भारत में बड़ी संख्या में युवा बीए, बीएससी और बीकॉम जैसी सामान्य डिग्रियां कर रहे हैं। इन डिग्रियों का अपना महत्व है और इन्हें बेकार कहना सही नहीं होगा। समस्या इन डिग्रियों में नहीं, बल्कि इस बात में है कि इनके पाठ्यक्रम और रोजगार के बीच पर्याप्त संबंध नहीं बनाया गया है। विद्यार्थी तीन या चार साल तक पढ़ाई करता है, परीक्षा देता है और डिग्री हासिल करता है, लेकिन जब नौकरी की तलाश शुरू करता है तो उसे पता चलता है कि केवल डिग्री पर्याप्त नहीं है। नीति आयोग के अनुसार देश में लगभग 3.4 करोड़ विद्यार्थी स्नातक स्तर के कार्यक्रमों में पढ़ रहे हैं। इनमें लगभग 1.13 करोड़ विद्यार्थी बीए में हैं। बीए, बीएससी और बीकॉम में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या दो करोड़ से अधिक है। इतनी बड़ी संख्या में युवाओं को यदि ऐसी शिक्षा मिल रही है, जिसका रोजगार से कमजोर संबंध है, तो इसका असर केवल इन युवाओं पर नहीं पड़ता, बल्कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
आज रोजगार की दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। कंप्यूटर, इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल सेवाओं, डेटा, ई-कॉमर्स और नई तकनीकों ने काम करने के तरीके बदल दिए हैं। कंपनियों को ऐसे युवाओं की जरूरत है जो केवल किताबों का ज्ञान न रखते हों, बल्कि उस ज्ञान का इस्तेमाल वास्तविक काम में भी कर सकें। उन्हें कंप्यूटर का उपयोग करना, समस्याओं का समाधान करना, लोगों के साथ प्रभावी ढंग से बातचीत करना, नई तकनीक सीखना और बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को तैयार करना भी आना चाहिए। लेकिन हमारे अनेक कॉलेजों में पढ़ाई अभी भी काफी हद तक किताब, परीक्षा और अंक तक सीमित है। विद्यार्थियों को वास्तविक काम का अनुभव बहुत कम मिलता है। इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप, प्रोजेक्ट और उद्योग से जुड़ा प्रशिक्षण कई जगह पर्याप्त नहीं है। इसके कारण कॉलेज से निकलने वाला युवा और नौकरी देने वाली कंपनी की जरूरत के बीच एक बड़ा अंतर पैदा हो जाता है।
यह स्थिति विद्यार्थियों के साथ अन्याय है। एक युवा अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण वर्ष पढ़ाई में लगाता है। उसके परिवार का पैसा खर्च होता है। परिवार को उम्मीद होती है कि शिक्षा पूरी होने के बाद उसके बच्चे को नौकरी मिलेगी। लेकिन डिग्री लेने के बाद जब युवा नौकरी के लिए जाता है तो उससे ऐसे कौशल की मांग की जाती है, जो उसे कॉलेज में सिखाए ही नहीं गए। फिर उसे अलग से कंप्यूटर कोर्स, तकनीकी प्रशिक्षण, अंग्रेजी या संचार कौशल और दूसरे प्रमाणपत्र हासिल करने पड़ते हैं। इस समस्या का एक कारण सरकारी नौकरी के प्रति बहुत अधिक निर्भरता भी है। भारत में सरकारी नौकरी को सुरक्षित और सम्मानजनक माना जाता है। इसलिए बड़ी संख्या में युवा स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लग जाते हैं। सरकारी नौकरियां सीमित हैं, लेकिन उनके लिए आवेदन करने वालों की संख्या बहुत अधिक है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार नवंबर 2024 से जुलाई 2025 के बीच लगभग 1.86 करोड़ आवेदन केवल 55,000 सरकारी पदों के लिए आए। इससे समझा जा सकता है कि सरकारी नौकरी की होड़ कितनी बड़ी है।
