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Bhopal 25 दिन, 200 अरब डॉलर, हजारों मौतें, और खाड़ी देशों का पानी खतरे में 25 days, $200 billion, thousands of deaths, and the Gulf's waters at risk

 


Upgrade Jharkhand News. युद्ध छेड़ने के 25 दिन के भीतर अमेरिका अब ईरान के साथ बातचीत पर आ गया है। पाकिस्तान उस बातचीत की मेज़बानी करने का दावा कर रहा है। युद्ध का एक महीना भी नहीं गुजरा और बातचीत की बात करना दुनिया के तमाम शांति पसंद मुल्कों के लिए सुखद संकेत होता। मगर ईरान की ओर से मिल रहे संकेत तत्काल युद्ध समाप्त होने के संकेत नहीं देते और बातचीत की इच्छा जताना अपने आप में दर्शाता है कि अमेरिका इस युद्ध में थक गया है या वह उपलब्धियां हासिल नहीं कर पाया, जिसके लिए युद्ध में उतरा। अगर बातचीत ही करनी थी, तो पिछली बातचीत के बीच हमले का कोई औचित्य नहीं था। बात रणनीति की है,अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बयान मीडिया में छाया है कि इस युद्ध के लिए उनके रक्षा सचिव पीट हेगसेठ ने कहा था- लेट्स डू इट। पिछले ही हफ्ते अमेरिकी नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर के निदेशक जो केंट ने इस युद्ध के औचित्य पर सवाल खड़े करते हुए इस्तीफा दे दिया था और अब ट्रंप का पांच दिवसीय युद्ध विराम और शांति समझौते की बात करना कई सवाल खड़े करता है।


अमेरिका ने ईरान पर हमले और युद्ध विराम के संदर्भ में जो भी कहा हो, पर उससे इतर ईरान ने इस बार युद्ध को अपनी सभ्यतागत अस्तित्व और साख की लड़ाई मान ली है,इसलिए युद्ध समाप्त होने में समय लगेगा।और जब भी युद्ध समाप्त होगा, तो ईरान, इज़राइल और अमेरिका को निश्चय ही इस युद्ध में हुए ध्वंस का पुनर्निर्माण करने में दशकों लगेंगे। पर जो नैतिकता और साख का ढांचा टूट गया है, उसको बनाने में सदियां लगेंगी। सत्य कहां है? तथ्य कहां है? सबूत कहां है? झूठ सागर में डूबता जा रहा। यह सेंचुरियन ब्लंडर है। सदी की भूल। यह सदी की त्रासदी है और सदी का सबक भी। अब सागर के भीतर से नयी विश्व-व्यवस्था की सुनामी उठ रही है।  दुनिया अब उस मोड़ पर है, जहाँ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम दे रहे हैं, और ईरानी सैन्य कमांडर उन्हें उन्हीं की भाषा में 'यू आर फायर्ड' कह रहे हैं। जब अमेरिका ने कहा कि वह ईरान के सभी ऊर्जा ढांचों को नेस्तनाबूद कर देगा, तो ईरान ने जवाब दिया कि ठीक है, वह तब तक के लिए हार्मूज की खाड़ी को बंद करके रखेगा, जब तक कि उन ढांचों का पुनर्निर्माण न हो जाय। बस इसी बयान ने ट्रंप को बैकफुट पर ला दिया और वे शांति वार्ता की बात करने लगे।


अगर बारीकी से देखें तो यह सिर्फ युद्ध नहीं, यह रणनीति का अंतिम संस्कार है, जहाँ दोनों पक्ष पानी, बिजली और स्कूलों को निशाना बना रहे हैं, और विश्व समुदाय इस आत्मघाती नाटक के सबसे कड़वे फल भोग रहा है। इंटरनेशनल रेड क्रिसेंट की रिपोर्ट है कि अब तक ईरान की 82 हजार से ज्यादा इमारतों को नुकसान पहुंचा है। नुकसान इजराइल में भी काफी हो रहा है। अनेक विश्लेषक इस युद्ध को 'बहुध्रुवीय व्यवस्था' के नजरिए से देख रहे हैं, लेकिन वे उस मूल सत्य को नजरअंदाज कर रहे हैं जो अब हर गली, हर ड्रोन हमले, और हर अल्टीमेटम में झलक रहा है। यह युद्ध कोई रणनीति नहीं, बल्कि एक बड़े घोटाले को छुपाने का सस्ता नाटक है। पेंटागन ने स्वीकार किया है कि ईरान पर हमले के पहले सप्ताह में ही अमेरिका ने लगभग 110 अरब डॉलर खर्च कर दिए। 24 मार्च 2026 तक यह आंकड़ा 200 अरब डॉलर के पार पहुंच चुका है। पेंटागन ने कांग्रेस से 200 अरब डॉलर की अतिरिक्त धनराशि की मांग की है । विशेषज्ञों का अनुमान है कि युद्ध की दैनिक लागत 1 से 2 अरब डॉलर के बीच है । यह रकम एक नए 'फोर्ड-क्लास' विमानवाहक पोत से भी अधिक है। डेमोक्रेटिक सांसदों का कहना है कि असली आंकड़ा 500 अरब डॉलर के पार जा सकता है। 25 दिन बीत चुके हैं।


