Upgrade Jharkhand News. भारत के सैन्य इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो केवल व्यक्तित्व नहीं बल्कि एक युग का प्रतिनिधित्व करते हैं। फील्ड मार्शल के. एम. करिअप्पा ऐसा ही एक महान नाम है, जिन्होंने स्वतंत्र भारत की सेना को नई पहचान, नई दिशा और अद्वितीय गौरव प्रदान किया। भारतीय सेना के प्रथम भारतीय कमांडर-इन-चीफ के रूप में उन्होंने न केवल सेना का नेतृत्व किया, बल्कि राष्ट्रभक्ति, अनुशासन, साहस और कर्तव्यनिष्ठा की ऐसी मिसाल प्रस्तुत की, जो आज भी भारतीय सैनिकों और नागरिकों के लिए प्रेरणास्रोत बनी हुई है। उनकी पुण्यतिथि केवल एक महान सैनिक को स्मरण करने का अवसर नहीं, बल्कि उस आदर्श जीवन को याद करने का दिन है, जिसने राष्ट्रसेवा को अपना सर्वोच्च धर्म माना।फील्ड मार्शल करिअप्पा का जन्म 28 जनवरी 1899 को कर्नाटक के कोडागु (कूर्ग) में हुआ था। उनका पूरा नाम कोडंदेरा मडप्पा करिअप्पा था। बचपन से ही उनमें अनुशासन, नेतृत्व और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना दिखाई देती थी। प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने सेना में जाने का निर्णय लिया।
उस समय भारतीयों के लिए सेना के उच्च पदों तक पहुँचना आसान नहीं था, क्योंकि ब्रिटिश शासन में सेना का नेतृत्व प्रायः अंग्रेज अधिकारियों के हाथों में ही रहता था।करिअप्पा उन चुनिंदा भारतीय युवाओं में थे, जिन्हें ब्रिटिश भारतीय सेना में अधिकारी बनने का अवसर मिला। वर्ष 1919 में उन्हें सेना में कमीशन प्राप्त हुआ। यह वह समय था, जब भारतीयों को नेतृत्व क्षमता में कमतर समझा जाता था। लेकिन करिअप्पा ने अपनी प्रतिभा, मेहनत और अद्वितीय सैन्य कौशल से इन धारणाओं को गलत सिद्ध कर दिया।15 जनवरी 1949 भारतीय सैन्य इतिहास का एक स्वर्णिम दिन माना जाता है। इसी दिन करिअप्पा ने भारतीय सेना के प्रथम भारतीय कमांडर-इन-चीफ के रूप में पदभार संभाला। इससे पहले सेना के सर्वोच्च पद पर अंग्रेज अधिकारी ही नियुक्त होते थे। करिअप्पा की नियुक्ति केवल एक प्रशासनिक परिवर्तन नहीं थी, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक थी।
उन्होंने सेना को केवल युद्ध की शक्ति के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे राष्ट्र की एकता और सुरक्षा का आधार माना। उनके नेतृत्व में भारतीय सेना ने पेशेवर क्षमता, अनुशासन और राष्ट्रीय चरित्र की नई ऊँचाइयाँ प्राप्त कीं। सेना में जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के आधार पर भेदभाव के स्थान पर राष्ट्रीय एकता और भारतीयता की भावना को सर्वोपरि रखा गया।स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद भारत को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। पाकिस्तान द्वारा जम्मू-कश्मीर में कबायली आक्रमण और युद्ध की स्थिति ने नवस्वतंत्र भारत की सुरक्षा को गंभीर चुनौती दी। ऐसे कठिन समय में करिअप्पा ने भारतीय सेना का प्रभावशाली नेतृत्व किया।उन्होंने युद्ध संचालन में असाधारण रणनीतिक क्षमता का परिचय दिया। भारतीय सैनिकों के मनोबल को ऊँचा बनाए रखना, सीमित संसाधनों में प्रभावी सैन्य कार्रवाई करना और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना उनकी नेतृत्व क्षमता की विशेषता थी। उनके निर्देशन में भारतीय सेना ने साहस और वीरता का परिचय देते हुए दुश्मन की योजनाओं को विफल किया। वही दौर था, जब भारतीय सेना ने विश्व को यह संदेश दिया कि भारत अपनी संप्रभुता और अखंडता की रक्षा के लिए पूरी तरह सक्षम है। करिअप्पा ने सैनिकों में यह विश्वास जगाया कि वे केवल एक सेना के सदस्य नहीं, बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा के प्रहरी हैं।
फील्ड मार्शल करिअप्पा अनुशासन के प्रति अत्यंत कठोर और स्पष्ट विचार रखने वाले व्यक्ति थे। उनका मानना था कि किसी भी सेना की वास्तविक शक्ति उसके हथियारों से अधिक उसके अनुशासन, मनोबल और चरित्र में होती है। वे सैनिकों को केवल युद्धक प्रशिक्षण ही नहीं देते थे, बल्कि उन्हें नैतिकता, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रप्रेम का पाठ भी पढ़ाते थे।उनकी कार्यशैली अत्यंत सादगीपूर्ण थी। वे सैनिकों के बीच रहना पसंद करते थे और उनकी समस्याओं को समझने का प्रयास करते थे। यही कारण था कि सैनिक उन्हें केवल एक अधिकारी नहीं, बल्कि एक प्रेरणादायक संरक्षक के रूप में देखते थे।