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Bhopal बिहार में सहायक प्राध्यापक भर्ती पर संग्राम,आंदोलनकारियों को मिली राहत Struggle over assistant professor recruitment in Bihar, agitators get relief

 


Upgrade Jharkhand News.  बिहार में सहायक प्राध्यापक भर्ती को लेकर 21 दिनों से चल रहा आंदोलन आखिरकार संवाद और सहमति के मुकाम तक पहुंच गया। पटना के गर्दनीबाग में आमरण अनशन पर बैठे पीएचडी धारकों और शोधार्थियों ने राज्यपाल अता हसनैन से लोक भवन में करीब दो घंटे बातचीत के बाद अनशन समाप्त करने का फैसला किया। बातचीत में सहायक प्राध्यापक भर्ती परिनियम, 2026 को संशोधन तक स्थगित रखने और 15 दिनों के भीतर उच्चस्तरीय समीक्षा समिति गठित करने पर सहमति बनी है। सबसे अहम बात यह है कि संशोधन होने तक 2026 के परिनियम के आधार पर सहायक प्राध्यापकों की नियमित या संविदा नियुक्ति नहीं की जाएगी। समिति में प्रमुख शिक्षाविदों के अलावा शिक्षा क्षेत्र में अनुभव रखने वाले प्रशासकों को शामिल किया जाएगा। समिति आंदोलनकारियों की उम्र सीमा, लिखित परीक्षा, एपीआई, शोध प्रकाशन, अनुभव और अतिथि सहायक प्राध्यापकों से जुड़े मुद्दों पर विचार करेगी। आंदोलनकारियों के लिए यह तत्काल राहत जरूर है, लेकिन पूरी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। अब असली सवाल यह है कि 15 दिनों में समिति बनती है या नहीं और समिति की सिफारिशों के आधार पर भर्ती नियमों में कितना बदलाव किया जाता है।


आंदोलन का सबसे बड़ा मुद्दा सहायक प्राध्यापक भर्ती में अधिकतम उम्र सीमा रहा है। अभ्यर्थियों का कहना है कि नई नियमावली में उम्र सीमा 55 वर्ष से घटाकर 40 वर्ष किए जाने से बड़ी संख्या में पीएचडी धारक,शोधार्थी और वर्षों से अतिथि शिक्षक के रूप में काम कर रहे लोग भर्ती प्रक्रिया से बाहर हो सकते हैं। अभ्यर्थियों का तर्क है कि उच्च शिक्षा में शोध और पीएचडी की प्रक्रिया लंबी होती है। स्नातकोत्तर शिक्षा, नेट-जेआरएफ, शोध पंजीकरण, पीएचडी और शोध प्रकाशन में कई वर्ष लग जाते हैं। इसके बाद स्थायी नियुक्ति का अवसर मिले, तब तक बड़ी संख्या में अभ्यर्थी निर्धारित उम्र सीमा पार कर जाते हैं। यही वजह है कि आंदोलनकारी अधिकतम उम्र सीमा 55 वर्ष रखने की मांग कर रहे थे। अब यह मुद्दा समीक्षा समिति के सामने रखा जाएगा। साथ ही उम्र सीमा को एक साथ कम करने के बजाय चरणबद्ध तरीके से कम करने के प्रस्ताव पर भी विचार होगा। अभ्यर्थियों ने बिहार के विश्वविद्यालयों में लंबे समय से नियमित नियुक्तियां नहीं होने का मुद्दा भी उठाया है। उनका कहना है कि करीब तीन दशक में सहायक प्राध्यापक पदों पर केवल कुछ अवसरों पर ही व्यापक स्तर पर बहाली हुई है। रिक्तियों के बावजूद नियमित नियुक्ति नहीं होने से विश्वविद्यालयों को अतिथि और संविदा शिक्षकों पर निर्भर रहना पड़ा।


इसका असर सिर्फ शिक्षकों के रोजगार पर नहीं पड़ा। विश्वविद्यालयों में शिक्षण व्यवस्था भी अस्थायी कर्मचारियों पर निर्भर होती चली गई। इसलिए आंदोलनकारियों की मांग है कि प्रत्येक वर्ष रिक्त पदों की गणना कर नियमित नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की जाए। यह मांग बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है। यदि विश्वविद्यालयों में नियमित शिक्षक नहीं होंगे तो शोध, स्नातकोत्तर शिक्षा और अकादमिक गतिविधियों की निरंतरता प्रभावित होगी। सहायक प्राध्यापक भर्ती की चयन प्रक्रिया में लिखित परीक्षा को शामिल करने की मांग भी आंदोलन का प्रमुख मुद्दा रही। आंदोलनकारियों का सुझाव है कि परीक्षा वस्तुनिष्ठ प्रकृति की हो। लिखित परीक्षा में सफल अभ्यर्थियों के एपीआई यानी अकादमिक प्रदर्शन संकेतक के अंक जोड़े जाएं। इसके बाद लिखित परीक्षा और एपीआई के आधार पर समेकित मेरिट सूची बनाई जाए और निर्धारित संख्या में अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया जाए। इस व्यवस्था के पीछे तर्क यह है कि केवल साक्षात्कार के आधार पर चयन में व्यक्तिपरकता की गुंजाइश रहती है। दूसरी ओर केवल लिखित परीक्षा के आधार पर विश्वविद्यालय शिक्षक का चयन करना भी पर्याप्त नहीं हो सकता। शिक्षक के लिए विषय ज्ञान के साथ शोध और अध्यापन की क्षमता भी जरूरी है। इसलिए लिखित परीक्षा, अकादमिक उपलब्धि और अध्यापन क्षमता का एक साथ मूल्यांकन करने की व्यवस्था बनाई जा सकती है। समीक्षा समिति के सामने इंटरव्यू में टीचिंग डेमो शामिल करने का प्रस्ताव भी रखा जाएगा। यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि विश्वविद्यालय शिक्षक का काम केवल शोध करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को पढ़ाना भी है।