ईरान का परमाणु कार्यक्रम खत्म नहीं हुआ, बल्कि नतंज़ सुविधा पर दोबारा हमला हुआ,ईरान ने दीमोना (इज़राइल का परमाणु ढांचा) पर मिसाइल दागी। अब अमेरिका को अपने ही सहयोगी देशों (यूएई, सऊदी अरब) की जलापूर्ति और बिजली घरों की सुरक्षा की चिंता सता रही है। अमेरिका को एक इंच ईरानी जमीन का कब्जा नहीं मिला है लेकिन ईरान को जलडमरूमध्य का टोल प्लाज़ा मिल गया।  अमेरिका ने युद्ध का जो आधार बताया, वह था ईरान का परमाणु हथियार बनाने का 'तत्काल खतरा'। संयुक्त राष्ट्र परमाणु निरीक्षकों (IAEA) ने स्पष्ट किया कि उनके पास ऐसे किसी भी सबूत का अभाव है। यूरोपीय संघ के विदेश मंत्री जोसेप बोरेल ने कहा कि राजनयिक विकल्प अभी समाप्त नहीं हुए थे। रूस और चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव रखा कि बातचीत जारी रहे। लेकिन अमेरिका ने न तो सुरक्षा परिषद का रुख किया, न नाटो का, न यूरोपीय संघ का। उसने अकेले ही यह फैसला लिया। दुनिया ने यह भी सवाल किया कि अगर खतरा इतना तात्कालिक था, तो IAEA की रिपोर्ट का इंतजार क्यों नहीं किया गया? इस सवाल का जवाब आज तक नहीं मिला।


दरअसल  फरवरी 2026 में अमेरिकी अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी ने एप्सटीन फाइल्स जारी करने का वादा किया था। 3 मार्च 2026 को विभाग ने लगभग 50,000 दस्तावेज़ हटा लिए थे, जिन्हें बाद में संवेदनशील जानकारी हटाकर फिर से जारी किया गया । जब फाइलें आईं, तो उनमें काफी हिस्सा काली स्याही से ढंक दिया गया था पुराने अखबारों के कटिंग्स, पहले से लीक दस्तावेज़, और हज़ारों पन्ने की सामग्री तो थी, पर किसी बड़े नाम का ज़िक्र इस रूप में नहीं था कि शर्मिंदगी हो। यूएसए टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, फाइलों में से 47,635 दस्तावेज़ समीक्षा के लिए हटाए गए थे, और कुछ फाइलों में राष्ट्रपति ट्रंप के खिलाफ आरोपों का जिक्र था । यानी सब छुपा लिया गया और फिर, 28 फरवरी 2026 को अचानक युद्ध शुरू हो गया। क्या यह संयोग है  या यह सूचना युद्ध (इंफार्मेशन वॉरफेयर ) का सबसे गिरा हुआ स्तर है? ट्रंप को इस युद्ध से क्या मिला? एप्सटीन फाइल्स दब गईं। इज़राइल को क्या मिला? एक लंबा, थका देने वाला युद्ध जहाँ उसके शहरों पर मिसाइलें गिर रही हैं। नेतन्याहू की मौत की अफवाहें फैलाई गईं। वे सुरक्षित हैं, लेकिन यह अफवाहें बताती हैं कि यह युद्ध सिर्फ ज़मीन पर नहीं, बल्कि डीपफेक और सोशल मीडिया के स्क्रीन पर भी लड़ा जा रहा है।


