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Bhopal बदलता बद्रीनाथ: आस्था का धाम बना पर्यटन स्थल Badrinath Changing: A Place of Faith Turns into a Tourist Destination

 


Upgrade Jharkhand News.  उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में चमोली जनपद के जोशीमठ से 44 किलोमीटर दूर 3133 मीटर की ऊंचाई पर पहुंचें तो एक तरफ बर्फ से ढकी चोटियां चमकती दिखाई देती हैं, तो दूसरी ओर घाटी में बहती अलकनंदा दहाड़ते स्वर में स्वागत करती है। यहीं पर है हिंदुओं का पवित्र धाम बद्रीनाथ। पर अब बद्रीनाथ पहले वाला बद्रीधाम नहीं रहा, जहां शांति थी, देवदार और भोजपत्र थे। अब यह धर्म क्षेत्र के साथ-साथ पर्यटन केंद्र के रूप में ज्यादा प्रतिष्ठित हो गया है। जोशीमठ से विष्णु प्रयाग के पास पुल पार कर दो विशालकाय पहाड़ियों के बीच से एक सर्पीला रास्ता बद्रीनाथ को जाता है। रास्ते भर अलकनंदा विपरीत दिशा में आपके साथ-साथ चलती है। भले ही नदी और आप विपरीत दिशा में जा रहे हों, पर हरे-भरे पहाड़ों से घिरे इस उनींदे रास्ते में बाल-सुलभ क्रीड़ा-कौतुक करती यह नदी जैसे अपने मोहपाश में बांध लेती है। पहले यह रास्ता वन-वे था, लेकिन अब सड़क काफी चौड़ी कर दी गई है। चौड़ी सड़क यानी ज्यादा गाड़ियों की भीड़।


बद्रीनाथ में भीड़तंत्र साफ नजर आता है। चारों ओर कंक्रीट का जंगल और बीच में मंदिर कहीं खो सा गया लगता है। नगर में तब्दील हो गए बद्रीनाथ में अधिकतर लोग अब जैसे मौज-मस्ती के लिए आते हैं। गंगाजल से आचमन करने की आदत है तो करेंगे ही, पर साथ ही टिन वाली कोल्ड ड्रिंक को धीरे-धीरे गटकने के बाद खाली टिन को हवा में लहराकर नदी में फेंकने की शहरी आदत भी बन गई है। सन्नाटे को चीरता हुआ टिन गुम हो जाता है अलकनंदा की अथाह गहराई में। पहले लोगों का विश्वास था कि बद्रीनाथ जाए बिना मुक्ति नहीं मिल सकती। यही कारण था कि पुराने वक्त में बद्रीनाथ की यात्रा को अंतिम यात्रा मानकर लोग घर-बार छोड़कर निकल पड़ते थे। दरअसल तब यात्रा मार्ग इतना दुर्गम था कि श्रद्धालु लौटने की उम्मीद कम ही रखते थे। आज के बद्रीनाथ की सुगमता को देखकर भले ही यह काल्पनिक लगे, पर सच यही था। जाहिर है, तब बद्रीनाथ जाना खुद को जोखिम में डालने से कम नहीं था।


बद्रीनाथ वह स्थान है जहां भगवान विष्णु विराजते हैं। जहां नर-नारायण पर्वत और नीलकंठ चोटी है, और जहां से पांडव माणा गांव के रास्ते अपनी अंतिम यात्रा पर गए थे। यहां अलकनंदा नदी भी है, जो देवप्रयाग में भागीरथी से संगम कर गंगा नाम से बहती है। बद्रीनाथ में गंगा वह नहीं है, जो कानपुर या पटना में है। हालांकि यहां भी नदी में गंदगी जा रही है। कानपुर में नदी को देखकर लगता है कि डबरे में नहाकर कोई शूकर बीच सड़क पर खड़ा हो गया हो, और पटना में गंगा महिषी की तरह बेपरवाह होकर पसर गई है। ऐसे में अपने उद्गम स्थल पर भी गंगा में बदलाव दिखना लाजमी है। केदारनाथ धाम जाने के लिए जहां आपको पैदल यात्रा करनी पड़ती है, वहीं बद्रीनाथ तक आप सीधे वाहन से जा सकते हैं। पहले सड़क संकरी थी, वन-वे यातायात नियम लागू था और गेट सिस्टम के अनुसार वाहन छोड़े जाते थे। तब वाहनों की संख्या कम थी, लेकिन अब सड़क चौड़ी हो गई है तो वाहनों की संख्या भी बहुत बढ़ गई है। वाहनों की इस भारी संख्या से उपजा दबाव और उनका काला धुआं इस नाजुक हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण संतुलन को कितना नुकसान पहुंचा रहा होगा, यह आसानी से समझा जा सकता है।