किसी शिक्षक की विषय समझ तभी उपयोगी है जब वह उसे विद्यार्थियों तक प्रभावी ढंग से पहुंचा सके। इसलिए लिखित परीक्षा से विषय ज्ञान, एपीआई से अकादमिक उपलब्धि और टीचिंग डेमो से अध्यापन क्षमता का आकलन करने की व्यवस्था बनाई जा सकती है,हालांकि टीचिंग डेमो के मूल्यांकन के लिए स्पष्ट मानक जरूरी होंगे। यदि इसके अंक तय करने की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं हुई तो वही पुरानी शिकायतें दोबारा उठ सकती हैं।        आंदोलनकारियों ने एपीआई को लेकर भी कई मांगें रखी हैं। उनकी मांग है कि मैट्रिक और इंटरमीडिएट के अंकों को एपीआई में शामिल नहीं किया जाए। नेट और जेआरएफ को पर्याप्त महत्व दिया जाए। पीएचडी के लिए कम से कम 30 अंक का प्रावधान हो। शोध प्रकाशन और अनुभव को भी एपीआई में शामिल किया जाए। लेकिन यहां सबसे बड़ी जरूरत स्पष्टता की है। शोध प्रकाशन के नाम पर किस प्रकार की पत्रिका को मान्यता मिलेगी, कौन-सा प्रकाशन गुणवत्तापूर्ण माना जाएगा और अनुभव की गणना किस आधार पर होगी, इसे नियमों में साफ किया जाना होगा।  यदि नियम अस्पष्ट रहे तो इसका लाभ उठाने की गुंजाइश बनी रहेगी। वहीं वास्तविक शोध करने वाले अभ्यर्थियों को उनकी मेहनत का उचित लाभ नहीं मिल पाएगा। सहायक प्राध्यापक भर्ती का विवाद अतिथि शिक्षकों के भविष्य से भी जुड़ा है। बिहार के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में वर्षों से अतिथि शिक्षक अध्यापन कर रहे हैं। कई ने लंबे समय तक विद्यार्थियों को पढ़ाया, शोध किया और विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियों में योगदान दिया।


आंदोलनकारियों ने मांग की है कि अतिथि सहायक प्राध्यापकों को वर्तमान में बहाल संविदा सहायक प्राध्यापकों के समान न्यूनतम वेतनमान और उस पर महंगाई भत्ता दिया जाए। सभी विश्वविद्यालयों में उनके नवीकरण की प्रक्रिया भी समान हो। इसके साथ ही शैक्षणिक प्रमाणपत्र, शोध पत्र और अनुभव की जांच के बाद उन्हें 65 वर्ष तक काम करने का अवसर देने की मांग की गई है। सरकार के सामने चुनौती यह होगी कि अनुभवी अतिथि शिक्षकों के अनुभव का सम्मान भी हो और स्थायी नियुक्ति में समान अवसर का सिद्धांत भी बना रहे। यह आंदोलन अचानक खड़ा नहीं हुआ। गर्दनीबाग में पीएचडी धारकों और शोधार्थियों ने कई दिनों तक आमरण अनशन किया। आंदोलनकारियों के मुताबिक कई अनशनकारियों की तबीयत बिगड़ी और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। आंदोलनकारियों ने लोक भवन मार्च का ऐलान किया था। पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए जगह-जगह बैरिकेडिंग की। बेली रोड पर पुलिस और अभ्यर्थियों के बीच झड़प की स्थिति भी बनी। आंदोलनकारियों ने बैरिकेडिंग तोड़ दी और बड़ी संख्या में अभ्यर्थी लोक भवन की ओर बढ़े। इसके बाद मामला केवल धरना स्थल तक सीमित नहीं रहा और सीधे राजभवन स्तर पर बातचीत की स्थिति बनी।


