Default Image

Months format

Show More Text

Load More

Related Posts Widget

Article Navigation

Contact Us Form

Terhubung

NewsLite - Magazine & News Blogger Template
NewsLite - Magazine & News Blogger Template

Bhopal नेपाल की आड़ में चीन की सेंध, भारत के खेत से थाली तक चुपचाप चुनौती China's incursion under the guise of Nepal, a silent challenge from farm to plate to India

Upgrade Jharkhand News. भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराना संबंध केवल सीमा का नहीं, बल्कि संस्कृति, परिवार, व्यापार और विश्वास का संबंध है। यही खुली और सहज सीमा अब विदेशी माल की अवैध आवाजाही का माध्यम बनने लगी है। ऐसे में अब चिंता केवल व्यापार की ही नहीं है, इसका सीधा असर किसान, छोटे व्यापारी, सरकारी राजस्व, उपभोक्ता और अंततः देश की आर्थिक सुरक्षा पर पड़ने की भी संभावना है।        आज नेपाल के रास्ते चीन से आने वाले कथित पुनःनिर्यात और संदिग्ध मूल वाले माल को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। यदि किसी तीसरे देश में केवल पैकेजिंग, लेबल या कागजी प्रक्रिया बदलकर माल को नया मूल दे दिया जाता है, तो यह व्यापार व्यवस्था की पारदर्शिता के लिए गंभीर चुनौती है। इसे केवल तस्करी कहकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा,इसके पीछे की पूरी आपूर्ति-श्रृंखला को समझना होगा। सबसे बड़ा संकट कृषि उत्पादों को लेकर दिखाई दे रहा है। कश्मीर का अखरोट इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। वर्षों से कश्मीरी अखरोट अपनी गुणवत्ता, स्वाद और प्राकृतिक पहचान के कारण देशभर में प्रतिष्ठित है। ऐसे में यदि बाजार में कम कीमत वाला संदिग्ध विदेशी अखरोट नेपाली उत्पाद के नाम से प्रवेश करता है, तो स्वाभाविक रूप से स्थानीय किसान पर मूल्य का दबाव बढ़ता है। किसान के लिए समस्या केवल बिक्री मूल्य की नहीं है। उसे बाग की देखभाल, मजदूरी, तुड़ाई, सुखाने, छंटाई, भंडारण और परिवहन का खर्च भी उठाना पड़ता है। जब बाजार मूल्य लागत के आसपास या उससे नीचे चला जाए तो किसान का उत्पादन के प्रति उत्साह टूटना स्वाभाविक है।


यही खतरा लहसुन, सेब, बादाम, किशमिश, काली मिर्च, सुपारी, इलायची और अन्य कृषि उत्पादों के मामले में भी समझना होगा। किसी भी देश की कृषि अर्थव्यवस्था तभी मजबूत रहती है जब उसके किसानों को बाजार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा मिले। यदि कम लागत वाला विदेशी माल गलत मूल-प्रमाणपत्र के सहारे घरेलू बाजार में प्रवेश करता है, तो ईमानदारी से कर और नियमों का पालन करने वाला भारतीय किसान तथा व्यापारी दोनों नुकसान में चले जाते हैं। लहसुन का मामला विशेष रूप से संवेदनशील है। चीन से आने वाले लहसुन पर भारत में लंबे समय से प्रतिबंध और गुणवत्ता संबंधी चिंताएं चर्चा में रही हैं। यदि प्रतिबंधित या प्रतिबंधित श्रेणी के माल को किसी तीसरे देश के रास्ते भारतीय बाजार तक पहुंचाने का प्रयास होता है, तो यह केवल सीमा शुल्क का मामला नहीं है। यहां खाद्य सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है। किसी भी विदेशी खाद्य पदार्थ को भारतीय बाजार में पहुंचने से पहले उसकी गुणवत्ता, रासायनिक अवशेष, कीटनाशक स्तर, फफूंद और स्वास्थ्य संबंधी मानकों की जांच से गुजरना चाहिए। समस्या का दूसरा पहलू नेपाल की व्यापार व्यवस्था से जुड़ा है। भारत और नेपाल के बीच विशेष व्यापारिक संबंध हैं। इसलिए हर नेपाली माल को संदेह की दृष्टि से देखना न तो उचित है और न दोनों देशों के हित में। लेकिन यदि किसी वस्तु का वास्तविक उत्पादन नेपाल की क्षमता से मेल नहीं खाता और उसके आयात-निर्यात के आंकड़ों में असामान्य वृद्धि दिखाई देती है, तो जांच आवश्यक हो जाती है।


