Upgrade Jharkhand News. रक्षाबंधन का त्योहार श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह पर्व मात्र रक्षा सूत्र के रूप में राखी बांधकर रक्षा का वचन ही नहीं देता, वरन प्रेम, समर्पण, निष्ठा व संकल्प के जरिए हृदयों को बांधने का भी वचन देता है। पहले विपत्ति आने पर अपनी रक्षा के लिए अथवा किसी की आयु और आरोग्य की वृद्धि के लिए किसी को भी रक्षा-सूत्र (राखी) बांधी या भेजी जाती थी। सूत्र अविच्छिन्नता का प्रतीक है, क्योंकि सूत्र (धागा) बिखरे हुए मोतियों को अपने में पिरोकर एक माला के रूप में एकाकार बनाता है। माला के सूत्र की तरह रक्षा-सूत्र (राखी) भी व्यक्ति को, समाज से और अपने कर्तव्यों से जोड़ता है। रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति का प्रमुख पर्व है। उत्तर भारत में आमतौर पर इसे भाई-बहन के स्नेह व उनके आपसी कर्तव्यों के लिए जाना जाता है। भाई द्वारा बहन की रक्षा और इसके लिए बहन द्वारा भाई की कलाई पर रक्षा-सूत्र या राखी बांधने का रिवाज ही रक्षाबंधन पर्व कहा जाता है। किंतु यह प्राचीन भारतीय संस्कृति में देश और राष्ट्र की रक्षा, जीवों की रक्षा, समाज व परिवार की रक्षा और भाषा व संस्कृति की रक्षा से भी जुड़ा हुआ है। वर्तमान में रक्षाबंधन के संकल्प को पर्यावरण की रक्षा के साथ भी जोड़कर देखा जा रहा है। कई लोग वृक्षों को राखी बांधकर पर्यावरण के प्रति जागरूकता ला रहे हैं।
रक्षा का संकल्प व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास लाता है। रक्षा करने का भाव ही व्यक्ति को ऊर्जावान बना देता है और वह इस ऊर्जा के वशीभूत बड़े से बड़े काम कर जाता है। रक्षा का संकल्प लेने वाला व्यक्ति भले ही शारीरिक रूप से कमजोर हो, लेकिन वह अंतस की ऊर्जा से ओतप्रोत हो जाता है। रक्षाबंधन भाई और बहन के रिश्ते की पहचान माना जाता है। राखी का धागा बांधकर बहन अपने भाई से अपनी रक्षा का प्रण लेती है। यूं तो भारत में भाई-बहनों के बीच प्रेम और कर्तव्य की भूमिका किसी एक दिन की मोहताज नहीं है, पर रक्षाबंधन के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व की वजह से ही यह दिन इतना महत्वपूर्ण बना है। आप सभी जानते हैं, भारत में अगर हिंदू धर्म की कोई सबसे बड़ी पहचान है तो वह हैं इसके त्योहार। और सिर्फ हिंदू ही क्यों, भारत में तो हर जाति और धर्म के त्योहारों का अनूठा संगम देखने को मिलता है। हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है राखी या रक्षाबंधन। यह त्योहार भाई-बहन के निःस्वार्थ प्रेम का प्रतीक है। भाई-बहन के पवित्र प्रेम के साथ ही इसमें जो सादगी है, वह किसी दूसरे त्योहार में नहीं है। दीवाली में दीयों की रोशनी होती है। होली में रंग और गुलाल की धूम मची होती है। दशहरे का दिन भी बड़ा धूमधाम का होता है, लेकिन रक्षाबंधन का त्योहार मनाने के लिए पवित्र हार्दिक प्रेम के सिवा अन्य किसी भी चीज की जरूरत नहीं पड़ती। राखी के दिन मौसम बहुत सुहावना होता है। आकाश में बिजली मानो अपने भाई बादलों को राखी बांधने के लिए अधीरता प्रकट करती दिखाई देती है। यह त्योहार हर भाई को अपनी बहन के प्रति अपने कर्तव्य की याद दिलाता है। बहन भाई को प्यार से राखी बांधती है और भाई मन ही मन अपनी बहन की रक्षा की जिम्मेदारी स्वीकार करता है। राखी से भाई-बहन के बीच स्नेह का पवित्र बंधन और मजबूत हो जाता है।
