Upgrade Jharkhand News. बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने 15 जुलाई 2026 को भागलपुर जिले के गौराडीह प्रखंड के कासिल गांव में आयोजित समारोह में राज्य के 211 नए डिग्री कॉलेजों का एक साथ लोकार्पण किया तथा प्रस्तावित विक्रमशिला केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए 200 एकड़ भूमि उच्च शिक्षा विभाग को हस्तांतरित की। यह निर्णय केवल एक विश्वविद्यालय की स्थापना भर नहीं, बल्कि भारत की उस महान शैक्षिक परंपरा को पुनर्जीवित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जिसने एक समय पूरे एशिया को ज्ञान का प्रकाश दिया था। भागलपुर जिले के कहलगांव अनुमंडल स्थित अंतीचक गांव में अवस्थित विक्रमशिला महाविहार भारत के उन महान प्राचीन विश्वविद्यालयों में था, जिनमें तक्षशिला, नालंदा और ओदंतपुरी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इसकी स्थापना आठवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पालवंशीय सम्राट धर्मपाल ने की थी। मुख्यमंत्री ने भूमि हस्तांतरण के अवसर पर कहा कि लगभग एक हजार वर्षों के बाद इसी धरती से ज्ञान की नई किरणें पुनः चारों दिशाओं में फैलेंगी। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विक्रमशिला के नाम पर केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करने की घोषणा की थी, जिसके बाद से क्षेत्र के लोगों की यह मांग लगातार उठती रही।
लगभग चार शताब्दियों तक विक्रमशिला केवल भारत ही नहीं, बल्कि श्रीलंका, नेपाल, तिब्बत, चीन तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में बौद्ध दर्शन, संस्कृति और उच्च शिक्षा का प्रमुख केंद्र रहा। यदि इसे अपने समय का "ऑक्सफोर्ड" कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहां प्रवेश अत्यंत कठिन था। विद्यार्थियों को पहले विद्वान द्वार-पंडितों की कठोर परीक्षा उत्तीर्ण करनी पड़ती थी, तभी उन्हें अध्ययन का अवसर मिलता था। यह व्यवस्था उस समय की उत्कृष्ट शैक्षणिक गुणवत्ता का प्रमाण थी। तिब्बती इतिहासकार लामा तारानाथ के अनुसार धर्मपाल ने विक्रमशिला के केंद्र में 108 मंदिरों से घिरा एक विशाल महाविहार बनवाया था, जहां शिक्षा और साधना दोनों का वातावरण था। यहां सौ से अधिक आचार्य और एक हजार से अधिक विद्यार्थी निवास करते थे। वहीं इतिहासकार प्रो. राधाकृष्ण चौधरी के अनुसार यहां लगभग 160 आचार्य तथा दस हजार तक विद्यार्थी अध्ययनरत थे। विद्यार्थियों के भोजन, आवास और अध्ययन की समुचित व्यवस्था परिसर के भीतर ही थी। विक्रमशिला का मुख्य सभागार विज्ञान-कक्ष कहलाता था, जिसके अंतर्गत छह प्रमुख शिक्षण केंद्र संचालित होते थे। यहां महायान, वज्रयान, तंत्र, योग, व्याकरण, न्याय, काव्य, दर्शन, तर्कशास्त्र, चिकित्सा, शिल्प और आध्यात्मिक अध्ययन जैसे विषय पढ़ाए जाते थे। छह प्रवेश द्वारों पर नियुक्त प्रसिद्ध द्वारपंडित रत्नव्रज, ज्ञानश्री मित्र, नरोप, प्रज्ञाकरमति, रत्नाकर शांति और वागीश्वर कीर्ति,प्रवेश परीक्षा लेते थे। इस कठोर चयन प्रक्रिया ने विक्रमशिला को विश्वस्तरीय प्रतिष्ठा दिलाई।
पाल राजाओं का संरक्षण विक्रमशिला की सबसे बड़ी शक्ति था। इतिहासकार जे. एन. समाद्दार के अनुसार धर्मपाल द्वारा स्थापित होने के कारण यह राजकीय संरक्षण प्राप्त विश्वविद्यालय था। राजा स्वयं इसके कुलाधिपति होते थे और दीक्षांत समारोह में उपाधियां प्रदान करते थे। आचार्यों की नियुक्ति भी राजसत्ता द्वारा की जाती थी। यही कारण था कि नालंदा, सोमपुर और ओदंतपुरी की तुलना में विक्रमशिला लंबे समय तक अधिक सुदृढ़ स्थिति में रहा। तिब्बत के साथ विक्रमशिला के विशेष संबंध थे। यहां तिब्बती विद्यार्थियों के लिए अलग छात्रावास था, जिसके अवशेष आज