Upgrade Jharkhand News. भारत के स्वाधीन *ता संग्राम में कुछ गीत केवल गीत नहीं रहे, बल्कि आंदोलन की आवाज बन गए। ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा’ ऐसा ही गीत है। स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में इसे गाते हुए असंख्य देशभक्तों ने ब्रिटिश शासन की लाठियां और गोलियां सहीं। तिरंगे के प्रति गौरव, देशभक्ति और त्याग की भावना जगाने वाला यह गीत आज भी लोगों में राष्ट्रप्रेम का संचार करता है। इसके रचयिता थे श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’, जिनका जन्म 9 सितम्बर 1893 को कानपुर के निकट नरवल गांव में हुआ था। श्यामलाल गुप्त का जन्म विशेश्वर प्रसाद और कौशल्या देवी के घर हुआ। मिडिल की शिक्षा के बाद उनके पिता उन्हें घरेलू व्यापार में लगाना चाहते थे, लेकिन उनकी रुचि अध्ययन और अध्यापन में थी। वे जिला परिषद के विद्यालय में शिक्षक बन गए। नौकरी में दो वर्ष तक न छोड़ने का शपथपत्र भरने की शर्त उन्हें अपनी स्वतंत्रता के विरुद्ध लगी और उन्होंने नौकरी छोड़ दी। बाद में उन्होंने ‘सचिव’ नामक मासिक पत्र का प्रकाशन शुरू किया, जिसके मुखपृष्ठ पर देश की परतंत्रता मिटाने का संकल्प व्यक्त किया जाता था।
कविता से उनका रिश्ता बचपन से ही था। मात्र 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने विभिन्न छंदों में रामायण के बालकांड की रचना कर डाली थी। हालांकि, उनके पिता के सामने किसी ने यह अंधविश्वास रखा कि कवि का जीवन दरिद्रता और संकट से भरा होता है। इसके प्रभाव में पांडुलिपि कुएं में फेंक दी गई। इससे आहत होकर श्यामलाल अयोध्या चले गए और मौनी बाबा से दीक्षा ली। बाद में परिवार उन्हें समझाकर वापस ले आया। उनके साहित्यिक जीवन को नई दिशा गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ से निकटता ने दी। एक समारोह में महावीर प्रसाद द्विवेदी के स्वागत में उनकी कविता सुनकर विद्यार्थी प्रभावित हुए। 1923 में फतेहपुर जिला कांग्रेस अधिवेशन में विद्यार्थी के ओजस्वी भाषण के बाद उन्हें जेल भेज दिया गया। जेल से लौटने पर उनके स्वागत में पार्षद ने कविता पढ़ी। इसके बाद दोनों की मित्रता और निकटता बढ़ती गई।उन दिनों कांग्रेस के पास अपना झंडा तो था, लेकिन उसके लिए कोई गीत नहीं था। गणेश शंकर विद्यार्थी ने पार्षद से झंडा गीत लिखने का आग्रह किया। काफी समय तक वे रचना नहीं कर सके। आखिरकार 3-4 मार्च 1924 की रात उन्होंने वह गीत लिख डाला, जो आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन की पहचान बन गया—
‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।’
13 अप्रैल 1924 को जलियांवाला बाग हत्याकांड की स्मृति में कानपुर के फूलबाग में आयोजित सभा में, जवाहरलाल नेहरू की उपस्थिति में यह गीत पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया गया। धीरे-धीरे इसकी लोकप्रियता पूरे देश में फैल गई। 1938 के हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू सहित अनेक नेताओं ने इसे गाया तो पार्षद भाव-विभोर हो उठे। पार्षद केवल कवि नहीं, सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी भी थे। वे असहयोग और नमक आंदोलनों में जेल गए। 1921 में उन्होंने स्वराज्य मिलने तक नंगे पांव रहने का संकल्प लिया और उसे निभाया।आजादी के बाद बदलते राजनीतिक माहौल से वे निराश हुए। एक मित्र ने जब पूछा कि आजकल क्या लिख रहे हैं, तो उन्होंने व्यंग्य में कहा कि नया कुछ नहीं, पुराने झंडा गीत में संशोधन किया है— ‘इसकी शान भले ही जाए, पर कुर्सी न जाने पाए।’ यह पंक्ति उनके भीतर के मोहभंग और तत्कालीन राजनीति पर तीखे व्यंग्य को व्यक्त करती थी।
जीवन के अंतिम दौर में उन्होंने अपने गांव नरवल में ‘गणेश सेवा आश्रम’ की स्थापना की। वे प्रतिदिन पैदल वहां जाते थे। एक बार पैर में कांच चुभ जाने के बाद आर्थिक अभाव में समुचित इलाज नहीं हो सका और संक्रमण बढ़कर गैंगरीन में बदल गया। 10 अगस्त 1977 को उनका निधन हो गया। श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ का जीवन बताता है कि कविता जब राष्ट्र की चेतना से जुड़ती है तो वह इतिहास की आवाज बन जाती है। उनका ‘झंडा गीत’ स्वतंत्रता संग्राम की स्मृति ही नहीं, तिरंगे के प्रति सम्मान और राष्ट्रप्रेम की स्थायी अभिव्यक्ति है।
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