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Bhopal *उत्तरवाहिनी गंगा का जल,वैद्यनाथ की कृपा और लोक आस्था का महासंगम देवघर का श्रावणी मेला* *The water of the north flowing Ganga, the blessings of Vaidyanath and the grand confluence of folk faith, the Shravan Mela of Deoghar*

 


Upgrade Jharkhand News.  श्रावण का महीना भगवान शिव की आराधना का महीना है। सावन की रिमझिम फुहारों के साथ जब धरती हरियाली की चादर ओढ़ती है, तब बिहार और झारखंड का एक बड़ा भूभाग बोल बम और हर-हर महादेव के जयघोष से गूंज उठता है। देश के विभिन्न हिस्सों और पड़ोसी नेपाल से हजारों कांवरिया सुल्तानगंज पहुंचते हैं। यहां उत्तरवाहिनी गंगा से जल लेकर,नंगे पांव देवघर स्थित बाबा वैद्यनाथ के द्वादश ज्योतिर्लिंग पर अर्पित करने के लिए 110 किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हैं। सुल्तानगंज से देवघर तक फैली यह यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोक-आस्था, अनुशासन, सामुदायिक सहभागिता और सांस्कृतिक निरंतरता का अद्भुत संगम है। पूरे श्रावण मास में यह 110 किलोमीटर लंबा मार्ग एक विराट महामेले का रूप ले लेता है। पिछले वर्ष इस मेले में लगभग 50 लाख श्रद्धालुओं के शामिल होने का उल्लेख मिलता है और इस वर्ष करीब 60 लाख श्रद्धालुओं के आने का अनुमान है।


देवघर का वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रतिष्ठित है। पौराणिक मान्यता के अनुसार लंकापति रावण ने इसकी स्थापना की थी, इसलिए इसे रावणेश्वर वैद्यनाथ भी कहा जाता है। श्रद्धालुओं की आस्था है कि निर्मल मन से बेलपत्र, पुष्प और उत्तरवाहिनी गंगा का जल अर्पित करने से बाबा वैद्यनाथ प्रसन्न होते हैं और मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इसी विश्वास ने सदियों से इस यात्रा को जनजीवन का हिस्सा बनाए रखा है।  भगवान शिव को जल प्रिय माना गया है और सुल्तानगंज में गंगा उत्तरवाहिनी हो जाती हैं। धार्मिक दृष्टि से उत्तरवाहिनी गंगा का विशेष महत्व है। इसी कारण सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर देवघर में बाबा वैद्यनाथ को अर्पित करने की परंपरा को विशेष पवित्रता प्राप्त हुई है। ऐसी मान्यता भी है कि भगवान श्रीराम ने सर्वप्रथम सुल्तानगंज से जल लेकर वैद्यनाथ धाम में अर्पित किया था। ऐतिहासिक प्रमाणों से अलग यह लोकविश्वास आज भी कांवड़ यात्रा की आस्था का महत्वपूर्ण आधार है।


सावन शुरू होते ही सुल्तानगंज में देश के विभिन्न भागों से शिवभक्तों का पहुंचना शुरू हो जाता है। बिहार के भागलपुर, मुंगेर और बांका तथा झारखंड के देवघर और दुमका जिलों से होकर कांवरिया मार्ग गुजरता है। इस पूरे मार्ग पर राज्य सरकारों और जिला प्रशासन के सामने श्रद्धालुओं की सुविधा, सुरक्षा, चिकित्सा, पेयजल, स्वच्छता, आवासन और परिवहन की बड़ी जिम्मेदारी होती है। प्रशासनिक व्यवस्था के समानांतर स्थानीय समाज भी अपने स्तर पर कांवरियों की सेवा में जुट जाता है। जगह-जगह सेवा शिविर, भोजन, पानी और चिकित्सा की व्यवस्था लोक सहभागिता का उदाहरण बनती है। सुल्तानगंज पहुंचने वाला कांवरिया सबसे पहले उत्तरवाहिनी गंगा में स्नान करता है। इसके बाद कांवर की सजावट और पूजा होती है तथा अजगैबीनाथ महादेव के दर्शन के बाद देवघर की यात्रा आरंभ होती है। कंधे पर कांवर, पैरों में यात्रा की थकान और होंठों पर बोल बम का उद्घोष,यह दृश्य इस यात्रा की विशिष्ट पहचान है। सुल्तानगंज से देवघर के रास्ते में असरगंज, कुमरसार, जिलेबिया, अबरखा, इनारावरण और गोड़ियारी जैसे पड़ाव आते हैं। आगे पहाड़ी गोड़ियारी नदी पार कर कांवरिया झारखंड की सीमा में प्रवेश करते हैं। वहां से देवघर की दूरी लगभग 17 किलोमीटर रह जाती है। बाबा वैद्यनाथ पर गंगाजल चढ़ाने के साथ कांवड़ यात्रा पूर्ण होती है।


