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Bhopal ऑनलाइन गेम की लत: बच्चों और युवाओं के भविष्य पर मंडराता ख़ामोश ख़तरा Online game addiction: A silent threat to the future of children and youth

 


Upgrade Jharkhand News. आज ऑनलाइन गेम केवल समय बिताने का साधन नहीं रहे, बल्कि कई मामलों में वे बच्चों और युवाओं के मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक जीवन को गहराई से प्रभावित कर रहे हैं। जीत-हार, लेवल, वर्चुअल पहचान और अनदेखी प्रतिस्पर्धा के दबाव में कई बच्चे वास्तविक दुनिया से कटते चले जाते हैं। धीरे-धीरे पढ़ाई, परिवार, दोस्त और जिम्मेदारियाँ पीछे छूटने लगती हैं।


कैसे बनती है लत? -ऑनलाइन गेम इस तरह डिज़ाइन किए जाते हैं कि खिलाड़ी बार-बार लौटे। इनाम, चुनौती, काउंटडाउन और रैंकिंग सिस्टम मस्तिष्क में डोपामिन प्रतिक्रिया को बढ़ाते हैं। किशोर अवस्था में निर्णय क्षमता अभी विकसित हो रही होती है, इसलिए बच्चे इस चक्र में जल्दी फँस जाते हैं। लंबे समय तक स्क्रीन पर रहने से नींद की कमी, चिड़चिड़ापन, एकाकीपन, चिंता और अवसाद जैसे लक्षण उभर सकते हैं।


परिवार और समाज की भूमिका -  अक्सर माता-पिता यह मान लेते हैं कि बच्चा मोबाइल पर “बस खेल” रहा है। लेकिन समय पर संवाद न होना, भावनात्मक दूरी और डिजिटल निगरानी की कमी समस्या को बढ़ा देती है। ज़रूरत है कि परिवार बच्चों से खुलकर बात करे, उनके दोस्तों, रुचियों और ऑनलाइन गतिविधियों में रुचि ले।


कुछ ज़रूरी कदम उठाएं

* बच्चों के लिए स्क्रीन-टाइम की स्पष्ट सीमा तय करें।

* गेम के कंटेंट और आयु-उपयुक्तता पर ध्यान दें।

* घर में डिजिटल-डिटॉक्स के समय तय हों खाने, पढ़ाई और सोने से पहले  खेल, संगीत, किताबें और सामाजिक गतिविधियों को बढ़ावा दें।

* स्कूलों में डिजिटल साक्षरता और मानसिक स्वास्थ्य पर नियमित सत्र। 


ऑनलाइन गेमिंग इंडस्ट्री पर आयु-सीमा, चेतावनी संदेश, समय-सीमा अलर्ट और जोखिमपूर्ण कंटेंट पर सख़्त नियंत्रण ज़रूरी है। साथ ही, स्कूल-कॉलेज स्तर पर काउंसलिंग सुविधाओं का विस्तार समय की मांग है।              आनलाइन गेम्स के कारण हो रही दुखद घटनाएं हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि तकनीक का अंधाधुंध उपयोग किस दिशा में ले जा रहा है। बच्चों का भविष्य सुरक्षित रखने के लिए परिवार, स्कूल, समाज और सरकार सभी को मिलकर सतर्क, संवेदनशील और सक्रिय होना होगा। मनोरंजन और लत के बीच की रेखा पहचानना और समय रहते हस्तक्षेप करना ही ऐसी त्रासदियों को रोक सकता है।  डाॅ. पंकज भारद्वाज



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