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Bhopal सदैव मंगलकारी प्रभु श्रीराम के परमभक्त पवनपुत्र हनुमान Hanuman, the son of wind, the supreme devotee of the ever auspicious Lord Shri Ram

 


Upgrade Jharkhand News. बजरंगबली पवन पुत्र हनुमान सदैव मंगलकारी एवं सभी प्रकार के विघ्न बाधाओं को समूल नष्ट करने वाले हैं। वे प्रभु श्रीराम के परमभक्त हैं और रामकाज के लिए हर पल  सदैव तत्पर रहने वाले हैं, उनके कार्य को अंजाम दिए बिना वे विश्राम ही नहीं कर सकते। श्री हनुमान जी परम वीर हैं। लंकादहन के समय स्वयं लंकाधिपति रावण हनुमान जी का रौद्र विकराल विग्रह को देखकर वितर्क करता है कि यह देवराज वज्रधर महेंद्र भले हो सकता है, साक्षात-यम, वरुण, पवन अथवा विश्व को भस्म करने में समर्थ भयंकर प्रलयाग्नि सूर्य, कुबेर या चन्द्र हो सकता है, किंतु निश्चय ही यह वानर नहीं साक्षात काल ही है। यही नहीं, इस विश्व में कोई भी ऐसा कठिन कार्य नहीं है, जिसे हनुमान जी न कर सकें। हनुमान जी राम के परम भक्त हैं। उन्होंने राम के परमधाम गमन के समय कथा श्रवण के लिए चिरंजीवी होने का वरदान मांगा था- यावद रामकथा वीर चरिष्यति मही तले। तावच्छरीरे वत्स्यन्तु प्राण मम न, संशय।। 'यशचैतरचरितं दिव्यं कथा के रघुनंदन तन्ममाप्सरसो राम श्रावये पुर्नरर्षभ।। भगवान श्रीराम ने भी हनुमानजी को हृदय से आशीर्वाद दिया-  चरिष्यति कथा यावदेषा लोके च मामिका। तावत ते भविता कीर्ति:।। अर्थात् हे कपिश्रेष्ठ। जब तक इस संसार में मेरी कथा प्रचलित रहेगी तब तक तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी और तुम सशरीर जीवित रहोगे। 


रामायण रूपी महामाला के अनुपम रत्न के रूप में भी श्री हनुमानजी को अंकित किया गया है- गोष्पदी कृत वारीशं मशकी कृत राक्षसम, रामायण महामाला रत्न वन्देऽनिलात्मजम।। समुद्र लांघते समय समस्त प्राणियों को हनुमानजी महान पर्वत के समान विशालकाय, स्वर्ण वर्ण सूर्य के समान मनोहर मुखवाले और महान सर्पराज के समान सुदीर्घ भुजाओं वाले दिखाई देने लगे।  समुद्रलंघन के समय जामबंत ने वानर सेना के श्रेष्ठ श्री हनुमान जी से कहा- 'वानर जगत के गौरव तथा सम्पूर्ण ज्ञात वेत्ताओं में श्रेष्ठ हनुमान तुम एकांत में चुपचाप क्यों बैठे हो? कुछ बोलचाल क्यों नहीं करते। तुम तो वानरराज सुग्रीव के समान पराक्रमी तथा बल में श्रीराम और लक्ष्मण के तुल्य हो। कश्यपजी के महाबली पुत्र और समस्त पक्षियों में श्रेष्ठ विनतानंद गरुड़ के समान तुम भी सुख्यात शक्तिशाली और तीव्रग्रामी हो। वानर शिरोमणि! तुम्हारा बल, बुद्धि, तेज और धैर्य भी समस्त प्राणियों में सबसे बढ़कर है। फिर भी तुम स्वयं ही समुद्र लंघन के लिए तैयार क्यों नहीं होते?


कुछ लोककथाओं से ज्ञात होता है कि हनुमानजी छह भाई थे, जिनमें सबसे बड़े हनुमान थे जो अविवाहित ब्रह्मचारी थे, जबकि बाकी पांचों का विवाह हुआ था। 1. केसरीनन्दन हनुमान, 2. मतिमान, 3. श्रुतिमान, 4 केतुमान, 5. गतिमान, 6. धृतिमान। वानरराज केसरी ने  अंजनी को पत्नी के रूप में अंगीकृत किया। अंजनी परम रूपवती थी। गर्भाधान के अनन्तर प्रसवन संस्कार सम्पन्न हुआ और उनके गर्भ से हनुमान का जन्म हुआ। इसके  अतिरिक्त अंजनी के अन्य पुत्र भी स्वर्ग लोक तथा भूलोक में विख्यात थे। ये पांचों भाई पुत्रों और पौत्रों से सम्पन्न थे। महाकवि गिरधर कृत 'गुजराती रामायण' में वर्णन है कि अंजनी की तपस्या से प्रसन्न होकर रुद्र ने उन्हें वर मांगने को कहा, तब अंजनी ने उनसे तेजस्वी पुत्र की कामना की। भगवान रुद्रदेव शिवशंकर ने प्रसन्न होकर कहा, तुम धन्य हो, तुम्हारे उदर से ग्यारहें रुद्र प्रकट होंगे। कालांतर में यही ग्यारहवें रुद्र हनुमानजी के नाम से प्रसिद्ध हुए।  अंजनी सक्सेना



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