ज्यादा भीड़, ज्यादा दुकानें और ज्यादा होटल मतलब गंदगी भी ज्यादा। गंदगी ने बद्रीनाथ को भी अपना मित्र बना लिया है। जहां तप्त कुंड है वहां भी गंदगी दिखाई देती है। धर्म-कर्म के साथ अपने यहां आवश्यक रूप से गंदगी जुड़ ही जाती है। तप्तकुंड के गर्म पानी में अपने पाप धोने को लोग लालायित रहते हैं। जो लोग शहरों में रहते हुए गंगाजल को छूते तक नहीं, वे तप्तकुंड में गंगा का नाम लेकर डुबकी लगाते हैं। यही नहीं, कुछ लोग साबुन से कपड़े धोते हुए भी दिख जाते हैं और यह गंदगी सीधे अलकनंदा में समाती है।  कभी बद्रीनाथ में आध्यात्मिक शांति मिलती होगी। कोई समय रहा होगा जब यहां वन्य जीव विचरते थे या पेड़ों की पत्तियों पर ओसजन प्राणवायु के झोंके उछल-कूद करते थे। पर अब यहां वाहनों के ईंधन के धुएं से निकलती जानलेवा कार्बन मोनोऑक्साइड और ध्वनि प्रदूषण ज्यादा है। लोगों की भीड़, दुकानदारों की आवाज और होटल-धर्मशालाओं के जेनरेटरों की आवाज के साथ माहौल को मेले का रूप देने के लिए शोर का अटूट भंडार है। अब अलकनंदा के दोनों ओर खाली जमीन नहीं बची है। मुख्य मंदिर को चारों ओर से मकानों ने ढक सा दिया है।


ऋषि गंगा और अलकनंदा की धाराओं के संगम पर स्थित बद्रीनाथ को कभी बद्री वन के नाम से जाना जाता था। बद्री का शाब्दिक अर्थ 'बेर' होता है। कहते हैं, कभी इस स्थान पर बेरों के जंगल हुआ करते थे, पर आज उनका अस्तित्व कहीं नजर नहीं आता। आज तो ऑक्टोपस की विशाल बाहों की तरह होटल, धर्मशालाएं और आश्रम चारों तरफ पसरे पड़े हैं। उनकी विकराल दाढ़ में पहले पेड़ समाते हैं, फिर चट्टानें और अब नंबर है अलकनंदा की धार का। बद्रीनाथ में आपको हर सुविधा के दीदार हो जाएंगे। यहां बाजार, बैंक, डाकघर, अस्पताल, होटल, रेस्टोरेंट, धर्मशालाएं सभी कुछ हैं। पूजा सामग्री, सीडी, मालाएं, चित्र, पेय पदार्थ, आइसक्रीम आदि से सजी सैकड़ों दुकानें हैं। किसी चीज की कमी नजर नहीं आती। सीजन में सामग्री के रेट भी बढ़ जाते हैं। ऊनी कपड़ों, कालीनों की दुकानें भी आपको यहां मिल जाएंगी, लेकिन इन तमाम सुख-सुविधाओं का नकारात्मक पक्ष यह है कि जिस सुकून की तलाश में आप बद्रीनाथ धाम आए हैं, वह शायद आपको न मिल पाए। रोजमर्रा का माया-जंजाल यहां भी आपका पीछा नहीं छोड़ता।


बद्रीनाथ की यात्रा रोमांच और प्रसन्नता प्रदान करती है। हो भी क्यों न, आखिरकार यह हिंदुओं के चार धामों में से एक है। लेकिन यहां भी कई तरह की शहरी आशंकाएं पीछा नहीं छोड़तीं। यहां आकर लगता है जैसे सब कुछ ऊपर वाले की कृपा पर निर्भर है। चारों धामों में भगवान हैं, अतः भगवान भरोसे हैं धाम। यात्री तो चल रहे हैं अकेले भी और सबके साथ भी। दीपक नौगांई 'अकेला



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