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Bhopal मध्य प्रदेश: क्या मुख्यमंत्री मोहन यादव उपचुनाव में जीत की गारंटी नहीं? Madhya Pradesh: Is Chief Minister Mohan Yadav not guaranteed victory in the by-election?

 


Upgrade Jharkhand News.  दतिया विधानसभा उपचुनाव का परिणाम भाजपा की एक चुनावी हार नहीं है। इसने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व, उनकी सरकार की जनस्वीकृति और भाजपा की चुनावी रणनीति को लेकर  गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मुख्यमंत्री मोहन यादव और उनकी सरकार उपचुनाव में भाजपा की जीत की गारंटी नहीं बन पा रहे हैं? यह सवाल इसलिए और बड़ा हो जाता है क्योंकि दतिया में भाजपा ने जीत के लिए शायद ही कोई कसर छोड़ी हो। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं अलग अलग तीन दिन तक दतिया गए। उन्होंने जनसभाएं कीं, रोड शो किए और विभिन्न समाजों की बैठकों के माध्यम से मतदाताओं तक पहुंचने का प्रयास किया। उनके साथ सरकार के 12 मंत्री लगातार चुनाव प्रचार में जुटे रहे। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी प्रचार किया। मध्य प्रदेश के पांच सांसद, उत्तर प्रदेश के झांसी से एक सांसद, लगभग 110 विधायक और कई पूर्व मंत्रियों को भी चुनावी जिम्मेदारी सौंपी गई। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमन्त खण्डेलवाल और प्रदेश प्रभारी महेंद्र सिंह  भी कई दिनों तक दतिया में जमे रहे। भाजपा ने इस चुनाव को पूरी तरह प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दिया था।


इसके बावजूद परिणाम भाजपा के पक्ष में नहीं आया। कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह को 66,757 वोट मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार अशुतोष तिवारी को 60,741 मत प्राप्त हुए। लगभग छह हजार मतों के अंतर से मिली इस हार ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि जब मुख्यमंत्री, मंत्रिमंडल, सांसद, विधायक और पूरा संगठन मैदान में उतर जाए, तब भी यदि पार्टी चुनाव न जीत सके, तो आखिर कमी कहां रह गई?  दतिया की हार का एक कारण टिकट चयन को भी माना जा रहा है। पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा लंबे समय से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। राजनीतिक हलकों में लगभग तय माना जा रहा था कि टिकट उन्हें ही मिलेगा। लेकिन पार्टी ने अंतिम समय में अशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया। टिकट घोषित होते ही नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों की नाराजगी सामने आई और विरोध प्रदर्शन भी हुए। बाद में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और संगठन के वरिष्ठ नेताओं ने स्थिति संभाली। नरोत्तम मिश्रा भी प्रचार में उतरे, लेकिन चुनाव परिणाम ने संकेत दिया कि संगठन के भीतर पैदा हुई नाराजगी पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी। दतिया के अलावा यदि मुख्यमंत्री मोहन यादव के पूरे कार्यकाल में हुए उपचुनावों पर नजर डालें, तो तस्वीर और भी रोचक दिखाई देती है। उनके नेतृत्व में अब तक चार विधानसभा उपचुनाव हुए हैं।अमरवाड़ा, बुधनी, विजयपुर और दतिया। इनमें भाजपा दो सीटें जीत सकी, जबकि दो सीटें हार गई। यह रिकॉर्ड बताता है कि सरकार और संगठन को अभी भी चुनावी स्तर पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।