यह युद्ध अब पानी पर आ गया है। यह कोई सामान्य संघर्ष नहीं रहा। ईरान का आरोप है कि अमेरिका ने पहले ही क़ेश्म द्वीप पर एक अलवणीकरण संयंत्र (desalination plant) पर हमला कर दिया, जो 30 गाँवों को पानी सप्लाई करता था और अब तक चार जल आपूर्ति ढांचों को निशाना बना चुका है। अमेरिका का आरोप है कि IRGC क्षेत्र के अलवणीकरण संयंत्रों को निशाना बनाने की योजना बना रहा है। IRGC का जवाब साफ था कि "यह अमेरिकी सेना है जिसने युद्ध शुरू किया, 180 स्कूली बच्चों की हत्या करके और अब तक पाँच जल आपूर्ति बुनियादी ढांचे को निशाना बना चुकी है, जिसमें क़ेश्म द्वीप का अलवणीकरण संयंत्र शामिल है।"  हालांकि बहरीन में पहले ही एक अलवणीकरण संयंत्र ईरानी ड्रोन हमले में क्षतिग्रस्त हो चुका है। खाड़ी देशों में 90% पीने का पानी अलवणीकरण पर निर्भर है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर ये संयंत्र तबाह हुए, तो दुबई और रियाद जैसे शहरों से पलायन शुरू हो सकता है। ट्रंप ने 22 मार्च 2026 को धमकी दी थी कि यदि 48 घंटे में हार्मुज़ जलडमरूमध्य नहीं खोला गया तो ईरान के बिजली घरों को 'मिटा दिया जाएगा' । इस पर ईरान का जवाब मुंहतोड़ था : "हे ट्रंप, यू आर फायर्ड। आप यह लाइन जानते हैं। आपके ध्यान के लिए धन्यवाद।" ईरान ने कहा कि बच्चों को मारने वाला अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान के बिजली घरों पर हमले की धमकी दे रहा है। अगर आप हमारी बिजली पर हमला करते हो, तो हम उन क्षेत्रीय देशों के बिजली घरों को निशाना बनाएंगे जो अमेरिकी ठिकानों को बिजली सप्लाई करते हैं, और उन आर्थिक, औद्योगिक, और ऊर्जा ढांचों को जिनमें अमेरिका की हिस्सेदारी है।


हर धमकी का उसी स्तर पर जवाब देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। अमेरिका हमारी क्षमताओं को नहीं जानता, लेकिन युद्ध के मैदान में देख लेगा। और फिर क्या हुआ? ईरान ने दीमोना (इज़राइल का परमाणु शहर) पर मिसाइल दागी। हालत यह है कि अब हर देश अपने-अपने ढंग से इस जलडमरूमध्य से गुजरने की कोशिश कर रहा है। भारत,चीन और जापान आदि कुछ देशों को ईरान ने सुरक्षित मार्ग का वादा किया है, जबकि अमेरिकी जहाजों पर खतरा बना हुआ है। और तो और, खबर ये भी है कि ईरान अब वहां से जहाजों को गुजरने देने के लिए प्रति जहाज 2 मिलियन डॉलर शुल्क वसूल करेगा। इस जलडमरूमध्य से रोजाना दुनिया के 20% तेल की आपूर्ति होती है । 25 दिनों में ईरान ने सैकड़ों व्यापारिक जहाजों को रोका या निरीक्षण के लिए रोक लिया। इनमें अमेरिकी, ब्रिटिश और सऊदी अरब समेत तमाम मुल्कों के जहाज हैं। खाड़ी के इस जलडमरूमध्य से रोज 138 जहाज गुजरते हैं। अभी वहां करीब 400 से ज्यादा जहाज खड़े हैं । जिनमें कच्चा तेल, गैस और यूरिया के साथ साथ अन्य जरूरी सामान लदा है। यह दुनिया की तेल आपूर्ति श्रृंखला पर सीधा हमला है। मैरीटाइम डेटा फर्म विंडवार्ड एआई के अनुसार, पिछले सात दिनों में जलडमरूमध्य से केवल 16 जहाज ही गुजर सके हैं।


