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Bhopal राजाओं को राजनीति सिखाने के लिए अवतरित हुए थे प्रभु श्रीराम Lord Shri Ram was incarnated to teach politics to the kings.

 


Upgrade Jharkhand News. दुनिया में ईश्वर के बहुत से अवतार हुए, वैष्णव परम्परा में अभी तक तेईस अवतार हो चुके हैं लेकिन सिर्फ श्रीराम को ही राजा राम कहा गया और आज भी उन्हें एक आदर्श राजा माना जाता है और किसी भी अच्छी राज व्यवस्था को "रामराज"कहा जाता है। असल में श्रीराम का  अवतार ही राजाओं को राजनीति सिखाने के लिए हुआ था । एक आदर्श राजा कैसा होता है या राजा कैसा होना चाहिए यह श्री राम ने ही बताया अपने विचारों से भी और जीवन से भी। श्री राम ने अपने जीवन काल में आम इंसान के अपराध को भले ही क्षमा कर भी दिया हो लेकिन उन्होंने राजाओं के अपराध को कभी क्षमा नहीं किया। वे राजा और राजपरिवार के महत्व को बहुत अच्छे से जानते थे इसलिए राजा और राजपरिवार को मर्यादा और गरिमा बनाए रखने की शिक्षा देते रहे। इस क्रम में वे स्वयं अपनी पत्नी और लक्ष्मण जैसे भाई का त्याग करने से भी नहीं चूके। वे जानते थे यदि राजा और राजपरिवार नियम से नहीं चलेगा तो प्रजा भी अनुशासित नहीं रह सकेगी। इसीलिए निष्पाप होने के बाद भी उन्होंने सीता जी का त्याग किया ताकि प्रजा में स्त्रियां दूषित न हो जाएँ ,एक सबसे कमजोर और निचले तबके के अकेले व्यक्ति द्वारा जताए अविश्वास को भी उन्होंने इतनी गंभीरता से लिया जितना आज सारी जनता के आरोप को भी  नेता लोग गंभीरता से नहीं लेते और भ्रष्ट होने के बाद भी अपने मंत्री या पार्टी पदाधिकारियों को पद से नहीं हटाते। आम तौर पर सीता जी के त्याग की आलोचना बहुत होती है लेकिन श्री राम के लिए प्रजा का विश्वास ज्यादा महत्वपूर्ण था, उनका मानना था कि प्रजा में एक व्यक्ति भी यदि राजा से असंतुष्ट है तो राजा को राजा के पद पर रहने का अधिकार नहीं है,इसीलिए जब उन्हें गुप्तचर सूचना देते हैं कि प्रजा सीता माता को वापस लाने पर सहमत हो गई है अतः आप उनको वापस बुला लें  तब श्रीराम एक सवाल गुप्तचर से पूछते हैं कि सारी प्रजा सहमत है? तब गुप्तचर कहता है कि सिर्फ तीन चार व्यक्ति सहमत नहीं हैं तब श्रीराम कहते हैं कि "यदि एक भी व्यक्ति  असहमत है तो भी  इसको प्रजा का समर्थन नहीं माना जा सकता,जब तक अंतिम व्यक्ति की सहमति नहीं मिल जाती तब तक महारानी  सीता को वन में ही रहना होगा। "