बिहार में छात्र आंदोलन का इतिहास काफी पुराना रहा है। 1955 में राज्य परिवहन की व्यवस्था और टिकट संबंधी विवाद से जुड़ा छात्र आंदोलन प्रदेश के शुरुआती बड़े छात्र आंदोलनों में माना जाता है। उस दौरान छात्र दीनानाथ पांडे की पुलिस गोली से मौत के बाद आंदोलन उग्र हुआ और सरकार को राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ा।इसके बाद 1974 का छात्र आंदोलन बिहार के इतिहास में निर्णायक अध्याय बना। महंगाई, भ्रष्टाचार और व्यवस्था के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे व्यापक राजनीतिक आंदोलन में बदल गया। जयप्रकाश नारायण ने इसकी कमान संभाली और बिहार छात्र संघर्ष समिति के बैनर तले छात्र बड़ी संख्या में आंदोलन में शामिल हुए। इसी आंदोलन से आगे चलकर कई प्रमुख राजनीतिक चेहरे राष्ट्रीय राजनीति में उभरे। लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, सुशील कुमार मोदी और रविशंकर प्रसाद जैसे नेता छात्र राजनीति और जेपी आंदोलन की पृष्ठभूमि से निकले। आंदोलन का प्रभाव इतना व्यापक हुआ कि आगे चलकर देश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया और आपातकाल के बाद केंद्र की सत्ता भी बदल गई।  1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किए जाने के बाद बिहार में सवर्ण छात्रों का आंदोलन भी हुआ। उस दौर में आरक्षण की नीति को लेकर छात्रों के बीच तीखा विरोध सामने आया। हालांकि उस आंदोलन का राजनीतिक परिणाम 1974 जैसा नहीं रहा।


इस पृष्ठभूमि में वर्तमान सहायक प्राध्यापक आंदोलन को देखना जरूरी है। इसका स्वरूप राजनीतिक सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा और रोजगार नीति में बदलाव का है। फिर भी बिहार की छात्र राजनीति में आंदोलनों की पुरानी परंपरा इसे अलग महत्व देती है। आंदोलन को राजनीतिक समर्थन भी मिला। कांग्रेस सांसद पप्पू यादव और बिहार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम आंदोलन स्थल पर पहुंचे और शोधार्थियों की मांगों का समर्थन किया। भाकपा माले की विधान पार्षद शशि यादव और विधायक संदीप सौरभ ने भी आंदोलन स्थल पर पहुंचकर अभ्यर्थियों से मुलाकात की। छात्र संगठन एनएसयूआई ने भी आंदोलन का समर्थन किया। राजनीतिक समर्थन ने आंदोलन को व्यापक चर्चा जरूर दी, लेकिन इसकी मूल प्रकृति अकादमिक और रोजगार से जुड़ी रही। आंदोलनकारियों के सामने अब चुनौती यह भी है कि वे अपनी मांगों को राजनीतिक बयानबाजी से अलग रखते हुए नीति और नियमों के स्तर पर ठोस परिणाम तक पहुंचाएं।  राज्यपाल के साथ बातचीत के बाद अनशन समाप्त होना आंदोलन का अंत नहीं, बल्कि एक नए चरण की शुरुआत है। सरकार के सामने अब 15 दिनों की समयसीमा है। समिति का गठन, उसके सदस्यों का चयन, कार्यादेश और बैठक की प्रक्रिया,इन सब पर निगाह रहेगी। सबसे जरूरी यह होगा कि समिति केवल आंदोलनकारियों की मांगों को सुनकर औपचारिक रिपोर्ट न दे, बल्कि बिहार की उच्च शिक्षा के लिए दीर्घकालिक भर्ती नीति का रास्ता तैयार करे। बिहार के विश्वविद्यालयों में रिक्त पदों को नियमित रूप से भरना, भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना, शोध और अध्यापन को उचित महत्व देना तथा अतिथि शिक्षकों की सेवा-शर्तों को स्पष्ट करना,इन सभी सवालों का समाधान एक साथ तलाशना होगा।


गर्दनीबाग के 21 दिन के आंदोलन ने सरकार को संवाद की मेज तक पहुंचाया है। 2026 के परिनियम का स्थगन और समीक्षा समिति का गठन इसकी तत्काल उपलब्धि है। लेकिन किसी आंदोलन की असली सफलता केवल सरकार से आश्वासन हासिल करने में नहीं होती। सफलता तब मानी जाएगी, जब आश्वासन नियमों में बदलाव और जमीन पर लागू होने वाली नीति में बदल जाए। अब नजर अगले 15 दिनों पर है। समिति कितनी जल्दी बनती है, उसमें कौन लोग शामिल होते हैं और 2026 के परिनियम में क्या बदलाव किए जाते हैं,यही आगे की दिशा तय करेगा। बिहार में छात्र आंदोलनों ने कई बार सत्ता और व्यवस्था को बदलने की क्षमता दिखाई है। इस बार आंदोलन का लक्ष्य सत्ता परिवर्तन नहीं, उच्च शिक्षा की भर्ती व्यवस्था में सुधार है। यदि सरकार इस अवसर को व्यापक सुधार में बदलती है तो गर्दनीबाग का आंदोलन केवल 21 दिनों के अनशन की कहानी नहीं रहेगा। यह बिहार के विश्वविद्यालयों में पारदर्शी, नियमित और गुणवत्तापूर्ण शिक्षक नियुक्ति की नई शुरुआत बन सकता है। कुमार कृष्णन



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