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तौहीद मैकश: उर्दू अदब का आखिरी चिराग जो बुझ गया, Tauheed Makash: The last lamp of Urdu literature that got extinguished


चक्रधरपुर। उर्दू साहित्य को जिंदा रखने वाले चक्रधरपुर निवासी कवि तौहीद मैकश का देहांत हो गया। उन्होंने भरपूर 94 साल की जिंदगी जिया। 5 सितंबर 1931 को जन्म लेने वाले तौहीद मैकश चक्रधरपुर रेलवे में 30 सितंबर 1989 तक सेवा दिए। चीफ यार्ड मास्टर के पद पर रहते हुए वह सेवानिवृत्त हुए। नौकरी में रहते हुए फिर रिटायरमेंट के बाद 34 सालों तक वह उर्दू अदब की सेवा करते रहे। इस दौरान उन्होंने उर्दू कविताओं के पांच संग्रह का प्रकाशन किया। उनकी कविताओं की पहली किताब कहकशां कहकशां थी।

इसके बाद अजमे जवां, रक्से गिरदाब, खाबे रंगीन और रिफ्फत ए परवाज जैसी किताबों का प्रकाशन किया। उनकी अंतिम किताब रिफ्फत ए परवाज छप कर तैयार है। जिसका इजरा (उदघाटन) होना बाकी है। चक्रधरपुर में तौहीद मैकश जैसा कोई दूसरा उर्दू साहित्यकार अब तक नहीं गुजरा है। उर्दू भाषा की खिदमत के साथ-साथ उन्होंने समाज की सेवा में भी कोई कमी नहीं छोड़ा था। उर्दू मिडिल स्कूल ट्रस्टी में करीब 25 सदस्य थे। जिनके वह अध्यक्ष रहे. अहले हदीस छोटी मस्जिद के संस्थापक और पूर्व सचिव रहे थे. चक्रधरपुर में उर्दू लाइब्रेरी की स्थापना बासित अंसारी, नैयर आजम, नईम आगाज, कमरुल होदा आदि के साथ मिलकर किए थे।

चक्रधरपुर शहर के लिए एवं उर्दू साहित्य के लिए उनके योगदान को कभी फरामोश नहीं किया जा सकता। हम कह सकते हैं कि वह चक्रधरपुर में उर्दू अदब के इकलौते शायर थे। उनके देहांत के बाद उर्दू अदब को अब रौशनी  देने वाला उनके जैसा कोई अदीब नहीं बचा है। गुरुवार को मगरिब नमाज के बाद पुरानी बस्ती कब्रिस्तान में उन्हें दफन किया गया। उनके जनाजे में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए और सबों को इस बात का मलाल था कि अब चक्रधरपुर में उर्दू साहित्य की रक्षा करने वाला कोई नहीं रह गया है। उनके चार पुत्र और चार पुत्रियां हैं। सभी वैवाहिक जीवन व्यतीत कर रहे हैं। परिवार नाती नातिनी, पोता पोती से भरा पूरा है।

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