उनकी राष्ट्रभक्ति का सबसे चर्चित उदाहरण 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान देखने को मिला। उस समय उनका पुत्र भारतीय वायुसेना में पायलट था और पाकिस्तान के कब्जे में चला गया था। पाकिस्तान के तत्कालीन शासक अयूब खान, जो कभी करिअप्पा के अधीन कार्य कर चुके थे, ने उनके पुत्र को विशेष सुविधा देने की पेशकश की। लेकिन करिअप्पा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनका पुत्र भी अन्य भारतीय युद्धबंदियों की तरह ही है और उसके साथ किसी प्रकार का विशेष व्यवहार नहीं होना चाहिए। यह घटना उनके निष्पक्ष चरित्र और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की भावना का अद्भुत उदाहरण है।
करिअप्पा ने भारतीय सेना को आधुनिक और पेशेवर स्वरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता के बाद सेना के पुनर्गठन की आवश्यकता थी। विभाजन के कारण संसाधनों और सैन्य संरचना पर प्रभाव पड़ा था। ऐसे समय में उन्होंने सेना को संगठित, सुदृढ़ और आत्मनिर्भर बनाने के लिए अनेक कदम उठाए।उन्होंने प्रशिक्षण व्यवस्था को मजबूत किया, नेतृत्व क्षमता को विकसित करने पर बल दिया और सेना में भारतीय अधिकारियों की भूमिका बढ़ाने का कार्य किया। उनका मानना था कि सेना का चरित्र राष्ट्रीय होना चाहिए और उसमें राजनीतिक हस्तक्षेप से बचना चाहिए। उन्होंने भारतीय सेना को लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप एक पेशेवर संस्था के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।भारत सरकार ने वर्ष 1986 में उन्हें “फील्ड मार्शल” की मानद उपाधि प्रदान की। यह भारतीय सेना का सर्वोच्च सम्मान है। इससे पहले केवल सैम मानेकशॉ को यह सम्मान प्राप्त हुआ था। करिअप्पा को यह सम्मान उनके दीर्घकालीन योगदान, सैन्य नेतृत्व और राष्ट्रसेवा के लिए दिया गया। फील्ड मार्शल की उपाधि केवल एक सैन्य सम्मान नहीं, बल्कि राष्ट्र की ओर से उनके प्रति कृतज्ञता का प्रतीक थी। यह उस व्यक्ति का सम्मान था, जिसने अपना सम्पूर्ण जीवन देश की सुरक्षा और सेना के गौरव को समर्पित कर दिया।
आज जब देश का युवा वर्ग अनेक चुनौतियों और अवसरों के बीच अपने भविष्य की दिशा तय कर रहा है, तब करिअप्पा का जीवन उन्हें राष्ट्रसेवा, ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता की प्रेरणा देता है। उन्होंने सिद्ध किया कि महानता केवल पद या शक्ति से नहीं आती, बल्कि चरित्र, अनुशासन और समर्पण से प्राप्त होती है।उनका जीवन हमें यह भी सिखाता है कि राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए। व्यक्तिगत लाभ, क्षेत्रीयता, जातीयता या अन्य संकीर्ण भावनाओं से ऊपर उठकर देश के लिए कार्य करना ही सच्ची देशभक्ति है। आज भारतीय सेना जिस गौरव, सम्मान और विश्वसनीयता के साथ विश्व मंच पर खड़ी है, उसमें करिअप्पा जैसे महान सैन्य नेताओं की दूरदृष्टि और त्याग का महत्वपूर्ण योगदान।
15 मई 1993 को फील्ड मार्शल करिअप्पा का निधन हुआ, लेकिन उनका व्यक्तित्व आज भी भारतीय सैन्य परंपरा में जीवित है। भारतीय सेना में “करिअप्पा दिवस” और विभिन्न सैन्य संस्थानों में उनके आदर्शों का स्मरण किया जाता है। देशभर में उन्हें एक ऐसे सैनिक के रूप में याद किया जाता है, जिसने भारतीय सेना को राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बनाया। उनकी पुण्यतिथि हमें यह अवसर देती है कि हम केवल उन्हें श्रद्धांजलि ही न दें, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प भी लें। आज जब विश्व अनेक प्रकार की चुनौतियों और संघर्षों से गुजर रहा है, तब करिअप्पा का अनुशासन, राष्ट्रनिष्ठा और कर्तव्यपरायणता का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
फील्ड मार्शल के. एम. करिअप्पा भारतीय सैन्य इतिहास के ऐसे महानायक थे, जिन्होंने स्वतंत्र भारत की सेना को आत्मविश्वास, गौरव और राष्ट्रीय चरित्र प्रदान किया। वे केवल एक सैनिक नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माता थे। उनका जीवन त्याग, साहस, अनुशासन और देशभक्ति का जीवंत उदाहरण है। उनकी पुण्यतिथि पर समस्त राष्ट्र उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करता है। आने वाली पीढ़ियाँ उनके आदर्शों से प्रेरणा लेती रहेंगी और भारतीय सेना के गौरवशाली इतिहास में उनका नाम सदैव स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा।

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