यहीं से मूल-प्रमाणपत्र की विश्वसनीयता का प्रश्न उठता है। किसी उत्पाद को नेपाली उत्पाद कहने के लिए निर्धारित नियमों के अनुसार पर्याप्त स्थानीय मूल्यवर्धन और उत्पादन होना चाहिए। केवल बोरी बदलना, लेबल लगाना या पैकेजिंग करना किसी विदेशी माल को वास्तविक नेपाली उत्पाद नहीं बना सकता। इसलिए भारत और नेपाल को मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी जिसमें माल के वास्तविक स्रोत का डिजिटल और दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध रहे।  भारत की लगभग 1,750 किलोमीटर लंबी खुली सीमा इस चुनौती को और जटिल बनाती है। सीमा पर बड़ी संख्या में लोगों का प्रतिदिन आवागमन होता है। छोटे स्तर पर होने वाली अवैध आवाजाही को पकड़ना बड़े कंटेनर की जांच की तुलना में कहीं कठिन होता है। यही कारण है कि आधुनिक सीमा प्रबंधन केवल पुलिस और सीमा बल की संख्या बढ़ाने से नहीं होगा। इसके लिए तकनीक, खुफिया सूचना, जोखिम-आधारित जांच और दोनों देशों के बीच वास्तविक समय में सूचना साझा करने की व्यवस्था आवश्यक है।यह इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि इस पूरे खेल का सबसे बड़ा नुकसान भारतीय किसान को होता है। किसान पहले से ही मौसम, लागत, मजदूरी, बाजार और भंडारण जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। यदि बाजार में गलत तरीके से सस्ता विदेशी माल भर दिया जाए तो उसकी मेहनत का उचित मूल्य मिलना कठिन हो जाता है। किसान उत्पादन कम करेगा, बाग काटेगा, खेती छोड़ेगा या शहर की ओर पलायन करेगा। इसका असर केवल किसान परिवार पर नहीं, बल्कि पूरे ग्रामीण अर्थतंत्र पर पड़ेगा।


दूसरा नुकसान ईमानदार व्यापारी को होता है। जो व्यापारी सीमा शुल्क, वस्तु एवं सेवा कर, आयकर, परिवहन और अन्य नियमों का पालन करता है, वह ऐसे व्यापारी से प्रतिस्पर्धा कैसे करेगा जिसका माल कर और नियमों से बचकर बाजार में पहुंच रहा हो? इससे धीरे-धीरे औपचारिक अर्थव्यवस्था कमजोर और अनौपचारिक कारोबार मजबूत हो सकता है।  तीसरा प्रश्न सरकारी राजस्व का है। अवैध आयात केवल किसी एक व्यापारी का नुकसान नहीं करता। उससे सीमा शुल्क, कर और अन्य सरकारी राजस्व प्रभावित होते हैं। इसलिए इसे राजस्व चोरी के साथ-साथ आर्थिक अनुशासन का प्रश्न भी मानना होगा।  चौथा और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न राष्ट्रीय रणनीति का है। भारत चीन से अपनी निर्भरता कम करने, घरेलू उत्पादन बढ़ाने और आत्मनिर्भरता को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यदि वही माल किसी तीसरे देश के माध्यम से भारतीय बाजार में पहुंचता है, तो व्यापारिक नियंत्रण का उद्देश्य कमजोर हो सकता है। इसलिए भारत को चीन-नेपाल-भारत की पूरी आपूर्ति श्रृंखला को एक साथ देखकर नीति बनानी होगी। इसके समाधान भी स्पष्ट है। सोनौली, रक्सौल, जोगबनी, पानीटंकी और रूपईडीहा जैसे प्रमुख मार्गों पर अत्याधुनिक जांच प्रयोगशालाएं स्थापित की जानी चाहिए। कृषि उत्पादों के लिए मूल-स्थान की डिजिटल पहचान, बैच नंबर, उत्पादक देश और आपूर्ति श्रृंखला का रिकॉर्ड अनिवार्य किया जा सकता है। संदिग्ध माल की त्वरित प्रयोगशाला जांच हो। जोखिम वाले उत्पादों के लिए विशेष निगरानी तंत्र बनाया जाए। भारत और नेपाल की संबंधित एजेंसियों के बीच वास्तविक समय में सूचना साझा हो।


नेपाल को भी समझना होगा कि भारत उसका सबसे महत्वपूर्ण पड़ोसी बाजार है। यदि उसकी भूमि का उपयोग किसी तीसरे देश के माल को गलत पहचान देकर आगे भेजने के लिए होता है, तो इससे अंततः नेपाल की व्यापारिक विश्वसनीयता प्रभावित होगी। भारत को नेपाल के साथ कठोरता नहीं, बल्कि कठोर पारदर्शिता की नीति अपनानी चाहिए। मित्रता बनी रहे, व्यापार बढ़े, सीमा पर आवागमन सुगम रहे,लेकिन गलत मूल-प्रमाणपत्र, अवैध पुनःनिर्यात और खाद्य सुरक्षा से समझौता बिल्कुल न हो। आज विषय केवल अखरोट या लहसुन का नहीं है। मुद्दा यह भी है कि भारत की थाली में क्या पहुंचेगा, किसान को उसकी मेहनत का कितना मूल्य मिलेगा और भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धा कितनी निष्पक्ष रहेगी। सस्ता माल हमेशा सस्ता नहीं होता। कभी-कभी उसकी कीमत किसान की आय, व्यापारी की दुकान, सरकार के राजस्व और देश की आर्थिक सुरक्षा चुकाती है। इसलिए सीमा की निगरानी केवल सीमा की सुरक्षा नहीं है। यह खेत की सुरक्षा है, बाजार की सुरक्षा है और अंततः भारत की थाली की सुरक्षा है। डॉ. दीपक गोस्वामी



No comments:

Post a Comment

GET THE FASTEST NEWS AROUND YOU