इतना कठोर आदर्श किसी राजा ने कभी पालन नहीं किया लेकिन श्रीराम का काम ही राजाओं को शिक्षा देना था। श्रीराम के जीवन से पता चलता है कि प्रजा को सिर्फ दंड देकर अनुशासित करने से बेहतर है कि राजा खुद उच्च आदर्श स्थापित करें  तब प्रजा ज्यादा प्रभावित होती है। चित्रकूट में भरत जी जब श्रीराम से वापस चलने का आग्रह करते हैं तब उनसे भी श्रीराम कहते हैं कि "तुम एक राजा होकर ऐसा सोच भी कैसे सकते हो ? यदि पिता के वचन का पालन हम ही नहीं करेंगे तो फिर हमारी प्रजा पर क्या असर पड़ेगा। चित्रकूट में ही श्रीराम भरत जी से पूछते हैं कि तुम्हारे राज्य में प्रजा संतुष्ट तो है न ? और पड़ोसी राज्यों के राजा तुमसे भयभीत रहते हैं न ? और तुम्हारे कर्मचारियों को वेतन नियमित रूप से दिया जाता है न ? उनका मत है कि राजा का प्रथम कर्तव्य है प्रजा को हर तरह से संतुष्ट रखे ताकि प्रजा विद्रोह न करे। दूसरा कर्तव्य है कि पड़ोसी राजा भयभीत रहे ताकि अनावश्यक हमला नहीं करे और कर्मचारियों को नियमित वेतन मिलता रहे ताकि वे भ्रष्टाचार और बेईमानी न करें। बालि वध के समय भी जब घायल बालि श्रीराम से कहता है कि मेरी आपसे कोई लड़ाई नहीं फिर आपने मुझे कैसे मार दिया? तब श्रीराम का जवाब है कि "यह हमारा  ही राज्य है भरत हमारे राजा हैं इसलिए मुझे पापी को दंड देने का पूरा अधिकार है , तुमने एक राजा होकर भी अपने भाई के साथ अन्याय किया है, उसकी पत्नी के साथ अनाचार किया है इसलिए तुम्हें राज पद पर रहने का कोई अधिकार नहीं है।"


राजा राम के जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यही रही कि राजा होकर कभी भी नीति विरुद्ध बात नहीं की और ना ही किसी अन्य राजा को करने दी। उन्होंने आक्रमण भी सिर्फ उन्हीं राज्यों पर किया जहां की जनता ने  अपने राजा की शिकायत श्रीराम से पास आकर की फिर चाहे किष्किंधा हो, मथुरा हो या गंधर्व देश हो ,यहां के राजा नीति विरुद्ध आचरण कर रहे थे, जनता पीड़ित थी इसलिए श्रीराम ने इन राज्यों के राजाओं को हटाकर सुग्रीव, शत्रुघ्न और भरत को राजा बनाया और सारे देश में एक संविधान लागू किया.  असल में महाराज दशरथ ने जब चारों पुत्रों में कार्य विभाजन किया था तब उन्होंने भरत को वित्त विभाग, लक्ष्मण को रक्षा, शत्रुघ्न को कृषि और वाणिज्य विभाग सौंपे थे और श्रीराम को सबसे महत्पूर्ण कानून व्यवस्था का जिम्मा दिया था इसीलिए श्रीराम का जनता से सीधा संवाद था और वे कानून का बहुत सख्ती और ईमानदारी से पालन करते थे और करवाते थे। इस कारण वे जनता में बहुत लोकप्रिय हो गए। उन्होंने जनता की समस्याओं को बहुत करीब से देखा था इसलिए उन्होंने ऐसे नियम बनाए जो जन हितैषी हों फिर उसके लिए राजाओं को चाहे कितना भी कष्ट उठाना पड़े। श्रीराम ने जो नियम बनाए आगे चलकर समस्त दुनिया के संविधान उसी आधार पर बने और वही नियम आज तक कायम हैं। आज भी दुनिया में जो कर प्रणाली है वो श्रीराम की ही देन है, कृषि व्यवस्था और कानून व्यवस्था के नियम श्रीराम द्वारा ही निर्धारित किए थे जिन्हें उनके बाद भी सभी राजाओं ने अपनाया और पीढ़ी दर पीढ़ी वही नियम थोड़े ऊपर नीचे होकर लागू होते रहे। अपराधियों के साथ बहुत सख्ती से पेश आने के नियम सबसे पहले राजा राम ने ही निर्धारित किए जिनका असर आज भी मध्य एशिया के अनेक देशों में दिखाई देता है।    


भारत में भी सल्तनत काल से पहले मनु स्मृति के नियम ही चलते थे लेकिन बाद में खिलजी,मुगल और ब्रिटिश ने अपने नियम थोपे और आजादी के बाद भी हमारा संविधान दूसरे देशों से लिया गया । बहरहाल दुनिया और भारत के संविधानों में कितना भी बदलाव हुआ हो लेकिन  उन पर राजा राम का प्रभाव कहीं ना कहीं तो रहेगा कि क्योंकि श्रीराम शाश्वत राजा हैं जैसे शेर एक नैसर्गिक राजा होता है उसी तरह श्रीराम ईश्वर के राजावतार हैं तभी उनको सारी दुनिया राजा राम कहती है l रघुपति राघव राजा राम...मुकेश "कबीर



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