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Jamshedpur छायावाद का अंतिम गौरव: आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री The Last Glory of Chhayavad: Acharya Janaki Vallabh Shastri

 


Upgrade Jharkhand News. हिंदी साहित्य के आकाश में जब छायावाद के चार सूर्य—प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी—अपनी रश्मियाँ बिखेरकर अस्त होने की ओर थे, तब एक ऐसी मेधा का उदय हुआ जिसने न केवल छायावादी परंपरा को जीवित रखा, बल्कि उसे नई ऊंचाइयों और शास्त्रीय गरिमा से मंडित किया। वे थे आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री। उन्हें निर्विवाद रूप से 'छायावाद का पांचवां स्तंभ' और इस युग का 'अंतिम आलोक' कहा जाता है।


साहित्यिक पृष्ठभूमि और निराला का सान्निध्य -5 फरवरी 1916 को बिहार के गया जिले में जन्मे जानकी वल्लभ शास्त्री मूलतः संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। उनकी विद्वत्ता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि मात्र 16-17 वर्ष की आयु में उन्होंने 'काकली' जैसे कालजयी संस्कृत गीत काव्य की रचना कर दी थी।शास्त्री जी के जीवन और साहित्य पर सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का गहरा प्रभाव रहा। निराला ने ही उनकी प्रतिभा को पहचानकर उन्हें हिंदी में लिखने के लिए प्रेरित किया था। मुजफ्फरपुर स्थित उनका आवास 'निराला निकेतन' केवल एक घर नहीं, बल्कि दशकों तक हिंदी साहित्य का एक शक्ति-केंद्र बना रहा। शास्त्री जी ने छायावाद की उस सूक्ष्मता को पकड़ा, जहाँ शब्द केवल अर्थ नहीं देते, बल्कि एक संगीत पैदा करते हैं।


छायावादी काव्य का परिष्कार -छायावाद की मुख्य विशेषता थी—प्रकृति का मानवीकरण, आत्मनिष्ठता, और सूक्ष्म सौंदर्यबोध। शास्त्री जी ने इन तत्वों को आत्मसात किया, लेकिन उन्होंने इसमें 'गीति तत्व' को प्रधानता दी। उनके काव्य में छायावाद की रहस्यवादिता तो है, लेकिन वह दुरूह (कठिन) नहीं है।उनकी रचनाओं जैसे 'रूप-अरूप', 'तीर तरंग', 'शिप्रा' और 'अवंतिका' में छायावादी सौंदर्य अपने चर्मोत्कर्ष पर दिखता है। जहाँ पंत ने प्रकृति के सुकुमार रूप को पकड़ा, वहीं शास्त्री जी ने प्रकृति के भीतर छिपे संगीत को शब्दों में पिरोया। उनके गीतों में एक ऐसी प्रवाहमयता है जो पाठक को सीधे भावलोक में ले जाती है।


'राधा' महाकाव्य: छायावाद का आधुनिक विस्तार -आचार्य शास्त्री का महाकाव्य 'राधा' उनके छायावादी चिंतन का शिखर है। सात खंडों में विभक्त यह कृति राधा के पारंपरिक रूप को बदलकर उसे एक आधुनिक, दार्शनिक और मानवीय धरातल पर खड़ा करती है। इस महाकाव्य में उन्होंने दिखाया कि प्रेम केवल विरह और मिलन नहीं है, बल्कि वह एक वैश्विक चेतना है। छायावादी कवियों की तरह उन्होंने भी नारी को केवल हाड़-मांस की पुतली नहीं, बल्कि प्रेरणा की शक्ति के रूप में चित्रित किया।


नवगीत के अग्रदूत -यद्यपि शास्त्री जी छायावाद के स्तंभ थे, लेकिन उन्होंने कभी भी साहित्य को जड़ नहीं होने दिया। जब छायावाद बोझिल होने लगा, तो उन्होंने उसे 'नवगीत' की ओर मोड़ा। उन्होंने लोक धुनों और शास्त्रीय रागों का ऐसा समन्वय किया कि उनके गीत जन-जन की जुबान पर चढ़ गए। उनका प्रसिद्ध गीत— "किसने बांसुरी बजाई?"—छायावादी संस्पर्श और आधुनिक लय का अद्भुत संगम है।


एक स्वाभिमानी मनीषी -शास्त्री जी केवल शब्दों के शिल्पी नहीं थे, बल्कि सिद्धांतों के धनी भी थे। उनका छायावाद उनके जीवन दर्शन में भी झलकता था—स्वच्छंद और निर्भीक। यही कारण था कि उन्होंने 1994 और 2010 में भारत सरकार द्वारा दिए जाने वाले 'पद्मश्री' सम्मान को यह कहकर ठुकरा दिया कि उनके शिष्य उनसे बड़े पुरस्कार पा चुके हैं, अतः अब उनके लिए इस सम्मान का कोई औचित्य नहीं। यह स्वाभिमान छायावादी कवियों की वह विरासत थी, जिसे निराला ने जिया था।


आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री ने छायावाद को तब संभाला जब आलोचक इसे मृत घोषित कर रहे थे। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से यह सिद्ध किया कि छायावाद कोई कालखंड नहीं, बल्कि एक शाश्वत दृष्टि है। उनके जाने के साथ ही हिंदी साहित्य के उस स्वर्ण युग की अंतिम जीवंत कड़ी टूट गई। आज जब कविता बाजारवाद और सपाटबयानी का शिकार हो रही है, शास्त्री जी का छायावादी सौंदर्यबोध हमें पुनः अपनी जड़ों और भाषा की मिठास की ओर लौटने की प्रेरणा देता है।


आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री ने छायावाद को तब संभाला जब आलोचक इसे मृत घोषित कर रहे थे। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से यह सिद्ध किया कि छायावाद कोई कालखंड नहीं, बल्कि एक शाश्वत दृष्टि है। उनके जाने के साथ ही हिंदी साहित्य के उस स्वर्ण युग की अंतिम जीवंत कड़ी टूट गई। आज जब कविता बाजारवाद और सपाटबयानी का शिकार हो रही है, शास्त्री जी का छायावादी सौंदर्यबोध हमें पुनः अपनी जड़ों और भाषा की मिठास की ओर लौटने की प्रेरणा देता है।



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