सामान्य कांवरिया तीन से चार दिनों में यह दूरी तय करते हैं। रास्ते में विश्राम करते हुए वे आगे बढ़ते हैं। लेकिन कुछ श्रद्धालु बिना रुके दौड़ते हुए चौबीस घंटे के भीतर यात्रा पूरी करते हैं। ऐसे श्रद्धालु डाक बम कहलाते हैं। उनके लिए यह यात्रा शारीरिक क्षमता, आस्था और संकल्प की कठिन परीक्षा भी होती है। इस मेले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां श्रद्धा किसी एक वर्ग, जाति या क्षेत्र तक सीमित नहीं रहती। अलग-अलग राज्यों, भाषाओं और सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले लोग एक ही धार्मिक अनुशासन में बंध जाते हैं। कांवरिया मार्ग पर एक-दूसरे की सहायता करना, पानी पिलाना, भोजन कराना और थके यात्रियों को विश्राम उपलब्ध कराना सामुदायिक जीवन की उस परंपरा को सामने लाता है, जो आधुनिक शहरों में धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही है। श्रावणी मेला इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह मनुष्य को प्रकृति के करीब ले जाता है। सुल्तानगंज की गंगा से शुरू होकर देवघर की शिवगंगा तक की यात्रा में खेत, बाग-बगीचे, नदी-नाले, पहाड़ और जंगल मिलते हैं। सावन की फुहारें यात्रा की कठिनाई को एक अलग ही सौंदर्य में बदल देती हैं। शहरी जीवन के शोर और प्रदूषण से दूर यह यात्रा शरीर को थकाती जरूर है, लेकिन मन को एक अलग तरह की शांति देती है।


इस यात्रा का एक सामाजिक और आर्थिक पक्ष भी है। लाखों श्रद्धालुओं के आने से मार्ग में बसे छोटे-छोटे कस्बों और गांवों की अर्थव्यवस्था को गति मिलती है। स्थानीय दुकानदार, परिवहनकर्मी, छोटे व्यापारी, भोजनालय, अस्थायी शिविर और सेवा संस्थाएं इससे जुड़ते हैं। इस अर्थ में श्रावणी मेला धार्मिक आयोजन होने के साथ-साथ एक बड़ा लोक-आर्थिक तंत्र भी बन जाता है।  हालांकि इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की आवाजाही पर्यावरण और प्रशासन के सामने गंभीर चुनौतियां भी पैदा करती है। प्लास्टिक कचरा, जलस्रोतों पर दबाव, स्वच्छता, यातायात और मार्ग की सुरक्षा जैसे प्रश्नों को केवल मेले के दौरान नहीं, बल्कि दीर्घकालिक योजना के तहत देखना होगा। लोक-आस्था और पर्यावरण संरक्षण को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय दोनों के बीच संतुलन बनाना समय की आवश्यकता है। श्रावणी मेला दरअसल भारतीय लोकजीवन की उस जीवंत परंपरा का प्रतीक है जिसमें धर्म केवल मंदिर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता। वह रास्तों पर उतरता है, लोकगीतों में गूंजता है, सेवा में दिखाई देता है और लाखों लोगों को एक साझा सांस्कृतिक अनुभव से जोड़ता है।


यहां श्रावणी मेला केवल एक धार्मिक मेला नहीं। यह बिहार और झारखंड की साझा सांस्कृतिक पहचान, लोक-आस्था और सामाजिक सहभागिता का विराट उत्सव है। कांवरिया के कदम भले ही देवघर की ओर बढ़ते हों, लेकिन यह यात्रा भारतीय समाज की उस सामूहिक चेतना की ओर भी जाती है, जहां आस्था मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है। शिव शंकर सिंह पारिजात



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