अभी तक लोग यही मानते आए हैं कि अबला होने के नाते नारी राखी बांधकर अपनी रक्षा का भार भाई पर डालती है। किंतु वास्तव में वह भाई को केवल अपनी रक्षा का ही नहीं, बल्कि सारी नारी जाति की रक्षा का भार सौंपती है। राखी बांधकर वह अपने भाई को शक्ति और साहस का मंत्र देती है और उसके कल्याण की कामना करती है, इसलिए ऐसे पवित्र त्योहार को उत्साह और आनंद से मनाना चाहिए। भारत चाहे आज कितना भी विकसित क्यों न हो जाए, यहां धर्म हर चीज पर भारी पड़ता है। रक्षाबंधन के संदर्भ में भी कहा जाता है कि अगर इस पर्व का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व नहीं होता तो शायद यह पर्व अब तक अस्तित्व में रहता ही नहीं। रक्षा बंधन पर्व का सबसे खूबसूरत पहलू यही है कि यह पर्व धर्म और जाति के बंधनों को नहीं मानता। अपने इसी गुण के कारण आज इस पर्व की सराहना पूरी दुनिया में की जाती है।
रक्षाबंधन का मंत्र--येन बद्धो बलि: राजा दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल।
जब भी कोई कार्य शुभ समय में किया जाता है, तो उस कार्य की शुभता में वृद्धि होती है। भाई-बहन के रिश्ते को अटूट बनाने के लिए इस राखी बांधने का कार्य शुभ मुहूर्त के समय में करना चाहिए। रक्षाबंधन के संबंध में एक अन्य पौराणिक कथा भी प्रसिद्ध है। देवों और दानवों के युद्ध में जब देवता हारने लगे, तब वे देवराज इंद्र के पास गए। देवताओं को भयभीत देखकर इंद्राणी ने उनके हाथों में रक्षासूत्र बांध दिया। इससे देवताओं का आत्मविश्वास बढ़ा और उन्होंने दानवों पर विजय प्राप्त की। तभी से राखी बांधने की प्रथा शुरू हुई। दूसरी मान्यता के अनुसार ऋषि-मुनियों के उपदेश की पूर्णाहुति इसी दिन होती थी। वे राजाओं के हाथों में रक्षासूत्र बांधते थे। इसलिए आज भी इस दिन ब्राह्मण अपने यजमानों को राखी बांधते हैं। रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक है। इस दिन बहन अपने भाई को प्यार से राखी बांधती है और उसके लिए अनेक शुभकामनाएं करती है। भाई अपनी बहन को यथाशक्ति उपहार देता है। बीता हुआ बचपन की झूमती हुई याद भाई-बहन की आंखों के सामने नाचने लगती है। सचमुच, रक्षाबंधन का त्योहार हर भाई को बहन के प्रति अपने कर्तव्य की याद दिलाता है।
इस पर्व का संबंध रक्षा से है। जो भी आपकी रक्षा करने वाला है उसके प्रति आभार दर्शाने के लिए आप उसे रक्षासूत्र बांध सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने रक्षा सूत्र के विषय में युधिष्ठिर से कहा था कि रक्षाबंधन का त्योहार अपनी सेना के साथ मनाओ, इससे पाण्डवों एवं उनकी सेना की रक्षा होगी। श्रीकृष्ण ने यह भी कहा था कि रक्षा सूत्र में अद्भुत शक्ति होती है।
धार्मिक महत्व - रक्षाबंधन कब प्रारम्भ हुआ, इसके विषय में कोई निश्चित कथा नहीं है, लेकिन जैसा कि भविष्य पुराण में लिखा है, उसके अनुसार सबसे पहले इन्द्र की पत्नी ने देवराज इन्द्र को देवासुर संग्राम में असुरों पर विजय पाने के लिए मंत्र से सिद्ध करके रक्षा सूत्र बांधा था। इससे सूत्र की शक्ति से देवराज युद्ध में विजयी हुए। शिशुपाल के वध के समय भगवान कृष्ण की उंगली कट गई थी, तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का आंचल फाड़कर कृष्ण की उंगली पर बांध दिया। इस दिन श्रावण पूर्णिमा की तिथि थी। एक हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार राजा बलि ने भगवान विष्णु से अपना साम्राज्य दुश्मनों के प्रपंचों से बचाने हेतु आग्रह किया। अपने भक्त के अनुरोध पर भगवान विष्णु ने ब्राह्मण स्त्री का रूप लेकर राजा बलि के निवास में रहने का संकल्प लिया, परंतु इस प्रतिज्ञा