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Bhopal श्रीकृष्ण: निराकार से साकार तक, ब्रह्मानंद से वात्सल्य आनंद तक Shri Krishna: From formless to embodied, from Brahman bliss to maternal bliss

 


Upgrade Jharkhand News.  श्रीकृष्ण की जन्म-कथा कैसे लिखूं? लेखनी थम जाती है। यह शब्दातीत लीला है। जो अज है, अनादि है, अनंत है, निर्गुण है, निराकार है, जो वेदों में नेति-नेति कहकर पुकारा गया, जो उपनिषदों में सच्चिदानंद कहकर गाया गया, वही आज साकार होकर, सगुण होकर, सुकुमार होकर यशोदा की गोद में किलक रहा है। यही तो वैदिक परम्परा का चरम रहस्य है कि निराकार जब भक्त के प्रेम में बंधता है तो बालक बन जाता है। वह परब्रह्म जो काल का भी काल है, आज काल की गणना में अष्टमी की अर्धरात्रि में बंध गया है।  अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र अपने पूर्ण यौवन पर। मेघ गर्जना कर रहे हैं, विद्युत नृत्य कर रही है, यमुना उन्मादिनी होकर मर्यादा लांघ रही है। मथुरा का कारागार, जहाँ पाषाण की दीवारें हैं, लोहे की बेड़ियां हैं, कंस का पहरा है, वहाँ गर्भगृह में परात्पर प्रकट हुआ है। वसुदेव की आँखों में अश्रु हैं, देवकी के हृदय में वात्सल्य और भय का संगम है। शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज रूप में वह आया और क्षण भर में ही मायावी बालक बन गया। यह रूपांतरण ही वेदांत है। जो विराट है वही विनम्र है।


फिर वह अलौकिक यात्रा। पिता के कंधे पर सूप में सोया हुआ ब्रह्मांड का स्वामी। आगे-आगे शेषनाग छत्र बनकर चल रहे हैं, चरणों को छूने के लिए यमुना व्याकुल है, कारागार के कपाट स्वतः खुल गए, पहरेदार योगनिद्रा में लीन हो गए। गोकुल में यशोदा की गोद में मायादेवी योगमाया के स्थान पर यह योगेश्वर पहुँच गया। नंद घर आनंद भयो। यह आनंद वैदिक ऋषियों के ब्रह्मानंद से भी गहन है, क्योंकि यह वात्सल्य का आनंद है। माँ यशोदा को लाल मिला। धन्य हो गई वह ग्वालिन माँ। जिसने चारों वेद नहीं पढ़े, जिसने कोई यज्ञ नहीं किया, जिसने घोर तप नहीं किया, उसे वह मिल गया जिसे पाने के लिए सनकादि ऋषि युगों-युगों तक ध्यान में बैठे रहते हैं। यशोदा उसे उलूखल से बांधती है, वह बंध जाता है। वह दामोदर है, दाम अर्थात रस्सी, उदर अर्थात पेट, रस्सी से बंधा हुआ पेट। जो जगत को बंधन से मुक्त करता है, वही आज रस्सी में बंधा है। यशोदा छड़ी दिखाती है, वह नेत्रों में भय का अभिनय करता है, रोने लगता है। यह अभिनय ही तो परम सत्य है। वह माँ के हाथ का माखन खाता है, माखन चुराता है, मुख पर माखन लपेटे पकड़ा जाता है, फिर कहता है, मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो। यह मिथ्या भी सत्य से अधिक सत्य है।


वह कर्मयोगी बेमिसाल है। गीता का प्रथम श्लोक नहीं, गीता का अंतिम श्लोक है कृष्ण। उसका समग्र जीवन कर्मयोग की प्रयोगशाला है। बाल्यकाल में गोचारण किया तो ऐसा कि गोपाल कहलाया, गोवर्धन उठाया तो गोपजनों के लठियों के सहारे से उठाया, यह सहकारिता का वेद है। युवावस्था में कंस का वध किया तो धर्मराज्य की स्थापना के लिए। द्वारका बसाई तो शरणागतों के लिए। महाभारत में सारथी बना तो बिना शस्त्र उठाए। वह सिखाता है कि कर्म से पलायन नहीं, कर्म में ही विश्राम है। आवश्यकता पड़ने पर वह रणछोड़ भी बन जाता है। जरासंध के सामने से भाग जाना कायरता नहीं, राजनीति है, दूरदर्शिता है। कब लड़ना है और कब हटना है, यह विवेक ही कर्मयोग है। वह सर्वकला अवतार है, षोडश कला परिपूर्ण। चंद्रमा की सोलह कलाएं उसके मुख में पूर्णिमा बनकर निवास करती हैं। वह बांसुरी बजाता है तो यमुना का प्रवाह थम जाता है, गायें घास चरना भूल जाती हैं, गोपियां सुध-बुध खो देती हैं। वह नृत्य करता है तो रास रचता है, जहाँ एक कृष्ण अनेक गोपियों के साथ एक साथ नृत्य करता है, यह आत्मा के परमात्मा से एकत्व का अद्वैत दर्शन है। वह युद्ध करता है तो सुदर्शन चक्र से, वह प्रेम करता है तो नेत्रों के इशारे से। वह वेद है, वह वेदांत है, वह संगीत है, वह साहित्य है, वह शस्त्र है, वह शास्त्र है। उससे परे कोई कला नहीं। वह जीवन नैया का केवट है। भवसागर में जब जीव की नाव डोलती है, जब मोह के भंवर में फंसती है, जब काम-क्रोध के तूफान उठते हैं, तब केवल उसका नाम ही पतवार बनता है। गीता में उसका वाक्य, सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज, यह किसी संप्रदाय का आह्वान नहीं, यह डूबते हुए जीव के लिए अंतिम आश्रय की घोषणा है। वह कहता है, तू चिंता मत कर, मैं हूँ। इस एक वाक्य में वेदों के सहस्र श्लोक समाहित हैं।


