Jamshedpur (Nagendra) झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के चाईबासा सदर अस्पताल में स्वास्थ्य व्यवस्था की भयावह तस्वीर सामने आई है। एक गरीब आदिवासी पिता डिम्बा चतोम्बा को अपने चार महीने के मृत बेटे की लाश को प्लास्टिक बैग में पैक करके घर ले जाने को मजबूर होना पड़ा। वजह थी—अस्पताल में शव वाहन की अनुपलब्धता। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (NHRC) ने इस मामले को काफ़ी गंभीरता से लेते हुए मामले मे संज्ञान लिया है। आयोग ने झारखंड सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के प्रधान सचिव और पश्चिम सिंहभूम के उपायुक्त को चार सप्ताह के अंदर एक्शन टेकेन रिपोर्ट (ATR) जमा करने का सख्त निर्देश दिया है।
क्या है पूरा मामला ? -झारखण्ड मानवाधिकार सम्मेलन -जेएचआरसी के केंद्रीय अध्यक्ष मनोज मिश्रा मनोज मिश्रा ने 25 दिसंबर 2025 को आयोग में एक शिकायत दर्ज कराई थी । शिकायत के अनुसार, नोआमुंडी के एक गरीब आदिवासी परिवार के चार महीने के बच्चे की मौत चाईबासा सदर अस्पताल में मलेरिया से हो गई थी । पिता डिम्बा ने अस्पताल प्रबंधन से शव ले जाने के लिए शव वाहन उपलब्ध कराने की मांग की थी । डिंम्बा के अनुसार काफ़ी इंतज़ार के बाद भी उसे शव वाहन उपलब्ध नहीं कराया गया । प्रबंधन की ओर से यही बताया गया कि वाहन जगन्नाथपुर गयी है, आने पर उपलब्ध करा दिया जायेगा । काफ़ी इंतजार के बाद भी वाहन नहीं मिली ।|अंततः डिम्बा को अस्पताल के कर्मचारी एवं आस पास मौजूद लोगो ने आर्थिक मदद की । डिम्बा ने बताया कि उन्हें शव को थैले मे रखकर बस मे ले जाने का आइडिया भी अस्पताल मे मौजूद कर्मचारियों ने ही दिया और प्लास्टिक के थैले भी दिए । वाहन नहीं मिलने एवं घर जाने तक आर्थिक सहयोग पाकर डिम्बा अपने मृत बच्चे के शव को थैले मे रख कर बस के द्वारा अपने गाँव नोवामुंडी प्रखंड के दिरीबुरु पंचायत स्थित बड़ा बालजुड़ी गांव के सिंदरी गोरी टोला जाना पड़ा । जहाँ उन्हें बस से उतरकर अपने घर तक जाने मे काफ़ी दुरी पैदल जाना पड़ा।
यह घटना राज्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की ना सिर्फ गंभीर खामियों को उजागर करती है, बल्कि अस्पताल प्रबंधन की घोर लापरवाही की कारण मृत शरीर के साथ हुए घोर अमानवीय पक्ष को भी दर्शाती है। गरीब आदिवासी परिवार को इतनी पीड़ा झेलनी पड़ी कि मृत शिशु का अंतिम संस्कार भी गरिमा के साथ नहीं हो सका।
जेएचआरसी के अनुसार यह मानवाधिकार का बेहद गंभीर उल्लंघन है-पुरे मामले पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान लेते हुए आयोग के कानून प्रभाग ने केस नंबर 28/34/18/2026 दर्ज किया। आयोग ने 24 अगस्त 2026 को जारी पत्र में कहा कि शिकायत में लगाए गए आरोप मानव अधिकारों के उल्लंघन के प्रथम दृष्टिया सही मामले लगते हैं। आयोग ने इसे मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम -1993 की धारा 12 के तहत संज्ञान लेते हुए झारखण्ड के स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव एवं पश्चिमी सिंहभूम के उपायुक्त को निर्देश दिया हैं कि वे आरोपों की जांच करें और चार सप्ताह के अंदर एक्शन टेकेन रिपोर्ट आयोग को भेजें। मनोज मिश्रा द्वारा भेजी गयी शिकायत की कॉपी भी पत्र के साथ संलग्न की गई है। आयोग ने कार्यवाही की जानकारी झारखण्ड मानवाधिकार सम्मेलन जेएचआरसी के केंद्रीय अध्यक्ष एवं शिकायत कर्ता मनोज मिश्रा को भी प्रेषित की है ।
क्यों है यह मामला सनसनीखेज ? -यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था की नाकामी का प्रतीक है। जहां अस्पताल में मरीज की जान बचाने के बाद भी शव को सम्मान के साथ घर पहुंचाने की व्यवस्था नहीं है, वहां गरीब आदिवासी परिवार कितनी असहायता महसूस करते होंगे। प्लास्टिक बैग में बच्चे की लाश ले जाना किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्म की बात है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के इस सख्त रुख के बाद अब झारखंड सरकार और जिला प्रशासन पर दबाव बढ़ गया है। क्या प्रशासन इस लापरवाही की जिम्मेदारी लेगा? क्या भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा नहीं होंगी? चार सप्ताह में आने वाली एक्शन टेकेन रिपोर्ट रिपोर्ट इन सवालों के जवाब देगी। मनोज मिश्रा ने बताया की मामले की जानकारी मिडिया से मिलने के बाद जेएचआरसी की चार सदस्यीय टीम ने दिनांक 26/12/26 को मृत बालक कृष्णा चतोम्बा के पिता डिम्बा चतोम्बा एवं माता रविवारी चतोम्बा एवं परिवार के अन्य सदस्यों से मुलाक़ात की एवं ग्राउंड रिपोर्ट तैयार की । जांच टीम मे मनोज मिश्रा के साथ विश्वजीत सिंह, रेणु सिंह एवं मिडिया से सोमनाथ पात्रा को शामिल किया गया था । संगठन ने पुरे मामले मे शव की गरिमा को ठेस पहुंचने को लेकर BNS की धारा 301 दर्ज कर दोषियों के खिलाफ कार्यवाही करने एवं पीड़ित परिवार को दस लाख का मुआवजा देने की मांग की है।

No comments:
Post a Comment