Default Image

Months format

Show More Text

Load More

Related Posts Widget

Article Navigation

Contact Us Form

Terhubung

NewsLite - Magazine & News Blogger Template
NewsLite - Magazine & News Blogger Template

Bhopal बिहार का सिंधवारिणी जलाशय: सिंचाई से ईको-टूरिज्म तक विकास की नई धारा Bihar's Sindhwarini Reservoir: A new wave of development, from irrigation to eco-tourism

 


Upgrade Jharkhand News.  बिहार के मुंगेर जिले के टेटिया बंबर प्रखंड स्थित देवघरा का सिंधवारिणी जलाशय लंबे समय तक केवल एक जलस्रोत भर नहीं, बल्कि अधूरी विकास योजनाओं का प्रतीक बना रहा। एक ओर इसके निकट महाभारतकालीन मान्यताओं से जुड़ा उच्चेश्वर नाथ महादेव मंदिर है, तो दूसरी ओर प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर पहाड़ी क्षेत्र। इसके बावजूद यह इलाका न तो सिंचाई की दृष्टि से अपनी पूरी क्षमता का उपयोग कर सका और न ही पर्यटन की दृष्टि से अपेक्षित पहचान प्राप्त कर पाया। अब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की पहल से इस क्षेत्र को सिंचाई, ईको-टूरिज्म और स्थानीय अर्थव्यवस्था के समेकित विकास से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। सिंधवारिणी जलाशय की अवधारणा मूल रूप से वर्षा जल के संचयन, सिंचाई और क्षेत्र के जल संसाधनों को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से विकसित की गई थी। लेकिन वर्षों तक पर्याप्त निवेश, रखरखाव और दीर्घकालिक योजना के अभाव में यह परियोजना अपनी संभावनाओं के अनुरूप विकसित नहीं हो सकी। जलाशय का उपयोग सीमित रहा और आसपास के किसानों को भी इसका पूरा लाभ नहीं मिल पाया।


वर्ष 1994 में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने देवघरा क्षेत्र को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की घोषणा की थी। स्थानीय लोगों में उस समय काफी उम्मीद जगी थी कि जलाशय, देवघरा पहाड़ और उच्चेश्वर नाथ महादेव मंदिर को जोड़कर एक समग्र धार्मिक-पर्यटन क्षेत्र विकसित होगा। किंतु वर्षों तक यह घोषणा कागजों तक ही सीमित रही। आधारभूत सुविधाओं का अभाव बना रहा और सिंधवारिणी जलाशय भी अपेक्षित विकास की प्रतीक्षा करता रहा। बदलाव की शुरुआत तब दिखाई दी जब सम्राट चौधरी ने उपमुख्यमंत्री रहते हुए महाशिवरात्रि के अवसर पर देवघरा पहुंचकर मंदिर में पूजा-अर्चना की और क्षेत्र के विकास के लिए कई घोषणाएं कीं। उन्होंने सिंधवारिणी जलाशय को केवल जल संरक्षण परियोजना नहीं, बल्कि ईको-टूरिज्म, धार्मिक पर्यटन और स्थानीय रोजगार से जोड़ने की परिकल्पना प्रस्तुत की। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने इस परियोजना को आगे बढ़ाते हुए संबंधित विभागों को विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए। राज्य सरकार जलाशयों और तालाबों के आसपास ईको-टूरिज्म विकसित करने की व्यापक नीति पर कार्य कर रही है, जिसमें सिंधवारिणी जलाशय को भी शामिल किया गया है।


सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इस परियोजना का किसानों को क्या लाभ होगा। वास्तव में किसी भी जलाशय का सबसे पहला उद्देश्य सिंचाई की स्थायी व्यवस्था उपलब्ध कराना होता है। वर्षा आधारित खेती करने वाले किसानों के लिए जलाशय जीवनरेखा का कार्य करता है। यदि सिंधवारिणी जलाशय की जलधारण क्षमता का पूरा उपयोग किया जाता है और इससे जुड़ी नहरों तथा वितरण प्रणाली को सुदृढ़ किया जाता है, तो खरीफ के साथ-साथ रबी और ग्रीष्मकालीन फसलों की सिंचाई भी संभव हो सकेगी। इससे फसल विविधीकरण बढ़ेगा, उत्पादन में वृद्धि होगी और किसानों की आय में भी सुधार आएगा। सिंचाई सुविधाओं के विस्तार से भूमिगत जल पर निर्भरता कम होती है, ऊर्जा की बचत होती है और कृषि की लागत भी घटती है। विभिन्न सिंचाई परियोजनाओं के अध्ययन बताते हैं कि बेहतर सिंचाई से भूमि उपयोग, फसल उत्पादकता और किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। सिंधवारिणी जलाशय का दूसरा बड़ा लाभ भूजल पुनर्भरण (ग्राउंडवॉटर रिचार्ज) के रूप में सामने आएगा। जलाशय में पर्याप्त जल संग्रह होने से आसपास के कुओं और चापाकलों का जलस्तर बेहतर बना रहेगा। इससे पेयजल की उपलब्धता के साथ-साथ सूखे की स्थिति में भी किसानों को राहत मिलेगी।


परियोजना का तीसरा महत्वपूर्ण पक्ष पर्यटन है। जलाशय के निकट स्थित उच्चेश्वर नाथ महादेव मंदिर पहले से ही हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। यदि जलाशय के किनारे नौकायन, प्रकृति पथ, पार्क, व्यू-पॉइंट, प्रकाश व्यवस्था, पार्किंग, पर्यटक विश्राम गृह और स्थानीय हस्तशिल्प बाजार विकसित किए जाते हैं, तो यह क्षेत्र बिहार के प्रमुख धार्मिक एवं ईको-टूरिज्म केंद्र के रूप में उभर सकता है। इससे स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार, महिलाओं के लिए स्वरोजगार तथा छोटे व्यापारियों के लिए आय के नए अवसर सृजित होंगे। राज्य सरकार ने हाल के वर्षों में जलाशयों के विकास और ईको-टूरिज्म को बढ़ावा देने की नीति अपनाई है। इसी क्रम में सिंधवारिणी जलाशय के विकास के लिए विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (डीपीआर) तैयार कराया जा रहा है और पर्यटन तथा आधारभूत सुविधाओं पर निवेश की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। हालांकि सरकार की ओर से इस परियोजना पर होने वाले कुल व्यय का अंतिम आधिकारिक आंकड़ा अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, लेकिन इसे चरणबद्ध रूप से विकसित करने की योजना पर काम चल रहा है। फिर भी केवल निवेश पर्याप्त नहीं होगा। जलाशय का नियमित रखरखाव, गाद की सफाई, जल संरक्षण, हरित क्षेत्र का विकास और स्थानीय समुदाय की भागीदारी इस परियोजना की सफलता के लिए अनिवार्य होगी। यदि पंचायतों, जीविका समूहों और स्थानीय युवाओं को इस परियोजना से जोड़ा जाता है, तो विकास का लाभ सीधे ग्रामीण समाज तक पहुंचेगा।


मुंगेर के मूल निवासी होने के कारण मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का इस क्षेत्र से विशेष भावनात्मक जुड़ाव भी माना जाता है। यही कारण है कि उन्होंने सिंधवारिणी जलाशय, उच्चेश्वर नाथ महादेव मंदिर और देवघरा क्षेत्र को एकीकृत विकास मॉडल के रूप में देखने की पहल की है। यह दृष्टिकोण केवल पर्यटन तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि, जल संरक्षण, रोजगार और सांस्कृतिक विरासत को भी साथ लेकर चलता है। यदि सरकार की घोषणाएं समयबद्ध तरीके से धरातल पर उतरती हैं, तो सिंधवारिणी जलाशय केवल एक जलाशय नहीं रहेगा, बल्कि मुंगेर के ग्रामीण विकास का नया आधार बनेगा। इससे किसानों को स्थायी सिंचाई, युवाओं को रोजगार, स्थानीय व्यापार को नई गति और धार्मिक पर्यटन को नई पहचान मिलेगी। ऐसे में यह परियोजना बिहार में जल संसाधन आधारित समेकित विकास का एक प्रभावी मॉडल बन सकती है। कुमार कृष्णन



No comments:

Post a Comment

GET THE FASTEST NEWS AROUND YOU

-ADVERTISEMENT-

.