24 मार्च 2026 तक अमेरिका ने 25 दिनों में ही 200 अरब डॉलर से अधिक खर्च कर डाले हैं। 13 अमेरिकी सैनिक मारे गए हैं, 200 से अधिक घायल हुए हैं । कम से कम 16 विमान नष्ट या क्षतिग्रस्त हुए हैं, जिनमें MQ-9 रीपर ड्रोन, F-15 लड़ाकू विमान और KC-135 टैंकर शामिल हैं। एक F-35 को आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी। नौसेना का प्रमुख विमानवाहक पोत यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड 12 मार्च को लॉन्ड्री रूम में लगी आग के बाद मरम्मत के लिए युद्ध क्षेत्र से बाहर कर दिया गया। मिसाइल और ड्रोन हमलों से 800 मिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है। पेंटागन के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, यह 2003 के इराक युद्ध के बाद अमेरिकी सेना का सबसे महंगा और सबसे निरर्थक अभियान बनता जा रहा है। अमेरिकी कांग्रेस में विरोध गरज रहा है। 18 मार्च 2026 को सीनेट ने 47-53 के वोट से ट्रंप प्रशासन की ईरान सैन्य कार्रवाई को रोकने वाले विधेयक को फिर से खारिज कर दिया । डेमोक्रेटिक सीनेटर कोरी बुकर ने कहा, "अमेरिका और ईरान का संघर्ष धीरे-धीरे नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है और इसका अमेरिकियों पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है"। डेमोक्रेटिक सीनेटर क्रिस मर्फी ने कहा, "यह युद्ध किसी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति पर नहीं, बल्कि एक राष्ट्रपति के व्यक्तिगत अपमान पर लड़ा जा रहा है।" रिपब्लिकन सीनेटर रैंड पॉल ने सीनेट में कहा, "हमारे सैनिक मर रहे हैं, हमारा पैसा जल रहा है, और कोई हमें बता नहीं सकता कि जीत कैसी दिखेगी।" डेमोक्रेटिक सांसद प्रमिला जयपाल ने कहा, "हम सुन रहे हैं कि पेंटागन इस युद्ध के लिए 200 अरब डॉलर की मांग कर रहा है। हम यह कैसे चुकाएंगे? यह बिल्कुल हास्यास्पद है" । न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपने संपादकीय में लिखा, "यह युद्ध वियतनाम के बाद अमेरिकी विदेश नीति का सबसे बड़ा आत्मघाती प्रहार है।"

इस युद्ध की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि अमेरिका और इज़राइल ने अपने सभी प्रयासों के बावजूद, एक भी देश को अपने साथ सक्रिय समर्थन के लिए नहीं पाया। यूके ने 'नैतिक समर्थन' से अधिक कुछ नहीं दिया। फ्रांस और जर्मनी ने खुलकर युद्ध की आलोचना की। सऊदी अरब और यूएई ने अपने आसमान से मिसाइलों को गिराने की अनुमति तो दी, पर युद्ध में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया। डेमोक्रेटिक सीनेटर कोरी बुकर ने स्वीकार किया कि युद्ध अब कम से कम 15 देशों को प्रभावित कर रहा है।और सबसे चौंकाने वाला था श्रीलंका का कदम। कोलंबो ने खुलकर ईरान के साथ खड़े होने का साहस दिखाया। श्रीलंकाई विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा कि उसकी सरकार "ईरान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता" दोहराती है। एक छोटा देश, जो अमेरिकी दबाव में होते हुए भी, सिद्धांतों के साथ खड़ा हुआ। भारत में इस पूरे संकट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 मार्च 2026 को कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की बैठक ली । उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिए कि "नागरिकों को इस संघर्ष के प्रभाव से बचाने के लिए हरसंभव प्रयास किए जाएं।" खाद्य सुरक्षा, उर्वरकों की उपलब्धता, और कोयले की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए। आयात स्रोतों का विविधीकरण और नए निर्यात गंतव्य विकसित किए जाने पर भी निर्देश जारी हुए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से भी बातचीत हुई पर मध्यस्थता करने जैसी कोई बात अभी तक सामने नहीं आयी है जबकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने वार्ता की मेज़बानी करने की पेशकश की है।‌


जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध छिड़ा, तो भारत चुप था। भारत ने 'रणनीतिक चुप्पी' का रास्ता चुना।            इस युद्ध की मार सिर्फ युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं है। युद्ध के चलते दुनियाभर में तेल के दाम बढ़ गए हैं। ब्रेंट क्रूड 105 डॉलर प्रति बैरल के पार, जो 50-55% की बढ़त है। यूरोप में गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं, EU ने अपने गैस भंडारण लक्ष्यों को घटाने की अपील की है। लेबनान में 1,021 से अधिक मौतें, 1,34,616 विस्थापित। यूएई में 28 फरवरी से अब तक 338 बैलिस्टिक मिसाइलें और 1,740 ड्रोनों को नष्ट किया है। थाईलैंड  में ईंधन संकट के कारण स्कूलों की उपस्थिति घटाकर सप्ताह में तीन दिन कर दी गई है। अतीत में अमेरिका ने वियतनाम में 20 साल तक लड़ाई लड़ी, 58,220 अमेरिकी सैनिक शहीद हुए, पर हार हुई। इस युद्ध की कुल लागत आयी 1.6 ट्रिलियन डॉलर। अफगानिस्तान में 20 साल में 2 ट्रिलियन डॉलर के खर्च और 2,400 अमेरिकी सैनिक मारे जाने के बाद, तालिबान वापस आ गया। हासिल क्या हुआ? इराक में 7 साल की लड़ाई, 4,415 अमेरिकी सैनिक मरे, 742 बिलियन डॉलर खर्च, आईएसआईएस का जन्म, और ईरान का प्रभाव बढ़ा। तीनों युद्धों में कुल 4.3 ट्रिलियन डॉलर से अधिक खर्च, 65,000 से अधिक अमेरिकी सैनिक शहीद, और 47 लाख से अधिक नागरिकों की मौत। हासिल कुछ नहीं।आज ईरान में वही कहानी दोहराई जा रही है। अंतर सिर्फ इतना है कि अब युद्ध का मैदान 'जल' और 'बिजली' तक फैल गया है।  जब अमेरिका 200 अरब डॉलर जला रहा है, रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने ईरान को संदेश भेजा: "मास्को एक वफादार दोस्त और भरोसेमंद साझेदार बना हुआ है।" चीन जिसने पहले ही सऊदी अरब और ईरान के बीच मध्यस्थता कर दिखायी था। आज वह चुपचाप अपना आर्थिक प्रभाव बढ़ा रहा है। जब अमेरिका युद्ध में उलझा है, ये दोनों शक्तियाँ 'प्ले' कर रही हैं। रूस को तेल बेचने में लगभग डबल का फायदा हो रहा है और चीन चुपके से ताइवान को पूरी तरह से अपने कब्जे में लाने में जुटा है।


आज के नेता खुद को ईश्वर समझते हैं। वे सोचते हैं कि सिर्फ बम गिराने से इतिहास बदल जाएगा। लेकिन इतिहास गवाह है कि बिना निकास योजना के युद्ध सिर्फ आत्मघाती होते हैं और आज अमेरिका खुद 'एग्जिट प्लान' मांग रहा है। पेंटागन के प्रवक्ता ने अनजाने में स्वीकार किया कि वे ईरान से बातचीत के लिए 'मध्यस्थों' की तलाश कर रहे हैं। यह वही अमेरिका है जिसने 28 फरवरी को कहा था कि 'बातचीत का समय समाप्त हो गया है'। यह युद्ध  यह उन सभी सैन्य दिग्गजों की सामूहिक विफलता है, जिन्होंने रणनीति को सिर्फ 'एयर स्ट्राइक' तक सीमित समझ लिया है। 25 दिन, 200 अरब डॉलर, हजारों मौतें, और आज खाड़ी देशों का पानी खतरे में है। ट्रंप को क्या मिला? एप्सटीन फाइल्स दब गईं, और ईरान ने उन्हें उनकी ही भाषा में 'यू आर फायर्ड' कहा। इज़राइल को क्या मिला? दीमोना पर मिसाइलें गिरीं, और उसके शहर खाली हो रहे हैं।  दुनिया युद्ध के लिए बुनियादी कारण, आवश्यकता और विकल्पहीनता के तथ्य मांग रही है। क्यों बातचीत के बीच युद्ध शुरू हुआ? क्यों नहीं संयुक्त राष्ट्र के मंच का इस्तेमाल हुआ? क्यों नहीं 5P, नाटो, और यूरोपीय देशों समेत विश्व बिरादरी को साथ लिया गया? अमेरिका क्यों अलग-अलग पड़ गया? आज इजराइल को लग रहा है कि अमेरिका उसको छोड़ कर चला न जाय। इसलिए वह युद्ध समाप्त करना नहीं चाहता। पर युद्ध लंबा खिंचा तो सबके लिए नुकसानदायक और विनाशकारी होगा।‌


दुनिया को स्पष्ट विचार और रणनीति चाहिए,युद्ध नहीं। विवेक चाहिए, बम नहीं। बुद्ध चाहिए, नादिर शाह नहीं। और सबसे बड़ा बल नैतिकता का है। आज नैतिकता और साख का ढांचा टूट गया है, उसको बनाने में सदियां लगेंगी। बात, जो बात से बिगड़ी है, वो बात से ही बनेगी।‌ पर बात में दम हो और बात पर कायम हों।‌  ओंकारेश्वर पांडेय



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