सबसे पहले अमरवाड़ा में भाजपा को सफलता मिली। कांग्रेस विधायक कमलेश शाह भाजपा में शामिल हुए। उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा दिया और भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा। भाजपा यह सीट जीतने में सफल रही। इसे भाजपा की राजनीतिक रणनीति और संगठनात्मक क्षमता की सफलता माना गया। इसके बाद बुधनी उपचुनाव हुआ। यह सीट पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लोकसभा सदस्य बनने के कारण खाली हुई थी। विधानसभा चुनाव में शिवराज सिंह चौहान ने यह सीट एक लाख से अधिक मतों के अंतर से जीती थी। लेकिन उपचुनाव में भाजपा की जीत का अंतर घटकर लगभग 13 हजार वोट रह गया। सीट भाजपा के पास रही, लेकिन जीत का अंतर इस बात का संकेत था कि मतदाताओं का उत्साह पहले जैसा नहीं रहा। तीसरा उपचुनाव विजयपुर में हुआ। भाजपा ने कांग्रेस छोड़कर आए रामनिवास रावत को पहले मंत्री बनाया और फिर उम्मीदवार बनाया। सरकार और संगठन ने पूरी ताकत उनके समर्थन में लगा दी। मुख्यमंत्री मोहन यादव स्वयं प्रचार में सक्रिय रहे। इसके बावजूद मंत्री रहते हुए रामनिवास रावत चुनाव हार गए और सीट कांग्रेस के खाते में चली गई। यह परिणाम भाजपा के लिए बड़ा राजनीतिक झटका था। इन चारों उपचुनावों को एक साथ देखें तो एक बात स्पष्ट दिखाई देती है कि केवल सरकार की योजनाएं, मुख्यमंत्री की सभाएं और बड़े नेताओं का प्रचार चुनाव जीतने के लिए पर्याप्त नहीं है। स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवार का चयन, संगठन की एकजुटता और कार्यकर्ताओं का मनोबल भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। मुख्यमंत्री मोहन यादव लगातार अपनी सरकार की उपलब्धियों और जनकल्याणकारी योजनाओं को जनता के बीच रख रहे हैं। परिणाम आने के बाद उन्होंने कहा कि उनके ढाई वर्ष के कार्यकाल में भाजपा ने मध्य प्रदेश की सभी 29 लोकसभा सीटें जीतीं, राज्यसभा की तीनों सीटों पर विजय प्राप्त की तथा अमरवाड़ा और बुधनी उपचुनाव भी जीते। उन्होंने यह भी कहा कि वर्ष 2023 की तुलना में दतिया में भाजपा को 1,726 अधिक वोट मिले हैं। मुख्यमंत्री का संकेत था कि पार्टी का जनाधार कमजोर नहीं हुआ है।


दूसरी ओर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने कहा कि पार्टी परिणाम की समीक्षा करेगी। समीक्षा के आधार पर आगे की रणनीति तय की जाएगी और अनुशासन से किसी प्रकार का समझौता नहीं होगा। यह बयान बताता है कि भाजपा भी इन परिणामों को सामान्य चुनावी हार मानकर छोड़ने के मूड में नहीं है। फिर भी राजनीतिक विश्लेषण का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न अपनी जगह कायम है। यदि मुख्यमंत्री स्वयं चुनाव अभियान का नेतृत्व करें, पूरा मंत्रिमंडल चुनावी मैदान में उतर जाए, केंद्रीय मंत्री प्रचार करें, सांसद-विधायक बूथ स्तर तक सक्रिय रहें और फिर भी भाजपा दो महत्वपूर्ण उपचुनाव हार जाए, तो क्या यह माना जाए कि मुख्यमंत्री मोहन यादव अभी चुनाव जिताने वाले नेता के रूप में पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाए हैं?  हालांकि यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि इन हारों का पूरा कारण मुख्यमंत्री का नेतृत्व है। दतिया में टिकट चयन का विवाद था, विजयपुर में स्थानीय समीकरण अलग थे और हर उपचुनाव की अपनी परिस्थितियां थीं। लेकिन लोकतंत्र में अंतिम पैमाना परिणाम ही होते हैं। चार उपचुनावों में दो जीत, दो हार और बुधनी जैसी सुरक्षित सीट पर जीत का अंतर एक लाख से घटकर लगभग 13 हजार वोट रह जाना भाजपा के लिए निश्चित रूप से गंभीर आत्ममंथन का विषय है।


आने वाले नगरीय निकाय चुनाव अब मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व की अगली बड़ी परीक्षा होंगे। यदि भाजपा वहां प्रभावशाली प्रदर्शन करती है, तो उपचुनावों की हार को स्थानीय परिस्थितियों का परिणाम माना जा सकता है। लेकिन यदि वहां भी अपेक्षित सफलता नहीं मिलती, तो यह बहस और तेज होगी कि क्या मुख्यमंत्री मोहन यादव का प्रशासनिक नेतृत्व चुनावी नेतृत्व में उसी प्रभाव के साथ बदल पाया है, जिसकी भाजपा को उम्मीद थी। पवन वर्मा



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