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Bhopal वंदे मातरम् : सम्मान, मर्यादा और राष्ट्रचेतना का अमर उद्घोष Online game addiction: A silent threat to the future of children and youth...

 


Upgrade Jharkhand News. वंदे मातरम् को लेकर जारी की गई नवीनतम गाइडलाइन ने राष्ट्रगीत के सम्मान से जुड़े एक महत्वपूर्ण तथ्य को स्पष्ट किया है। अब तक देश में राष्ट्रगान के समय खड़े होना अनिवार्य माना जाता रहा है, किंतु नई व्यवस्था के अंतर्गत वंदे मातरम् के गायन अथवा सामूहिक प्रस्तुति के समय भी खड़े होना आवश्यक माना जाएगा। यह निर्णय वंदे मातरम् को केवल सांस्कृतिक प्रतीक नहीं, बल्कि राष्ट्रसम्मान से जुड़ा आचरण मानने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसका उद्देश्य किसी पर दबाव बनाना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और मर्यादा को सुदृढ़ करना है। वंदे मातरम् का इतिहास भारत के स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा में रचा-बसा है। वंदेमातरम की रचना महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी और इसे अपने कालजयी उपन्यास आनंदमठ में स्थान दिया। सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम् जैसे शब्द भारतभूमि को एक सजीव, करुणामयी और दिव्य मातृरूप में प्रतिष्ठित करते हैं। यही कारण है कि यह गीत जन-जन में राष्ट्र के प्रति श्रद्धा और समर्पण की भावना जागृत करता है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में वंदे मातरम् केवल गीत नहीं, बल्कि संघर्ष का उद्घोष बन गया। सभाओं, जुलूसों और आंदोलनों में यह नारा नहीं, बल्कि बलिदान की शपथ था। अंग्रेजी हुकूमत ने इसकी शक्ति को पहचानते हुए कई बार इसके प्रयोग पर प्रतिबंध लगाया, किंतु यह गीत जितना दबाया गया, उतना ही जनमानस में गहराई से उतरता गया।


आजादी के बाद भी वंदे मातरम् का महत्व कम नहीं हुआ। स्वतंत्र भारत में ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) से यह गीत पहली बार गूंजा और करोड़ों नागरिकों ने इसे स्वाधीनता के नवप्रभात का प्रतीक मानकर सुना। वह क्षण संघर्ष से स्वराज की यात्रा का सांकेतिक साक्ष्य था। संविधान निर्माताओं ने भी वंदे मातरम् के ऐतिहासिक और भावनात्मक महत्व को स्वीकार करते हुए इसे राष्ट्रगीत का सम्मान प्रदान किया। यह निर्णय भारत की सांस्कृतिक विविधता और ऐतिहासिक संतुलन का प्रतीक है। नई गाइडलाइन इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए यह स्पष्ट करती है कि जैसे राष्ट्रगान के समय खड़े होना सम्मान का प्रतीक है, वैसे ही वंदे मातरम् के समय खड़े होकर उसका अभिवादन करना राष्ट्र के प्रति आदर का भाव दर्शाता है।  यह गाइडलाइन यह भी संदेश देती है कि राष्ट्रप्रेम केवल शब्दों में नहीं, आचरण में भी प्रकट होना चाहिए।


वंदे मातरम् के प्रति सम्मान किसी मत, वर्ग या विचारधारा से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है।आज के समय में, जब सामाजिक और वैचारिक विभाजन की आशंकाएँ बढ़ रही हैं, वंदे मातरम् हमें साझा विरासत की याद दिलाता है। यह गीत हमें बताता है कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि भावनाओं, संस्कारों और बलिदानों की भूमि है। वंदे मातरम् अब केवल गाया जाने वाला गीत नहीं, बल्कि खड़े होकर निभाया जाने वाला राष्ट्रीय दायित्व है। यही इसकी सच्ची गरिमा और सार्थकता है। डॉ. पंकज भारद्वाज



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