Guwa (Sandeep Gupta) गुवा क्षेत्र के झारखंड खान समूह की खदानों में बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली लागू किए जाने को लेकर चल रहे मामले में CGIT कोर्ट में सुनवाई के बाद कई सवाल खड़े हो गए हैं। 13 मार्च को हुई सुनवाई के दौरान सेल प्रबंधन की ओर से न तो कोई अधिकारी उपस्थित हुआ और न ही उनका अधिवक्ता कोर्ट में मौजूद था। वहीं झारखंड मज़दूर संघर्ष संघ किरीबुरू के प्रतिनिधियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। जानकारी के अनुसार सेल प्रबंधन ने अपने लिखित प्रतिउत्तर (Rejoinder) में कहा है कि बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली को NJCS के समझौते के तहत लागू किया जा रहा है। इस पर यूनियन ने आपत्ति जताते हुए कहा कि कोई भी समझौता स्टैंडिंग ऑर्डर को ओवरराइड नहीं कर सकता। स्टैंडिंग ऑर्डर एक वैधानिक प्रावधान है, जो औद्योगिक रोजगार स्थायी आदेश के नियम के तहत उन उद्योगों में लागू होता है, जहां 100 से अधिक कामगार कार्यरत होते हैं। यूनियन का कहना है कि किसी भी उद्योग में नई प्रणाली लागू करने के लिए प्रमाणन अधिकारी से प्रमाणन प्राप्त करना आवश्यक होता है।
साथ ही स्थायी आदेश में नियम बनाने का अधिकार केवल उपयुक्त सरकार को है। इसलिए बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली को नियम बनाकर लागू करने की मांग जायज है और NJCS को स्टैंडिंग ऑर्डर में परिवर्तन करने का अधिकार नहीं है। सेल प्रबंधन ने अपने जवाब में यह भी कहा है कि कंपनी के सभी संयंत्रों और ओडिशा की खदानों में बायोमेट्रिक प्रणाली लागू कर दी गई है। इस पर यूनियन ने सवाल उठाते हुए कहा कि यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यह किस नियम के तहत लागू किया गया और क्या इसके लिए प्रमाणन अधिकारी से अनुमति ली गई है। यूनियन ने मांग की है कि यदि इसे नियमानुसार लागू किया गया है तो उसका प्रमाण पत्र कोर्ट में प्रस्तुत किया जाए, क्योंकि कोर्ट केवल लिखित बयान नहीं बल्कि साक्ष्य दस्तावेज भी मांगता है। झारखंड मज़दूर संघर्ष संघ के केंद्रीय अध्यक्ष रामा पांडे एवं अन्य यूनियन प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि सेल प्रबंधन बायोमेट्रिक प्रणाली के माध्यम से श्रम कानूनों को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है। उनका कहना है कि इससे कामगारों को आर्थिक नुकसान हो सकता है।
यूनियन के अधिवक्ता इस संबंध में अपना जवाब कोर्ट में दाखिल कर रहे हैं। यूनियन ने यह भी कहा कि बायोमेट्रिक उपस्थिति एक मशीन आधारित प्रणाली है, जो मैनुअल प्रक्रिया को बदलती है, इसलिए इसे लागू करने से पहले नियमों में संशोधन आवश्यक है। साथ ही यूनियन ने कई सवाल उठाए हैं, जैसे कि यदि यह समझौते का हिस्सा था तो इसे लागू करने में 12 साल क्यों लग गए, जबकि समझौते की अवधि पांच वर्ष थी। यूनियन का कहना है कि उसने अपनी ओर से पूरी तैयारी कर ली है और अब प्रबंधन को यह साबित करना होगा कि बिना आवश्यक संशोधन के बायोमेट्रिक प्रणाली को किस आधार पर लागू किया गया है।


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