Upgrade Jharkhand News. तीन चार दिन के वायरल फीवर ने हुलिया ही बिगाड़ दिया। एलोपैथी एमडी बेटी ने एलोपैथी दवा वाट्सएप पर लिखी। होम्योपैथिक डॉक्टर बेटी दामाद जी ने होम्योपैथी की डोज सलाह दी । जिसकी सलाह न मानूं उसके ही नाराज होने का खतरा! क्योंकि फिर दुबारा भी कभी दवा और सलाह की जरूरत पड़ सकती है। बीमारी से ज्यादा इलाज की पैथी को लेकर झंझट! हालांकि होम्योपैथी दवा का जवाब नहीं क्योंकि यह साइड इफेक्ट नहीं देती है या यह कहिये कि इसके दुष्प्रभाव बहुत कम होते हैं लेकिन इसकी उपचार गति थोड़ा धीमी होती है और आज की दुनिया में सब कुछ तत्काल चाहिए। रोगी एक दो दिन में सही न हो तो तुरंत एलोपैथी पर पहुंच जाता है चाहे वहां हफ्ता लग जाए और दवा के तमाम साइड इफेक्ट झेलने पड़े।
बहरहाल अपन तब खुश थे जब आयुर्वेद व अंग्रेजी मिक्स देसी डॉक्टर से तीन पुड़िया लाकर खा लेते थे लेकिन पढ़ी लिखी डॉक्टर संतानों ने झंझट पैदा कर दिया पापा इसमें ये छोटी सी दिख रही गोली स्टेरॉइड है यह बहुत हार्मफुल है। मान लिया वह हार्मफुल थी लेकिन हम तो उसे खाकर ही ठीक होते रहे? अब तो कई कई दिन और कई कई बार ढेर गोलियां खाने के बाद भी आराम मिल जाए तो भगवान की कृपा.. शरीर ऐसे टूटता है बस। वायरल फीवर का जिक्र करते ही पापा ब्लड सीबीसी टैस्ट कराने के लिए बोला था पर आप मानते ही कहां है? कैसे समझाये इन बच्चों को कि हम उस पीढ़ी के लोग हैं जिनका जन्म बिना गर्भ का अल्ट्रासाउंड किए एक अशिक्षित समझी जाने वाली दाई द्वारा सकुशल सम्पन्न हो जाता था वो भी लालटेन की मद्धम रोशनी में। किसी नर्सरी में रखने की जरूरत नहीं होती थी, कोई जोइंडिस नहीं होता था।
जून की तपती गर्मी में बिजली आती ही कब थी? माताएं बिना पंखे, एसी की सुविधा के घर के एक कमरे में प्रसव पीड़ा झेल लेती थी और हम जैसे बहादुर बच्चे माँ के गर्भ में पैर चला चला कर दुनिया से रूबरू हो जाते थे। दुनिया में आने के लिए की गई यही मेहनत एक नवजात शिशु को जीवन भर के लिए मजबूत फाउंडेशन तैयार कर देती थी, यह मैं नहीं कह रहा खुद शोधकर्ता डॉक्टर कहते हैं। सुविधाएं बढ़ी तो सामर्थ्य घटी। मेरे बाबा जी जो वैद्य थे नाड़ी देख कर जटिल रोगों का उपचार कर देते थे। अब समूचा इलाज दवा इंडस्ट्री ने जकड़ लिया है। डोलो 650 ही दी जाती है चाहे जरूरत क्रोसिन 300 की हो। गैस न भी बने एंटासिड पेंटाप देना जरूरी है। आप चाहें तो हंस सकते हैं मुझे एंटासिड लेने पर उल्टा असर होता है। जांच के लिए खुली लैब क्या और कैसे कितने मानक पर कर रहीं हैं बता दिया तो आपका इलाज कराने से ही मन खट्टा हो जाएगा।लेकिन फंसते है तो जांच कराने की मजबूरी भी होती है।
सिस्टम पर एक ऐसी दवा इंडस्ट्री हावी है कि जो वह कहे वही सब ठीक है। जो वह तय कर रहे है, अपने नफे और फायदे के हिसाब से तय करते हैं इसे आप मेडिकल माफियागिरी भी कह सकते हैं। उच्च रक्तचाप (ब्लड प्रेशर),मधुमेह (डायबिटीज), हृदय रोग,थायराइड जैसी अनेक बीमारियों के लिए एलोपैथी ने जीवन भर के लिए दवा ग्राहक का बंदोबस्त कर दिया है। यही कारण है दवा इंडस्ट्री दिन पर दिन बढ़ रही है। पोस्ट कोविड से होने वाली मौतों में कितना योगदान एंटी कोविड वैक्सीन का रहा इसकी गिनती करने का समय किसी के पास नहीं है, यही सिस्टम की बेचारगी है। कौन सही करेगा जब सारा मेडिकल सिस्टम ही बीमार है? मनोज कुमार अग्रवाल

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