को सुन भगवान विष्णु की पत्नी देवी लक्ष्मी ने राजा बलि से अपने स्वामी को स्वर्गलोक नहीं छोड़ने के लिए निवेदन किया। देवी लक्ष्मी ने श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बलि को राखी बांधकर उनसे अपने स्वामी को स्वर्गलोक नहीं त्यागने का वचन लिया। बहन की कामना जानकर राजा बलि ने विष्णु देव से स्वर्गलोक में ही रहने की विनती की। इसीलिए राखी के त्योहार को बलेवा भी कहा जाता है। इसका मतलब है, राजा बलि की भगवान विष्णु के प्रति सच्ची भक्ति।
जैन धर्म में रक्षा बंधन पर्व- यह पर्व साधना में लीन सात सौ मुनिराजों की रक्षा के साथ जुड़ा है। इसकी कथा भी वामन अवतार की तरह ही है। इसमें मुनिराज विष्णु कुमार वामन का रूप धारण कर राजा बलि से मुनियों की रक्षा करते हैं। इस कथा के अनुसार, अकंपनाचार्य का सात सौ मुनियों का संघ विहार करते हुए हस्तिनापुर पहुंचा। जिस स्थान पर मुनि साधना कर रहे थे, उसके चारों तरफ राजा बलि ने आग लगवा दी। धुएं से मुनियों के गले अवरुद्ध हो गए, आंखें सूज गईं और तेज गर्मी से उन्हें कष्ट होने लगा, लेकिन मुनियों ने धैर्य नहीं छोड़ा। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जब तक यह कष्ट दूर नहीं होगा, तब तक अन्न-जल का त्याग करेंगे। वह श्रावण शुक्ल पूर्णिमा का ही दिन था। उस दिन मुनियों के संकट दूर करने के लिए मुनिराज विष्णु कुमार ने वामन का भेष धारण किया और बलि से भिक्षा में तीन पैर धरती मांगी। विष्णु कुमार ने अपने शरीर को बहुत अधिक बढ़ा लिया। उन्होंने अपना एक पैर सुमेरु पर्वत पर रखा, तो दूसरा पैर मानुषोत्तर पर्वत पर। तीसरा पैर रखने की जगह ही न थी। सर्वत्र हाहाकार मच गया। बलि ने जब क्षमा याचना की, तब जाकर वे पूर्ववत हुए। इस तरह सात सौ मुनियों की रक्षा हुई। सभी ने परस्पर रक्षा करने के लिए बंधन बांधा।
राखी के त्योहार का ज्यादा महत्व पहले उत्तर भारत में था। आज यह पूरे भारत में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इसे नारली पूर्णिमा के नाम से मनाया जाता है। लोग समुद्र में वरुण राजा को नारियल दान करते हैं। नारियल की तीन आंखों को भगवान शिव की तीन आंखें मानते हैं। दक्षिण भारत में इसे अवनी अविट्टम के नाम से जाना जाता है।
रक्षाबंधन का ऐतिहासिक महत्व- कहते हैं, सिकंदर की पत्नी ने अपने पति के हिंदू शत्रु पुरु को राखी बांधकर उसे अपना भाई बनाया था और युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन लिया था। पुरु ने युद्ध के दौरान हाथ में बंधी राखी का और अपनी बहन को दिए हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवनदान दिया था।
रविंद्र नाथ टैगोर ने दिया नया नजरिया- गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने राखी के पर्व को एकदम नया अर्थ दे दिया। उनका मानना था कि राखी केवल भाई-बहन के संबंधों का पर्व नहीं, बल्कि यह इंसानियत का पर्व है। विश्व कवि रवींद्रनाथ जी ने इस पर्व पर बंग-भंग के विरोध में जनजागरण किया था और इस पर्व को एकता और भाईचारे का प्रतीक बनाया था। 1947 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जनजागरण के लिए भी इस पर्व का सहारा लिया गया। इसमें कोई संदेह नहीं कि रिश्तों से ऊपर उठकर रक्षाबंधन की भावना ने हर समय और जरूरत पर अपना रूप बदला है। जब जैसी जरूरत रही, वैसा अस्तित्व उसने अपना बनाया। जरूरत होने पर हिंदू स्त्री ने मुसलमान भाई की कलाई पर इसे बांधा तो सीमा पर हर स्त्री ने सैनिकों को राखी बांधकर उन्हें भाई बनाया। राखी देश की रक्षा, पर्यावरण की रक्षा, हितों की रक्षा आदि के लिए भी बांधी जाने लगी है। इस नजरिये से देखें तो एक अर्थ में यह हमारा राष्ट्रीय पर्व बन गया है।
