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Bhopal व्यंग्य -संयम का ज्ञान और खर्च के गणित का गड़बड़झाला Satire: The wisdom of restraint and the mess of spending math

 Upgrade Jharkhand News. सरकार ने आग्रह किया कि विदेश जाकर ज्यादा खर्च न करें, वहाँ से सोना नहीं खरीदें। इस बात का सबसे ज्यादा विरोध वो लोग कर रहे हैं जिन्होंने विदेश से कभी सुई भी नहीं खरीदी और जो कभी विदेश गए ही नहीं। विदेश जाने की तो छोड़िए, जो दूसरे मोहल्ले जाने के लिए पड़ोसी की गाड़ी का इंतजार करते हैं, उन्हें गुस्सा है कि सरकार निजी वाहन का उपयोग कम करने की सलाह दे रही है। और तो और, जिन्होंने गणित के डर से पढ़ाई छोड़ दी थी, वो आज अर्थशास्त्री बनकर ज्ञान बाँट रहे हैं।


खैर, यह तो आम आदमी है। इनकी क्या खुशी और क्या नाराजगी! अभी तीन-चार साल सरकार से नाराज रहेंगे, लेकिन चुनाव में फ्री राशन की घोषणा होते ही खुश हो जाएँगे। यह खेल सालों से चल रहा है और सालों तक चलता रहेगा। सरकार भी पतंगबाजी करना जानती है। कब ढील देनी है, कब डोर खींचनी है, उन्हें अच्छे से पता है। और किसे खींचना है, किसे ढील देनी है, यह भी पता है। इसीलिए तो आम आदमी से पेट्रोल बचाने की बात कह दी, और अगले ही दिन मंत्री और मुख्यमंत्री के शपथ समारोह में खास लोग गाड़ियों का काफिला लेकर पहुँच गए। शायद खास लोगों की गाड़ी पेट्रोल से नहीं चलती होगी। आखिर खास लोगों की गाड़ी है, खास ही होगी। उनका क्या है, पेट्रोल नहीं भी होगा तो धक्का लगाने के लिए आम कार्यकर्ता हैं न!


आम और खास का रिश्ता ही ऐसा है  एक-दूसरे को धक्का लगाकर बढ़ते-बढ़ाते रहते हैं। इसी धक्का-मुक्की में ही सरकारें चल जाती हैं। चुनाव में फ्री राशन देकर खास आदमी थोड़ा धक्का देते हैं, और वोट देकर आम आदमी धक्का दे देता है। बस, हो गया काम। अब बाकी काम पाँच साल बाद... लेकिन एक बात समझ नहीं आती कि जब सरकारी खज़ाने वाकई में इतने खाली हैं तो चुनाव में फ्री बाँटने के लिए अरबों रुपये कहाँ से आ जाते हैं इनके पास? हमारे चुनाव में इतना पैसा बहाया जाता है कि पाकिस्तान जैसे देशों का वार्षिक बजट आराम से बन सकता है। अरे हाँ, पाकिस्तान से याद आया कि यह भी तो बहुत बड़ा धक्का लगाता है हमारी सरकारों को। हमारा इतिहास है कि जब-जब भी हमारी इकोनॉमी गिरी है, हमने तुरन्त पाकिस्तान का हवाला देकर जनता को शांत किया है  ‘तुम सोने के लिए रो रहे हो, पाकिस्तान में तो आटा भी नहीं मिल रहा। तुम तो छप्पन भोग लगा रहे हो, पाकिस्तान में तो टमाटर भी तीन सौ रुपये किलो है। वहाँ के लोगों को खाने के लाले पड़े हैं, वो देश तो खत्म होने वाला है।’ लेकिन असल बात यह है कि इतनी खराब हालत के बाद भी पाकिस्तान चल रहा है, कोई भूख से नहीं मर रहा। वरना इतने सालों से उसकी जो हालत बताई जा रही है, उसमें तो अभी तक पाकिस्तान को खाक हो जाना था।


लेकिन अभी बात खाने की नहीं, सोने की चल रही है। इसलिए हमने तो सोना बहुत कम कर दिया है। पहले दस-बारह घंटे सोते थे, लेकिन अब सिर्फ ग्यारह घंटे में काम चलाते हैं। और विदेश का कोई चक्कर नहीं तो अपने देश में ही सो लेते हैं। आखिर सोने के लिए विदेश क्यों जाना? बात आई न समझ में? आखिर समझ में आएगी क्यों नहीं! जब कोई इतने वैज्ञानिक तरीके से समझाएगा तो जरूर समझ आएगी। लेकिन सरकार को सिर्फ आदेश देना आता है, समझाना नहीं। इसीलिए उनका विरोध भी होता है। लेकिन हमारा विरोध कोई नहीं करता। बीबी भी हमारा विरोध नहीं करती, फिर कोई और क्या करेगा?  आपको लग रहा होगा कि हम ज्यादा ऊँची फेंक रहे हैं, लेकिन इस बात की पुष्टि के लिए हमारे घर आकर देख सकते हैं। लेकिन याद रखिए यदि आना है तो खुद की गाड़ी मत लाना, मेट्रो से आना और उसमें फोटो जरूर खिंचवा लेना। आजकल यही सिस्टम है, तभी लोगों को प्रेरणा मिलती है। इसलिए एक-दूसरे को प्रेरित करते रहें. मुकेश "कबीर"



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