Jamshedpur (Nagendra) झारखंड आंदोलन के अग्रणी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन का निधन हो गया। उन्होंने दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में अंतिम सांस ली। तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जिसके बाद उनके बेटे सीएम हेमंत सोरेन भी दिल्ली रवाना हो गए। हाल ही में शिबू सोरेन ने अपना 81वां जन्मदिन मनाया था।
सर गंगाराम अस्पताल के अध्यक्ष ने निधन पर शोक जताया -सर गंगाराम अस्पताल के नेफ्रोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर एके भल्ला ने जानकारी देते हुए बताया कि मुझे दुख हो रहा है कि शिबू सोरेन जी को लंबी बीमारी के बाद आज सोमवार की सुबह 8:56 बजे मृत घोषित कर दिया गया। उसके बाद से पूरे झारखंड में शोक की लहर दौड़ गई। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू एवं प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी सहित विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी दिशोम गुरु शिबू सोरेन जी के निधन पर गहरा दुःख प्रकट किया।
शिबू सोरेन जी का नेमरा में हुआ जन्म-दिशोम गुरु शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को आज के रामगढ़ जिले और हजारीबाग जिले के नेमरा गांव में हुआ था। उनके पिता सोबरन मांझी उस क्षेत्र के सबसे पढ़े-लिखे व्यक्ति थे और समाज में शिक्षा की अलख जगा रहे थे। उस समय झारखंड में महाजनी प्रथा चरम पर थी। लोगों को उनकी उपज का एक तिहाई ही मिलता था। बाकी महाजन ले लेते थे। जो लोग ब्याज नहीं दे पाते थे, उन्हें और भी ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ता था। हालांकि शिबू सोरेन के पिता सोबरन मांझी इसके खिलाफ आवाज उठाते रहे और उनकी आवाज इतनी जोरदार थी कि महाजन डर जाते थे।
पिता की हत्या के बाद शुरू किया आंदोलन-सन 1957 में महाजनों के इशारे पर शिबू सोरेन के पिता की हत्या कर दी गई थी, लेकिन शिबू सोरेन में इतनी हिम्मत, बहादुरी और जुनून था कि उन्होंने अपनी मेहनत से पूरे परिवार को अपने पैरों पर खड़ा कर दिया। शिबू सोरेन ने महाजनी प्रथा के खिलाफ भी आवाज उठानी शुरू कर दी थी। वे इसके खिलाफ आंदोलन में कूद पड़े। उन्होंने महाजनी आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन में महिलाएं हाथों में दरांती और पुरुष हाथों में धनुष-बाण लेकर रहा करते थे। जमींदारों के खेतों से महिलाएं फसल काटकर ले जाती थीं। इस कारण इसे धनकटी आंदोलन भी कहा जाता था। आंदोलन में कई लोग मारे गए, शिबू सोरेन को पारसनाथ के जंगलों में भी भागना पड़ा, लेकिन उन्होंने आंदोलन बंद नहीं किया।
ऐसे बने दिशोम गुरु-शिबू सोरेन का प्रभाव इतना बढ़ गया था कि महाजनी प्रथा और उस समय के समाज को ओडिशा, पश्चिम बंगाल और बिहार में बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। अगर झारखंड में ढोल की आवाज सुनाई देती तो झारखंड के लोग जान जाते कि गुरुजी का संदेश आया है। धनकटी आंदोलन ने शिबू सोरेन को आदिवासियों का नेता बना दिया। बाद में आदिवासी उन्हें दिशोम गुरु कहने लगे. दिशोम का मतलब है जंगल या जमीन. आदिवासी संस्कृति में इसका गहरा संबंध है। दिशोम गुरु का मतलब है जंगल या जमीन का नेता।