सरकारी नौकरी पाना गलत लक्ष्य नहीं है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब युवा कई वर्षों तक केवल एक परीक्षा के इंतजार में अपनी दूसरी संभावनाओं को छोड़ देता है। यदि शिक्षा के दौरान उसे अलग-अलग रोजगार, कौशल और व्यवसाय के रास्तों की जानकारी मिले तो वह अपने लिए कई विकल्प तैयार कर सकता है। दुर्भाग्य से हमारे यहां करियर संबंधी सही और समय पर सलाह की व्यवस्था अभी भी कमजोर है। एक और बड़ी समस्या यह है कि हमारे समाज में कौशल आधारित शिक्षा को वह सम्मान नहीं मिलता, जो सामान्य डिग्री को मिलता है। कई परिवार मानते हैं कि विश्वविद्यालय की डिग्री ही अच्छी शिक्षा है, जबकि तकनीकी प्रशिक्षण या व्यावसायिक शिक्षा कम स्तर की होती है। यह सोच बदलनी जरूरी है। एक कुशल तकनीशियन, इलेक्ट्रिशियन, मशीन ऑपरेटर, डिजिटल विशेषज्ञ, डिजाइनर या किसी तकनीकी क्षेत्र का प्रशिक्षित व्यक्ति भी सम्मानजनक जीवन जी सकता है और अच्छी आय प्राप्त कर सकता है।
नीति आयोग की रिपोर्ट में कौशल प्रशिक्षण के आर्थिक लाभ की ओर भी ध्यान दिलाया गया है। रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार सामान्य स्नातक डिग्री लेने वाले और अतिरिक्त कौशल प्रशिक्षण न पाने वाले युवाओं की औसत शुरुआती आय लगभग 22,000 रुपये प्रतिमाह थी, जबकि कौशल प्रशिक्षण लेने वालों की औसत शुरुआती आय लगभग 29,000 रुपये प्रतिमाह बताई गई। इसका मतलब साफ है कि केवल डिग्री की तुलना में डिग्री के साथ उपयोगी कौशल रोजगार और आय की संभावना को बढ़ा सकता है। इसलिए समाधान यह नहीं है कि बीए, बीएससी या बीकॉम जैसी डिग्रियों को बंद कर दिया जाए। जरूरत इन डिग्रियों को बदलती दुनिया की जरूरतों के साथ जोड़ने की है। बीए के विद्यार्थियों को डिजिटल कम्युनिकेशन, मीडिया, प्रशासन, पर्यटन या दूसरे रोजगार से जुड़े कौशल दिए जा सकते हैं। बीएससी के विद्यार्थियों को प्रयोगशाला और तकनीकी प्रशिक्षण के अधिक अवसर दिए जा सकते हैं। बीकॉम के विद्यार्थियों को डिजिटल वित्त, डेटा, ई-कॉमर्स और आधुनिक लेखांकन से जोड़ा जा सकता है।
हर विद्यार्थी को पढ़ाई के दौरान कुछ समय वास्तविक काम का अनुभव मिलना चाहिए। कॉलेजों को कंपनियों और अन्य संस्थानों के साथ मजबूत संबंध बनाने चाहिए। विद्यार्थियों को इंटर्नशिप और अप्रेंटिसशिप के अवसर मिलने चाहिए। इससे उन्हें पढ़ाई के साथ यह समझने का मौका मिलेगा कि वास्तविक कार्यस्थल पर किस तरह काम किया जाता है। शिक्षकों को भी नई तकनीक और रोजगार की बदलती जरूरतों के बारे में लगातार प्रशिक्षण मिलना चाहिए। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में ऐसे विशेषज्ञों को भी बुलाया जाना चाहिए, जो वास्तविक उद्योग और कार्यक्षेत्र से जुड़े हों। करियर काउंसलिंग को भी उच्च शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। विद्यार्थी को केवल यह नहीं बताया जाना चाहिए कि कौन-सा विषय पढ़ना है। उसे यह भी बताया जाना चाहिए कि उस विषय को पढ़ने के बाद उसके पास कौन-कौन से रोजगार हो सकते हैं, किन कौशलों की जरूरत होगी और वह आगे किस दिशा में जा सकता है। यदि विद्यार्थी को यह जानकारी 18 वर्ष की उम्र में मिल जाए, तो वह 25 वर्ष की उम्र में नौकरी की तलाश करते समय कहीं बेहतर स्थिति में होगा।
सबसे जरूरी बात यह है कि हमें शिक्षा को केवल डिग्री पाने का माध्यम मानना बंद करना होगा। शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति में सोचने, समझने, समस्या हल करने, संवाद करने और नई परिस्थितियों के अनुसार खुद को बदलने की क्षमता पैदा करना भी है। रोजगार के लिए जरूरी कौशल इसी शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। डॉ.शैलेश शुक्ला

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