Jamshedpur (Nagendra) । आनंद मार्ग प्रचारक संघ की ओर से शहर के आसपास देहात क्षेत्र के स्कूल के बाहर अभिभावको के बीच जाकर लोगों को समझाया जा रहा है कि भारतीय सभ्यता संस्कृति को बचाने के लिए एवं भारत के प्राण धर्म का अपमान करने वाली व्यवस्था लिव इन रिलेशन का सैद्धांतिक विरोध जरूरी है । हर बस्ती मोहल्ले में लोगों के बीच में यह चर्चा होना जरूरी है, क्योंकि इसका संबंध मानव जाति से है जब हम दुखी रहेंगे तो सृष्टि पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा । आज समाज में भोग विलासिता चरम सीमा पर है । इस सृष्टि का सबसे उत्तम जीव मनुष्य है मनुष्य और पशु में इन्हीं सब वृत्तीयों के चलते कुछ अंतर होता है, परंतु हम समझ नहीं रहे और समाज को असभ्य बनाया जा रहा है।
पशु वृद्धि के तरफ फिर वापस जा रहे हैं। हमको जिस कुव्यवस्था से भगवान शिव ने हम लोगों को निकाला था और विवाह प्रथा को स्थापित कर एक सभ्य समाज की स्थापना करने के लिए स्वयं पार्वती से विवाह कर स्थापित किया। सबसे प्रथम इस सृष्टि पर विवाह प्रथा को देने वाले भगवान शिव ही थे । उसके पहले समाज अर्ध विकसित था और महिलाओं का कोई पहचान नहीं था उनसे जो बच्चे जन्म लेते थे उनके लिए कोई पहचान नहीं था मां ही उन बच्चों का भरण पोषण करती थी और महिलाओं का सबसे ज्यादा शोषण भगवान शिव के पहले होता था । आज फिर से हमारी महिलाओं के साथ लिविंग रिलेशनशिप जैसी व्यवस्था लाकर उनका शोषण करने का तैयारी है । जिस समाज में महिला का सम्मान नहीं है वह जड़वाड़ी समाज है।
युवा किसी भी समाज का मेरुदंड होता है अगर उस समाज का मेरुदंड ही भोग विलास में लिप्त हो जाए तो विनाश निश्चित है। लिविंग रिलेशनशिप व्यवस्था से आने से जड़वादिता संस्कृति स्थापित होने वाली है। एक तो मैकाले की शिक्षा पद्धति से पहले से ही इस शिक्षा पद्धति से भारत का प्राण धर्म बहुत कमजोर हुआ है। इससे उस सभ्यता का अपमान हो रहा है जो भारत का प्राण धर्म है। भगवान शिव ने ही विवाह प्रथा को स्थापित कर सबसे पहले महिलाओं को सम्मान दिया। इस वक्तव्य में स्पष्ट किया गया है कि किसी भी व्यक्ति, समाज या राष्ट्र की आत्मा उसके "प्राण धर्म" में निहित होती है — वह आंतरिक अनुशासन, जीवन-दृष्टिकोण और मूल्य जो मानव को पशुत्व से उठाकर दिव्यता की ओर ले जाते हैं। आनंद मार्ग के अनुसार, भारत की सभ्यता सदियों से एक आध्यात्मिक दृष्टिकोण पर आधारित रही है, जहाँ जीवन का प्रत्येक पहलू साधना का ही अंग माना गया। भारत का प्राचीन शिक्षातंत्र, सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक मूल्य उसी आध्यात्मिक जीवनदृष्टि से पोषित हुए जिसे "प्राण धर्म" कहा जा सकता है।
इस वक्तव्य में यह भी बताया गया कि किस प्रकार विदेशी शासन — चाहे वह मुग़ल हो, ब्रिटिश हो या पूंजीवादी शक्तियाँ — भारत के प्राण धर्म को कमजोर करने का प्रयास करते रहे। ब्रिटिशों ने शिक्षा के माध्यम से एक ऐसा वर्ग खड़ा किया जो भारतीय होकर भी भारतीय न रहा। साम्यवाद ने भी,भौतिकवाद के नाम पर, मानव जीवन के आध्यात्मिक मूल्यों को नष्ट करने की कोशिश की। किंतु आनंद मार्ग इस विघटनकारी प्रक्रिया के विरुद्ध खड़ा है। आनंद मार्ग का सामाजिक-आर्थिक दर्शन, उसकी शिक्षा-नीति और आध्यात्मिक साधना प्रणाली, सभी इस बात के लिए समर्पित हैं कि प्रत्येक मानव अपने प्राण धर्म का पुनः अन्वेषण कर सके और उसे पूर्ण रूप से जी सके। आनंद मार्ग जीवन को माया नहीं मानता, बल्कि उसे एक सापेक्ष सत्य मानकर, उसकी समस्याओं के समाधान के लिए सक्रिय भागीदारी करता है। आज, जब दुनिया भौतिकता और मानसिक तनाव से ग्रसित है, आनंद मार्ग का यह संदेश समय की माँग बन गया है।
मानव को उसकी आत्मचेतना से जोड़कर, उसकी आध्यात्मिक भूख को तृप्त करना ही सच्ची शिक्षा और सच्चा धर्म है। आनंद मार्ग विश्व के सभी देशों को उनके विशिष्ट राष्ट्रीय प्राण धर्म को सुरक्षित रखते हुए, एक सार्वभौमिक मानव धर्म की स्थापना के लिए आमंत्रित करता है।

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