रक्षा बंधन पर्व मनाने की विधि- रक्षा बंधन के दिन सुबह भाई-बहन स्नान करके भगवान की पूजा करते हैं। इसके बाद रोली, अक्षत, कुमकुम एवं दीप जलाकर थाल सजाते हैं। इस थाल में रंग-बिरंगी राखियों को रखकर उसकी पूजा करते हैं, फिर बहनें भाइयों के माथे पर कुमकुम, रोली एवं अक्षत से तिलक करती हैं। इसके बाद भाई की दाहिनी कलाई पर रेशम की डोरी से बनी राखी बांधती हैं और मिठाई से भाई का मुंह मीठा कराती हैं। राखी बंधवाने के बाद भाई बहन को रक्षा का आशीर्वाद एवं उपहार व धन देता है। बहनें राखी बांधते समय भाई की लंबी उम्र एवं सुख तथा उन्नति की कामना करती हैं। इस दिन बहनों के हाथ से राखी बंधवाने से भूत-प्रेत एवं अन्य बाधाओं से भाई की रक्षा होती है। जिन लोगों की बहनें नहीं हैं, वह आज के दिन किसी को मुंहबोली बहन बनाकर राखी बंधवाएं तो शुभ फल मिलता है। इन दिनों चांदी एवं सोने की राखी का प्रचलन भी काफी बढ़ गया है। चांदी एवं सोना शुद्ध धातु माना जाता है, अतः इनकी राखी बांधी जा सकती है, लेकिन इनमें रेशम का धागा लपेट लेना चाहिए।
आज बहुत जरूरत है दायित्वों से बंधी राखी का सम्मान करने की। क्योंकि राखी का रिश्ता महज कच्चे धागों की परंपरा नहीं है। लेन-देन की परंपरा में प्यार का कोई मूल्य भी नहीं है। बल्कि जहां लेन-देन की परंपरा होती है, वहां प्यार तो टिक ही नहीं सकता। कथाएं बताती हैं कि पहले खतरों के बीच फंसी बहन का साया भी जब भाई को पुकारता था, तो दुनिया की हर ताकत से लड़कर भी भाई उसे सुरक्षा देने दौड़ पड़ता था और उसकी राखी का मान रखता था। यदि अपवादों को छोड़ दें, तो अब सामान्यतः यह स्नेह-संबंध भी पहले जैसा नहीं रहा। इस दौर में आदमी मानवीय संबंधों से कटता और अपने में सिमटता जा रहा है। उस पर उपभोक्तावादी संस्कृति हावी हो रही है। पैसा अब प्रमुख हो गया है और वह संबंधों के निर्वाह पर भी अपना असर छोड़ता है। भाई-बहन के संबंधों में भी यही बात है। दोनों की ही दृष्टि अर्थ और स्वार्थ पर गड़ी रहती है। थोड़ी-सी सावधानी और समझदारी बरतकर दरकते-टूटते और बालू की तरह बिखरते रिश्तों को बचाया जा सकता है। उनमें पहले जैसा प्यार लाया जा सकता है। भाई-बहन के रिश्ते ही क्यों, पिता, पुत्र, चाचा, ताऊ, मित्र, पड़ोसी आदि लोगों के साथ भी जो रिश्ते होते हैं, उन्हें भी कड़वाहट की जगह, मिठास में पाला जा सकता है। जरूरत है 'मैं और तुम' की जगह 'हम' की भावना पैदा करें। खुशियां बांटने से ही खुशियां मिलती हैं।
अगर जीवन में पारम्परिक संबंधों के प्रति हमारा तनाव रहित सुखद लगाव है, मन में उल्लास का, उत्साह का भाव है और फलतः जीने की चाह है, तो त्योहार भी महज खानापूरी न होकर हमें सचमुच त्योहार जैसे लगेंगे और अपनी सार्थकता को सिद्ध करेंगे। हर लड़की किसी की बहन होती है और राखी का फर्ज निभाने के लिए हर लड़की की सुरक्षा करना आवश्यक है। जब समाज में हर व्यक्ति ऐसा सोचेगा, तभी हर बहन सुरक्षित होगी और लड़कियों के लिए एक स्वस्थ समाज का निर्माण हो पाएगा। क्या राखी का त्योहार मनाने मात्र से हम अपनी बहनों को सुरक्षित रख पाएंगे? चारु सक्सेना
आप सभी से मेरा इस राखी पर यही अनुरोध है कि आप रक्षाबंधन मनाएं ही नहीं, निभाएं भी। रक्षाबंधन की आप सभी को हार्दिक बधाइयां।

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