Upgrade Jharkhand News. सपने यदि खुली आँखों से देखे जाएँ तो सपने नही कहलाते, केवल बुनी जाने वाली कल्पनाएँ कहलाते हैं। सपने वे होते हैं , जो वास्तविक प्रतीत तो होते हैं, किंतु जिनका यथार्थ से कोई संबंध नहीं होता,फिर भी सपनों को हकीकत से जोड़ने वाले लोग सत्यवादी महाराजा हरिश्चंद्र जी का उदाहरण प्रस्तुत करके यह कहते हैं, कि सपनों को भी यथार्थ सत्य मानकर उनके अनुरूप व्यवहार करना चाहिए। उस सपने में कितनी सच्चाई थी, यह तो कोई नहीं जानता और आज भी स्थिति में भी कोई खास परिवर्तन नहीं आया है। अब सपनों की सच्चाई भी संदेह के घेरे में है। समझ नहीं आता, कि कौन सा सपना वास्तव में दिखाई दिया और किसे सपना प्रचारित करके पूरा करने का जतन किया गया। बहरहाल अपने मित्र हैं, उनके असंख्य नाम है, उनका आचरण ही ऐसा है, कि लोग उनकी असलियत कभी समझ ही नहीं पाते, कुछ ख़ास मित्र तो उनकी विशेषताओं की प्रस्तुति में पूरा फ़िल्मी गीत सुनाने लगते हैं कि 'कभी तू छलिया लगता है कभी दीवाना लगता है, कभी अनाड़ी लगता है, कभी आवारा लगता है।' कई बार ऐसा प्रतीत होता है, कि यह गीत मित्र महोदय की विशेषताओं का बखान कुछ कम करता है। इस गीत में अनेक पंक्तियाँ और जोड़ी जा सकती थी। कोई भी गीत उसके रचनाकार की कल्पनाओं पर आधारित होता है। वह कल्पना करता है और गीत का सृजन होता है।
अपने मित्र इन सबसे अधिक कल्पनाशील हैं, उनके सपने ही उन्हें औरों से अलग सिद्ध करते हैं। कभी उन्हें उनकी दादी सपने में आती हैं और यह बताती हैं, कि बेटे तेरा जन्म ही राज सिंहासन पर बैठने के लिए हुआ है, तुम्हें चक्रवर्ती सम्राट होना चाहिए था, मगर तुम अब तक भटक रहे हो। यही सपना मित्र महोदय को विचलित कर देता है। वह अपने ख़ास अनुयायियों को अपने दरबार में बुलाते हैं, उन्हें अपना सपना सुनाते हैं, कि दादी ने सपने में क्या कहा था। अब उनका सपना पूरा करने की बारी है। चाहे जो मज़बूरी हो, सपने में कही गई दादी की मनोकामना पूरी हो। अनुयायी यूँ तो किसी सपने पर यकीन नहीं करते, किन्तु अपने आराध्य की बात को नानुकर करके टाल भी नहीं सकते। सो वे अपनी बैठक करते हैं, बैठक में अपने विश्वासपात्रों को आमंत्रित करते हैं, फिर योजना बनाते हैं कि मित्र महोदय को किस प्रकार से राज सिंहासन पर बिठाकर दादी का सपना पूरा करने में सहयोग दिया जा सकता है। कोई कहता है, कि मित्र महोदय के राजतिलक में जो बाधाएं उत्पन्न हो रही हैं, उन बाधाओं को दूर किया जाए। उन बाधाओं के विरुद्ध आन्दोलन चलाया जाए, बिना किसी न्यायाधीश के निर्णय के विघ्न कर्ताओं को अपराधी घोषित किया जाए। उनके विरुद्ध महाभियोग चलाया जाए। पैसे की कोई परवाह न की जाए। आखिर दादी का सपना पूरा जो करना है भले सपने में ही सही। सुधाकर आशावादी

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