बारिश में यह नदी महीनों उफनती रहती है। नदी पर कोई पुल एवं सड़क नहीं है। इससे ग्रामीणों को सालों भर परेशानी होती है। बारिश में तो लगभग चार महीने लोग गांव में ही कैद रहते हैं। इस दौरान कृषि व वनोत्पाद ही जीने का सहारा रहता है। बीमार होने पर मरीज को अस्पताल भी नहीं पहुंचा सकते। देहाती दवा अथवा अंधविश्वास का सहारा इन्हें लेना पड़ता है। उन्होंने बताया कि गांव में एक मध्य विद्यालय है, जहां वर्ग 8वीं तक की पढ़ाई होती है। मनोहरपुर एवं चिड़िया से दो शिक्षिका पढ़ाने आती है। लेकिन बारिश के दिनों में यह शिक्षिकाएं नदी में पानी बढ़ जाने के कारण स्कूल नहीं आ पाती। औसतन एक वर्ष में मात्र छह माह ही बच्चे पढ़ पाते हैं। इससे बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है। गांव में आंगनबाड़ी केन्द्र भी नहीं है।
हालांकि सांसद के प्रयास से बिजली तो आयी है लेकिन शुद्ध पेयजल, सिंचाई, बेहतर शिक्षा, चिकित्सा आदि समस्याओं का समाधान नहीं हो सका है। सांसद गीता कोड़ा ने बताया कि वे भी आज तक इस गांव में पुल व सड़क नहीं होने के कारण नहीं पहुंच पाई थीं। आज पहली बार वे नदी पार कर इस गांव में पहुंची है। यह गांव सारंडा का सबसे पिछड़ा गांव है। यहां के लोग बाहरी दुनिया, थाना, अस्पताल, प्रखंड, जिला मुख्यालय, हाई स्कूल आदि से पूरी तरह कटे हुए हैं। पहले कुछ जनप्रतिनिधि नदी की दूसरी छोर पर आकर गांव के ग्रामीणों को बुलाकर उनसे उनकी समस्या जानकर चले जाते थे।
सांसद ने बताया कि लेम्ब्रे गांव के समीप इस नदी पर पुल का निर्माण के लिए उन्होंने ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर आलम से बात की है। पुल निर्माण की स्वीकृति भी मिल चुकी है और सर्वे भी करवाया जा चुका हैं। जल्द ही पुलिया का निविदा होकर इसका निर्माण कार्य प्रारंभ हो जाएगा। इसके अलावे डीएमएफटी फंड से मुख्य सड़क से गांव तक की सड़क बनाने का कार्य कराया जायेगा। सांसद ने कहा कि आंगनबाड़ी के लिए मंत्री जोबा माझी से बात की जाएगी। सिर्फ लेम्ब्रे ही नहीं बल्कि वैसे गांव जहां बच्चे अधिक हैं वहां आंगनबाड़ी केन्द्र खोला जाएगा साथ ही पानी पहुंचाने का भी कार्य किया जाएगा।

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