Upgrade Jharkhand News. भारत के छात्र आंदोलनों और संगठनात्मक जीवन में कुछ ऐसे नाम हैं, जिन्होंने स्वयं प्रकाश में आए बिना ही एक पीढ़ी को दिशा दी। ऐसे ही व्यक्तित्व थे, जिन्होंने अपने विचार, अनुशासन और संगठन क्षमता से छात्र शक्ति को राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। 25 अप्रैल 1925 को में जन्मे केलकर जी का जीवन एक साधारण पृष्ठभूमि से असाधारण योगदान तक की प्रेरक यात्रा है।केलकर जी के पिता शिक्षा विभाग में कार्यरत थे और परंपरागत विचारों के थे, जबकि उनकी माता जानकीबाई प्रगतिशील सोच रखती थीं। जातिगत भेदभाव के विरुद्ध उनकी स्पष्ट दृष्टि का गहरा प्रभाव बालक यशवंत के मन पर पड़ा। यही कारण था कि आगे चलकर उनके व्यक्तित्व में सामाजिक समरसता और व्यापक दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
शिक्षा के क्षेत्र में केलकर जी प्रारंभ से ही मेधावी थे। उन्होंने हमेशा प्रथम श्रेणी में सफलता प्राप्त की और मराठी व अंग्रेजी साहित्य में विशेष रुचि रखी। में अध्ययन के दौरान वे के संपर्क में आए और स्वयंसेवक बने। संघ की शाखा में सक्रिय भागीदारी ने उनके व्यक्तित्व को अनुशासन, नेतृत्व और संगठनात्मक कौशल से समृद्ध किया।1942 के के बाद देश में क्रांतिकारी विचारधारा का प्रभाव बढ़ा। इस दौर में केलकर जी भी इससे प्रभावित हुए। उन्होंने जैसे क्रांतिकारियों के जीवन का अध्ययन किया और युवाओं के बीच वैचारिक जागरण का प्रयास किया। हालांकि आगे चलकर उन्होंने हिंसात्मक मार्ग को छोड़कर संगठन और वैचारिक निर्माण के रास्ते को अपनाया।
संघ के प्रचारक के रूप में उन्होंने 1944-45 में कार्य प्रारंभ किया और विभिन्न क्षेत्रों में संगठन को मजबूत किया। 1952 में वे सोलापुर के जिला प्रचारक बने। इसके बाद उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी करने का निर्णय लिया और अंग्रेजी में एम.ए. कर प्रथम स्थान प्राप्त किया। यह उनके जीवन का वह चरण था, जहां उन्होंने शिक्षा और संगठन दोनों को समान महत्व दिया।शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्हें मुंबई के में प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति मिली और बाद में में लंबे समय तक अध्यापन किया। 1985 तक वे विद्यार्थियों के बीच एक प्रेरणास्रोत शिक्षक के रूप में सक्रिय रहे। 1958 में उन्होंने शशिकला जी के साथ विवाह किया और पारिवारिक जीवन का भी सफलतापूर्वक निर्वहन किया।
केलकर जी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान के निर्माण और विस्तार में रहा। परिषद का गठन भले ही 1947-48 में हुआ था, लेकिन 1958 के बाद केलकर जी के मार्गदर्शन में इसे नई दिशा और ऊर्जा मिली। उन्होंने परिषद को केवल एक छात्र संगठन नहीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन के रूप में विकसित किया। प्रांतीय और राष्ट्रीय अधिवेशनों की परंपरा शुरू कर उन्होंने संगठन को देशव्यापी स्वरूप प्रदान किया।1967 में वे परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने, लेकिन उनका स्वभाव पद और प्रसिद्धि से दूर रहने वाला था। एक वर्ष के भीतर ही उन्होंने यह पद छोड़ दिया और संगठन निर्माण के कार्य में पुनः जुट गए। उन्होंने कार्यकर्ताओं की नई पीढ़ी तैयार की और संगठन को स्थायी आधार प्रदान किया। उनके नेतृत्व की विशेषता यह थी कि वे स्वयं पीछे रहकर दूसरों को आगे बढ़ने का अवसर देते थे।
1975 का भारतीय लोकतंत्र के लिए एक कठिन परीक्षा का समय था। इस दौरान कई संगठनों पर प्रतिबंध लगा, हालांकि विद्यार्थी परिषद पर औपचारिक प्रतिबंध नहीं था। फिर भी लोकतंत्र की रक्षा के लिए परिषद के कार्यकर्ताओं ने सक्रिय भूमिका निभाई। केलकर जी को भी मीसा के तहत जेल में बंद किया गया। जेल में भी उन्होंने निराशा के बजाय सकारात्मक वातावरण बनाया और उसे एक प्रशिक्षण केंद्र की तरह संचालित किया। यह उनके अदम्य साहस और नेतृत्व क्षमता का परिचायक है। आपातकाल के बाद उन्होंने पुनः पूरे मनोयोग से परिषद के कार्य में स्वयं को समर्पित कर दिया। 1984 में उनकी 60वीं वर्षगांठ देशभर में मनाई गई, हालांकि वे व्यक्तिगत सम्मान से दूर रहना ही पसंद करते थे। अपने भाषणों में वे हमेशा राष्ट्र, संगठन और सांस्कृतिक मूल्यों की बात करते थे।
जीवन के अंतिम वर्षों में वे गंभीर बीमारियों से ग्रसित हो गए। पीलिया और जलोदर जैसी समस्याओं ने उनके स्वास्थ्य को कमजोर कर दिया। इसके बावजूद उनका मन संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच ही लगा रहा। 6 दिसंबर 1988 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनके द्वारा स्थापित विचार और संगठन आज भी जीवंत हैं।यशवंत वासुदेव केलकर का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व पद या प्रसिद्धि में नहीं, बल्कि समर्पण, विचार और संगठन निर्माण में निहित होता है। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि यदि उद्देश्य स्पष्ट हो और निष्ठा अटूट, तो सीमित संसाधनों में भी व्यापक परिवर्तन संभव है। आज के युवाओं के लिए उनका जीवन एक प्रेरणा है—एक ऐसा उदाहरण, जो बताता है कि राष्ट्र निर्माण में छात्र शक्ति की क्या भूमिका हो सकती है।

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