Guwa (Sandeep Gupta) सारंडा के जोजोगुटू गांव में मंगलवार को संथाल समाज के नौ मौजा के ग्रामीणों ने हुल दिवस पारंपरिक रीति-रिवाजों, सामूहिक पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ श्रद्धा एवं उत्साहपूर्वक मनाया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में महिला-पुरुष, युवा और बुजुर्ग शामिल हुए तथा संथाल हुल आंदोलन के वीर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम की शुरुआत संथाल परंपरा के अनुसार जाहेर थान में पूजा-अर्चना से हुई। समाज के बुजुर्गों और पाहन ने प्रकृति, पूर्वजों तथा हुल आंदोलन के महानायकों की स्मृति में सामूहिक प्रार्थना की। इसके बाद पारंपरिक नृत्य, गीत और सभा का आयोजन किया गया, जिसमें समाज की एकता, संस्कृति और अधिकारों की रक्षा का संकल्प दोहराया गया।
वक्ताओं ने कहा कि हुल दिवस भारतीय आदिवासी इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। 30 जून 1855 को वर्तमान झारखंड के साहिबगंज जिले के भोगनाडीह गांव में संथाल समुदाय के वीर भाइयों—सिदो, कान्हू, चांद और भैरव मुर्मू ने अंग्रेजी हुकूमत और महाजनी शोषण के खिलाफ हुल अर्थात क्रांति का बिगुल फूंका था। यह आंदोलन आदिवासियों की जमीन, जल, जंगल और अस्मिता की रक्षा के लिए शुरू हुआ था तथा स्वतंत्रता संग्राम की मजबूत नींव माना जाता है। सभा में कहा गया कि हुल दिवस केवल स्मृति दिवस नहीं, बल्कि अपनी पहचान, संस्कृति और संघर्ष की चेतना को जीवित रखने का पर्व है। यह नई पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास और पूर्वजों के बलिदान से परिचित कराता है।
ग्रामीणों ने कहा कि जल, जंगल और जमीन उनकी पहचान हैं, जिनकी रक्षा के लिए पूर्वजों ने संघर्ष किया था। आज भी उसी चेतना को जीवित रखने की आवश्यकता है। कार्यक्रम के दौरान महिलाओं और पुरुषों ने पारंपरिक वेशभूषा में भाग लिया तथा मांदर, ढोल और नगाड़ों की थाप पर आकर्षक संथाली लोकनृत्य प्रस्तुत किया। पूरे गांव में उत्सव का माहौल रहा। समापन पर नौ मौजा के ग्रामीणों ने समाज की एकता बनाए रखने, अपने अधिकारों की रक्षा करने तथा आदिवासी भाषा, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण का सामूहिक संकल्प लिया।



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