Default Image

Months format

Show More Text

Load More

Related Posts Widget

Article Navigation

Contact Us Form

Terhubung

NewsLite - Magazine & News Blogger Template
NewsLite - Magazine & News Blogger Template

29 अक्टूबर को लोकमाता भगिनी निवेदिता की जयंती पर बिशेष, Special on the birth anniversary of Lokmata sister Nivedita on 29 October.


हाता। 29 अक्टूबर लोकमाता भगिनी निवेदिता का जन्मदिन है। इस अवसर पर उनके चरणों पर शत शत नमन करता हूं। आयरलैंड निवासी ईशाई परिवार में जन्मी मिस मार्गरेट स्वामी विवेकानंद के जीवन और आदर्श से प्रेरित होकर भारत में आई थी और भारत को अपनी कर्मभूमि बनाई थी। यह पहली बिदेशी नारी है जो सनातन धर्म को अपनाकर भारतीय नारी बनी थी।

मिस मार्गरेट जब पहली बार भारत में आई तब भगवान रामकृष्ण परमहंस की धर्म पत्नी माँ शारदा देवी जीवित थी।स्वामीजी मार्गरेट को मां के पास ले गए और परिचय कराए। स्वामीजी का मन में डर था माँ एक पुरानी विचार धारा के हिन्दू ब्राह्मण नारी है, जिस समय भारतीय समाज में जात पात, छूत अछूत की भावना प्रबल थी। इस स्थिति में माँ एक बिदेशिनी ईशाई कन्या को कैसे ग्रहण करेगी, लेकिन जो घटना घटी हमलोग तथाकथित आधुनिक नर नारी आज भी नहीं सोच सकते है। माँ ने मार्गरेट को अपनी बेटी के तरह गले लगा ली, खुकि बोलके पुकारी और अपने हाथों से ठाकुर जी का प्रसाद भी खिलाई। मार्गरेट इस भारतीय नारी को देखकर स्तम्भित हो गई और उनके भीतर माता मेरी को देखने लगी।

मार्गरेट भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म को जानने लगी। अंत में भारत से उनका प्यार हो गया और भारत में रहकर भारत के लिए कुछ करने का मन बना लिया। स्वामीजी उनको ब्रह्मचर्य मंत्र में दिच्छा दिया। मार्गरेट का नया नाम हुआ भगिनी निवेदिता। जब कलकत्ता में प्लेग की महामारी हुई तो निवेदिता स्वामीजी के साथ अपने प्राण को परवाह न करते हुए लोगों की सेवा की। गली गली जाकर साफ सफाई की एक सफाईवाला की तरह। भगिनी निवेदिता एक महिला शिक्षक और लेखिका भी थी। नारी शिक्षा के लिए भारत में क़ुछ काम करना चाहती थी।स्वामीजी के आदेश पर निवेदिता ने महिला स्कूल खुली, लेकिन लोग स्कूल में अपने लड़कियों को भेजना नहीं चाहते थे।

निवेदिता निराश हो गई। स्वामीजी ने साहस दिया। घर घर जाकर लोगों को समझाया स्वामीजी ने। धीरे धीरे लोग निवेदिता के स्कूल में बच्चियों को भेजना प्रारंभ किया। नारी शिक्षा शुरू हो गई। एकदिन अपने गुरु स्वामीजी से निवेदिता ने संन्यास लेने का प्रस्ताव रखी। स्वामीजी ने निवेदिता को संन्यास नहीं दिया और कहा,,तुम को देश का काम करना है। भारत अभी पराधीनता के जंजीर में जोकड़ी हुई है। देश को आजाद करना है। इस दिशा में तुम्हारी अहम भूमिका होगी जो तुम संन्यासी बनकर नहीं कर सकती हो। स्वामीजी के देहांत के बाद देशसेवा मे निवेदिता ने पुर्ण रूप से समर्पण कर दिया।

अपनी लेखनी के माध्यम से देशवाशियो को स्वाधीनता के लड़ाई  में प्रेरित करने लगी। ऋषि अरबिंद घोष,रवीन्द्रनाथ टेगोर आदि अनेक देशभक्तों ने निवेदिता की जिवनी ओर लिखनी से काफी प्रभावित हुए। सन्मान और आदर के साथ निवेदिता को,,भगिनी,,,कहके पुकारने लगे। स्वामीजी के तरह देश की सेवा करते हुए बहुत ही कम उम्र में निवेदिता रामकृष्ण अमृतधाम में चली गई। हम भारत के कितने लोग जानते है इन लोकमाता भगिनी निवेदिता का त्याग और बलिदान को,कितने लोग जानते है इस विदेशिनी का भारत  में नारी शिक्षा प्रचलन और स्वाधीनता के लिए आंदोलन करने की अमर कहानी को। 

नेताजी  सुभाषचंद्र बोस ने कहा है,,, मैं भारत से प्रेम करना सीखा हूँ विवेकानंद जी के जीवनी और वाणी से और विवेकानन्द को जान पाया हूं भगिनी निवेदिता की जीवनी से। आज स्वामीजी की मानस कन्या भगिनी निवेदिता के जन्मदिन के  शुभ अबसर पर  उनके चरणों में मैं कोटि कोटि नमन करता हूं और वंदन करता हूं।

No comments:

Post a Comment

GET THE FASTEST NEWS AROUND YOU

-ADVERTISEMENT-

.