भी मौजूद हैं। प्रसिद्ध विद्वान सुकुमार दत्त लिखते हैं कि जिस प्रकार चीनी यात्रियों ने नालंदा की प्रशंसा की, उसी प्रकार तिब्बती ग्रंथों में विक्रमशिला का गौरवपूर्ण वर्णन मिलता है। आठवीं शताब्दी के बाद भारत और तिब्बत के सांस्कृतिक संबंधों का प्रमुख सेतु यही विश्वविद्यालय बना। यहां विदेशी विद्यार्थियों की संख्या भी काफी अधिक थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व निदेशक डॉ. बी. एस. वर्मा के अनुसार विक्रमशिला की प्रशासनिक व्यवस्था अत्यंत विकसित थी। यहां आधुनिक विश्वविद्यालयों की तरह सीनेट और सिंडिकेट जैसी संस्थाएं कार्य करती थीं। व्यक्तिगत मार्गदर्शन और सामूहिक कक्षाओं,दोनों प्रकार की शिक्षण प्रणाली यहां प्रचलित थी। प्रत्येक विद्यार्थी को प्रारंभिक अवधि में एक भिक्षु-आचार्य के संरक्षण में रखा जाता था, जिससे शिक्षा के साथ नैतिक और आध्यात्मिक संस्कार भी विकसित हों।
विक्रमशिला अनेक महान विद्वानों की कर्मभूमि रही। रत्नाकर शांति, ज्ञानश्री मित्र, नरोप, शाक्यश्री, वीरोचन, वागीश्वर तथा विशेष रूप से आचार्य दीपंकर श्रीज्ञान अतिश का नाम विश्व इतिहास में सम्मान से लिया जाता है। दीपंकर श्रीज्ञान तिब्बत जाकर तेरह वर्षों तक बौद्ध धर्म के पुनरुत्थान में लगे रहे। तिब्बत में उन्हें आज भी बुद्ध के दूसरे अवतार के रूप में श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है। विक्रमशिला वज्रयान बौद्ध परंपरा का प्रमुख केंद्र भी था। इतिहासकार रोमिला थापर और ए. एल. बाशम ने उल्लेख किया है कि पूर्वी भारत में विकसित वज्रयान परंपरा को तिब्बत तक पहुंचाने में विक्रमशिला के आचार्यों की निर्णायक भूमिका रही। यहां बौद्ध अध्ययन के साथ व्याकरण, न्याय, चिकित्सा, सांख्य, तर्क और शिल्प जैसी लौकिक विद्याओं का भी समान महत्व था। लगभग चार सौ वर्षों तक ज्ञान की अलख जगाने वाला यह महान विश्वविद्यालय बारहवीं शताब्दी के अंत में तुर्क आक्रमणों में ध्वस्त हो गया। इसके बाद लगभग आठ सौ वर्षों तक इसका अस्तित्व इतिहास के पन्नों में ही सीमित रह गया। 1960 के दशक में पटना विश्वविद्यालय के डॉ. बी. पी. वर्मा तथा बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के डॉ. बी. एस. वर्मा के नेतृत्व में हुई खुदाइयों ने इस गौरवशाली धरोहर को फिर दुनिया के सामने प्रस्तुत किया। अभी भी इसका बड़ा हिस्सा धरती के भीतर दबा हुआ है और व्यापक उत्खनन की प्रतीक्षा कर रहा है।
आज विक्रमशिला देश-विदेश के पर्यटकों और शोधकर्ताओं का प्रमुख आकर्षण बन चुका है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा निर्मित संग्रहालय में उत्खनन से प्राप्त दुर्लभ मूर्तियां और पुरावशेष सुरक्षित रखे गए हैं। राज्य सरकार प्रत्येक वर्ष यहां विक्रमशिला महोत्सव का आयोजन करती है, जिससे इस धरोहर के प्रति लोगों की रुचि और जागरूकता बढ़ रही है। ऐसे समय में जब भारत अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा को वैश्विक स्तर पर पुनर्स्थापित करने का प्रयास कर रहा है, विक्रमशिला केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना अत्यंत महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगी। यह केवल एक नया शिक्षण संस्थान नहीं होगा, बल्कि उस गौरवशाली विरासत का पुनर्जागरण होगा जिसने कभी भारत को विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया था। यदि यह विश्वविद्यालय प्राचीन विक्रमशिला की उदारता, शोधपरक दृष्टि, अंतरराष्ट्रीय चरित्र और उत्कृष्ट शैक्षणिक परंपरा को आत्मसात कर आगे बढ़ता है, तो निश्चय ही अंगभूमि से एक बार फिर ज्ञान की ज्योति दिग्दिगंत तक प्रसारित होगी। शिव शंकर सिंह पारिजात

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