Upgrade Jharkhand News. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से शुरू नहीं होता। अंग्रेजी सत्ता के विस्तार के साथ ही देश के अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय शासकों, किसानों, सैनिकों और आम लोगों ने विदेशी शासन के विरुद्ध प्रतिरोध किया। उत्तराखंड के हरिद्वार जनपद स्थित कुंजा बहादुरपुर की 1822-24 की क्रांति इसी परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसके नायक थे राजा विजय सिंह, जिन्होंने अंग्रेजी सत्ता के सामने झुकने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना। 3 अक्तूबर 1824 को हुए इस संघर्ष में राजा विजय सिंह और उनके सेनापति कल्याण सिंह सहित बड़ी संख्या में लोगों ने बलिदान दिया। हरिद्वार के निकट कुंजा बहादुरपुर उस समय लंढौरा रियासत का हिस्सा था। राजा रामदयाल सिंह के निधन के बाद उनके पुत्र विजय सिंह ने रियासत की जिम्मेदारी संभाली। उस दौर में ईस्ट इंडिया कंपनी उत्तर भारत में अपना प्रभाव लगातार बढ़ा रही थी। अनेक भारतीय शासक और जमींदार अंग्रेजी सत्ता के साथ समझौते कर रहे थे, लेकिन विजय सिंह ने अंग्रेजी प्रभुत्व को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
राजा के साथ सेनापति कल्याण सिंह भी मजबूती से खड़े थे। 1822 के आसपास अंग्रेजी शासन के विरुद्ध असंतोष ने संगठित रूप लेना शुरू किया। सरकारी करों के विरोध और अंग्रेजी सत्ता के प्रतीकों को हटाने जैसी कार्रवाइयों ने ब्रिटिश प्रशासन की चिंता बढ़ा दी। उपराष्ट्रपति सचिवालय से जारी विवरण के अनुसार राजा विजय सिंह ने आसपास के क्षेत्रों से लगभग एक हजार लोगों को संगठित किया था और अंग्रेजों को कर देना बंद कर दिया था।राजा विजय सिंह के नेतृत्व में बढ़ते प्रतिरोध को अंग्रेज अपने शासन के लिए चुनौती मान रहे थे। पहले समझौते और दबाव के प्रयास हुए, लेकिन बात नहीं बनी। इसके बाद अंग्रेजी सेना ने कुंजा बहादुरपुर के किले और क्षेत्र पर सैन्य कार्रवाई की।सितंबर 1824 में संघर्ष तेज हुआ। अंग्रेजी सेना के पास आधुनिक हथियार और बड़ी सैन्य शक्ति थी, जबकि राजा के साथ स्थानीय योद्धा और ग्रामीण थे। इसके बावजूद उन्होंने आत्मसमर्पण के बजाय मुकाबला करने का निर्णय लिया। संघर्ष कई दिनों तक चला और स्थानीय वीरों ने अंग्रेजी सेना का सामना किया।
3 अक्तूबर 1824 का दिन इस संघर्ष का सबसे दुखद और गौरवपूर्ण अध्याय बना। इसी दिन राजा विजय सिंह और उनके अनेक साथियों ने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए। सेनापति कल्याण सिंह भी इस संघर्ष में बलिदान हुए। सरकारी विवरण में भी राजा विजय सिंह और उनके साथियों के 1824 में स्वतंत्रता के लिए सर्वोच्च बलिदान का उल्लेख मिलता है।राजा और उनके साथियों के बलिदान के बाद अंग्रेजी सेना ने क्षेत्र में कठोर दमन किया। स्थानीय परंपरा और उपलब्ध विवरणों में बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किए जाने और फांसी दिए जाने का उल्लेख मिलता है। कुंजा बहादुरपुर में 152 शहीदों की स्मृति आज भी बलिदान दिवस के रूप में याद की जाती है। वर्ष 2024 में इस घटना के 200वें बलिदान दिवस पर भी राजा विजय सिंह, सेनापति कल्याण सिंह और 152 शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई। यह घटना केवल किसी एक गांव या क्षेत्र का इतिहास नहीं है। यह उस दौर की उस चेतना को सामने लाती है, जिसमें स्थानीय समाज अपनी भूमि, सम्मान और स्वायत्तता की रक्षा के लिए विदेशी सत्ता के सामने खड़ा हुआ।
कुंजा बहादुरपुर की घटना का महत्व इस बात में भी है कि यह 1857 से लगभग तीन दशक पहले हुई थी। 2019 में कुंजा बहादुरपुर पहुंचे तत्कालीन उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने भी राजा विजय सिंह और उनके साथियों के बलिदान को 1857 से पहले के महत्वपूर्ण स्वतंत्रता संघर्ष के रूप में रेखांकित किया और कहा था कि ऐसे स्थानीय नायकों की वीरगाथाओं के बिना भारत का इतिहास अधूरा है।इतिहास केवल बड़े युद्धों और प्रसिद्ध नेताओं की कहानी नहीं होता। उसकी असली व्यापकता उन अनगिनत स्थानीय संघर्षों में भी दिखाई देती है, जिनमें सामान्य लोगों ने अपने समय की सत्ता को चुनौती दी। कुंजा बहादुरपुर की धरती इसी स्मृति को जीवित रखती है।
3 अक्तूबर का बलिदान दिवस राजा विजय सिंह, सेनापति कल्याण सिंह और उन सभी ज्ञात-अज्ञात वीरों को स्मरण करने का अवसर है, जिन्होंने 1824 में अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध अपने प्राणों की आहुति दी। उनकी गाथा यह याद दिलाती है कि स्वतंत्रता की चेतना भारत के अनेक हिस्सों में 1857 से बहुत पहले आकार ले चुकी थी। इतिहास के इन अध्यायों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना ही उन वीरों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।

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