वह कृष्ण, लोक जननायक है। अंतिम जन का प्रतिनिधि। वह राजमहल में जन्मा, पर पला गोकुल की धूल में। उसने राजसी वैभव को ठुकराकर ग्वाल-बालों की संगति को चुना। वह प्रकृति पुत्र है। मोर पंख उसका मुकुट है, गौधूलि उसका श्रृंगार है, कदंब की छाया उसका सिंहासन है, यमुना का तट उसकी राजधानी है। आज जब मनुष्य प्रकृति से कट गया है, जब पर्यावरण संकट गहरा गया है, तब वह यमुना को कालिय नाग से मुक्त करने वाला, गोवर्धन पर्वत को उठाकर इंद्र के अहंकार को तोड़ने वाला कृष्ण ही हमारा पथ प्रदर्शक है। वह सिखाता है कि प्रकृति का दोहन नहीं, पूजन करो। वह कूटनीतिक, राजनीतिक, सामाजिक, अल-बल-छल से मचलकर लक्ष्य की पूर्ति करने वाला मनमोहन है। धर्म की रक्षा के लिए वह परिस्थितियों को भी तोड़ता-मरोड़ता है। महाभारत में उसने जो किया, वह छल नहीं, धर्म का सूक्ष्म रूप है। उसने सिखाया कि धर्म जड़ नहीं, चेतन है। धर्म वह नहीं जो पुस्तक में लिखा है, धर्म वह है जो प्रजा का कल्याण करे। इसीलिए वह छलिया भी है और छलिया होकर भी निष्कलंक है। वह सबको लड़ाता हुआ दिखता है, पर लड़ाकर भी जोड़ता है, क्योंकि उसकी लड़ाई अधर्म के विरुद्ध है। वह सहकारिता का महा नायक है, सुदामा का मित्र है, द्रौपदी का भ्राता है, अर्जुन का सखा है, उद्धव का गुरु है। वह मित्रता को पराकाष्ठा तक निभाता है। वह श्रेष्ठतम योद्धा है, पर योद्धा होकर भी शस्त्र नहीं उठाता, वह दूसरों को योद्धा बनाता है।


वह चीर और माखन का चोर है, पर यह चोरी भी योग है। चीरहरण लीला में उसने गोपियों के अहंकार रूपी वस्त्र का हरण किया, उन्हें आत्मबोध कराया कि लज्जा देह की नहीं, आत्मा की होती है। माखन चोरी में उसने उनके लोभ का हरण किया, उनके हृदय के मक्खन जैसा कोमल प्रेम चुराया। वह बड़ा चितचोर है। एक बार जो उसकी तिरछी चितवन में फंस गया, वह फिर कभी मुक्त नहीं हुआ। वह तिल का ताड़ बनाने वाला कहा जाता है, पर वह तिल में भी ब्रह्मांड दिखा देता है। यशोदा को मुख में ब्रह्मांड दिखाना, यही तो उसकी लीला है। वह संगीत का प्रेमी, टेढ़ी टांग वाला त्रिभंगी है। उसकी तीन जगह से टेढ़ी देह बताती है कि सीधा दिखने वाला संसार वास्तव में टेढ़ा है और टेढ़ा दिखने वाला कृष्ण ही एकमात्र सीधा सत्य है। वह राधा के चरण चापने वाला है। जहाँ जगत का स्वामी अपनी आराध्या के चरण दबाता है, वहाँ प्रेम भक्ति से भी ऊँचा हो जाता है। राधा उसकी गुरु है, राधा उसकी शिष्या है, राधा ही उसकी आत्मा है।  तो आखिर कौन है कृष्ण? वह उत्तर नहीं, वह प्रश्न है जो हर युग में नया उत्तर मांगता है। वह बृजवासियों का लाला है, वह द्वारका का नाथ है, वह गीता का गायक है, वह राधा का प्राण है, वह मीरा का मनमोहन है, वह सूर का चितचोर है। आओ, हम सब मिलकर मनाएं इस अजन्मे का जन्मोत्सव। नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की। हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की। यह केवल उत्सव नहीं, यह आत्मा का अपने परमात्मा से मिलन पर्व है। डॉ.दीपक गोस्वामी



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