीं बदलता, लोक भी धीरे-धीरे अपनी जड़ों से कटने लगता है।


गाँव से शहर जाने वाला व्यक्ति अपनी भाषा, अपने गीत और अपनी स्मृतियाँ मन की गठरी में बाँधकर तो ले जाता है, लेकिन उन्हें जीने वाला परिवेश पीछे छूट जाता है। उसकी अगली पीढ़ी उन गीतों को विरासत की वस्तु की तरह जानती है, जीवन की स्वाभाविक लय की तरह नहीं। लोक तब जीवन से निकलकर संग्रहालय, मंच और उत्सवों की वस्तु बनने लगता है।  यही हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना है। लोककलाएँ आज पहले से अधिक मंचों पर दिखाई देती हैं। सांस्कृतिक महोत्सवों में उनका प्रदर्शन होता है, उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिलते हैं, लेकिन जिस मिट्टी में उनकी जड़ें थीं, वह लगातार बंजर होती जा रही है। यह वैसा ही है जैसे किसी वृक्ष की शाखाओं पर रंग-बिरंगी झालरें सजा दी जाएँ, पर उसकी जड़ों तक पानी पहुँचना बंद हो जाए। तीजन बाई ने पंडवानी को विश्व के सबसे प्रतिष्ठित मंचों तक पहुँचाया। उन्होंने सिद्ध किया कि लोक किसी भी आधुनिक कला से कम समृद्ध नहीं है। लेकिन उनके जीवन की सबसे बड़ी सीख शायद यह है कि लोककला केवल किसी कलाकार की प्रतिभा से नहीं बचती, वह उस समाज से बचती है, जो उसे रोज़मर्रा के जीवन में जीता है।


यही कारण है कि आज सबसे बड़ा प्रश्न तीजन बाई की अनुपस्थिति का नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक वातावरण का है, जो अगली तीजन बाई को जन्म दे सके। क्या आने वाले वर्षों में वैसे गाँव बचेंगे? क्या वैसी चौपालें बचेंगी? क्या बच्चों को अपने बुज़ुर्गों से महाभारत, रामायण और लोककथाएँ सुनने का अवसर मिलेगा? क्या लोकभाषाएँ घरों की भाषा बनी रहेंगी, या केवल शोध-पत्रों और विश्वविद्यालयों के विषय बनकर रह जाएँगी? यदि इन प्रश्नों का उत्तर नहीं में है, तो समझ लेना चाहिए कि संकट केवल लोककलाओं का नहीं, हमारी सांस्कृतिक स्मृति का है।  तीजन बाई चली गई हैं, लेकिन उनकी आवाज़ अब भी भारतीय लोकचेतना में गूँजती रहेगी। जब भी कोई युवा कलाकार तंबूरा उठाकर पंडवानी गाएगा, जब भी किसी गाँव की चौपाल पर महाभारत की कथा लोकस्वर में सुनाई जाएगी, जब भी कोई बच्चा पहली बार किसी लोकगाथा को विस्मय से सुनेगा, वहाँ कहीं न कहीं तीजन बाई मौजूद होंगी।


कुछ कलाकार इतिहास की किताबों में दर्ज नहीं होते, वे लोगों की स्मृतियों में बस जाते हैं। तीजन बाई ऐसी ही कलाकार थीं। उनका जाना हमें केवल शोकाकुल नहीं करता, बल्कि यह याद दिलाता है कि यदि हमें अपनी लोकपरंपराओं को बचाना है, तो केवल कलाकारों का सम्मान करना पर्याप्त नहीं होगा। हमें उस लोकजीवन, उस साझी संस्कृति और उस सामुदायिक संसार को भी बचाना होगा, जहाँ से ऐसे कलाकार जन्म लेते हैं। तीजन बाई के जाने के बाद हमारे सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही रह गया है,क्या हम केवल उनकी स्मृति को सुरक्षित रखेंगे, या उस लोक-संसार को भी बचा पाएँगे, जिसने उन्हें अमर बनाया? कुमार कृष्णन



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