अलग राज्य झारखंड के लिए आंदोलन-धनकटी आंदोलन ने झारखंड आंदोलन को भी जोर दिया। 4 फरवरी 1972 को बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन और कामरेड एके राय ने बैठक कर तय किया कि एक पार्टी बनाई जाएगी। जो अलग राज्य झारखंड की मांग करेगी. इस पार्टी का नाम पड़ा झारखंड मुक्ति मोर्चा। झारखंड को अलग राज्य बनाने की मांग पहले से की जा रही थी, लेकिन जेएमएम के गठन के बाद इसने और जोर पकड़ लिया। उनकी मेहनत रंग भी लाई और 15 नवंबर 2000 को अलग राज्य झारखंड का गठन हुआ।
झामुमो के संस्थापक अध्यक्ष बिनोद बिहारी एवं महासचिव शिबू सोरेन बने -1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा का जब गठन हुआ, उस समय बिनोद बिहारी महतो झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक अध्यक्ष बने और शिबू सोरेन महासचिव बने। बाद में झारखंड मुक्ति मोर्चा की कमान शिबू सोरेन के हाथों में आ गई और तब से झारखंड मुक्ति मोर्चा का झारखंड में दबदबा है और शिबू सोरेन इसकी धुरी रहे हैं। उनके निधन से आदिवासी समाज ने एक बड़ा नेता खो दिया है।
शिबू सोरेन का राजनीतिक सफर-झारखंड को अलग राज्य बनाने में शिबू सोरेन की अहम भूमिका रही है। उनकी कहानी संघर्ष से भरी रही है। उन्हें मौजूदा समय में आदिवासी समाज का सबसे बड़ा नेता माना जाता है। शिबू सोरेन ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत 1977 में की जब उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन वे लोकसभा चुनाव हार गए। 1980 में उन्होंने दूसरी बार चुनाव लड़ा। इस चुनाव में उन्हें सफलता मिली और वे जीते। इसके बाद वे लगातार चुनाव जीतते गए। 1989, 1991, 1996, 2004, 2009 और 2014 में भी वे सांसद चुने गए। 2002 में थोड़े समय के लिए शिबू सोरेन राज्यसभा के सदस्य भी रहे। वहीं 2004 में मनमोहन सिंह सरकार में वे कोयला मंत्री रहे। गुरुजी का राष्ट्रीय राजनीति में काफी प्रभाव था और झारखंड का मामला गुरुजी के बिना दिल्ली तक नहीं पहुंचता था। अलग झारखंड राज्य बनने के बाद शिबू सोरेन झारखंड के दूसरे मुख्यमंत्री बने। 2 मार्च 2005 को उन्होंने पहली बार झारखंड के मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाला था, लेकिन 10 दिन बाद ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। वे 2008 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। इस बार 4 महीने 22 दिन तक उनका कार्यकाल चला जबकि बतौर मुख्यमंत्री उनका तीसरा कार्यकाल 30 दिसंबर 2009 से 31 मई 2010 तक चला। वर्तमान में भी शिबू सोरेन राज्यसभा सांसद थे।
शिबू सोरेन के निधन से शोक में डूबा झारखंड, नेताओं ने जताया शोक-झामुमो सुप्रीमों दिशोम गुरु शिबू सोरेन जी के निधन की जानकारी उनके पुत्र और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने X पर ट्वीट कर दी। हेमंत सोरेन ने अपने भावुक ट्वीट में कहा है कि आज मैं शून्य हो गया। शिबू सोरेन के निधन की खबर से झारखंड समेत पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। इस दुखद खबर की जानकारी मिलने के बाद झामुमो पार्टी समेत विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने गहरी संवेदना व्यक्त की है।
तीन दिन का राज्यकीय शोक घोषित -झारखंड सरकार ने दिशोम गुरू शिबू सोरेन के निधन पर तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया है। इस दौरान कोई भी सरकारी कार्यक्रम आयोजित नहीं किए जाएंगे। शोक की अवधि तक राष्ट्रीय झंडा आधा झंडा झुका रहेगा। चार और पांच अगस्त को सरकारी कार्यालय बंद रहेंगे।

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