Upgrade Jharkhand News. 9 अगस्त 1945 मानव इतिहास की उन तारीखों में से है जिन्हें केवल कैलेंडर पर दर्ज घटना के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह वह दिन था जब विज्ञान की अभूतपूर्व शक्ति ने मानव सभ्यता के सामने अपनी सबसे भयावह संभावनाओं में से एक को प्रकट किया। सुबह 11 बजकर 2 मिनट पर अमेरिकी बी-29 विमान बॉकस्कार ने नागासाकी पर प्लूटोनियम आधारित परमाणु बम गिराया। बम का नाम फैट मैन था। नागासाकी उस समय जापान का एक महत्वपूर्ण औद्योगिक और बंदरगाह नगर था। 6 अगस्त को हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराए जाने के केवल तीन दिन बाद यह दूसरा परमाणु हमला था। नागासाकी नगर के आधिकारिक अभिलेखों के अनुसार दिसंबर 1945 तक परमाणु हमले से 73,884 लोगों की मृत्यु और 74,909 लोग घायल हुए थे। नागासाकी पर हमला द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम चरण की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी। इसके ठीक पहले 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा पर लिटिल बॉय नामक परमाणु बम गिराया गया था। 8 अगस्त को सोवियत संघ ने जापान के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की। 9 अगस्त की सुबह बॉकस्कार पहले लक्ष्य कोकुरा की ओर गया, लेकिन वहां धुएँ और बादलों के कारण लक्ष्य स्पष्ट नहीं हो सका। विमान ने दूसरे निर्धारित लक्ष्य नागासाकी की ओर रुख किया। बादलों में एक खुली जगह मिलने के बाद बम गिराया गया और 11:02 बजे विस्फोट हुआ। नागासाकी के आधिकारिक अभिलेख इस घटनाक्रम को दर्ज करते हैं।
उस एक क्षण में नागासाकी का एक बड़ा हिस्सा आग, अत्यधिक ताप, विस्फोटक दबाव और विकिरण की संयुक्त शक्ति से तबाह हो गया। परमाणु विस्फोट सामान्य बमबारी से बिल्कुल अलग और नया था। इसके प्रभाव केवल उस क्षण तक सीमित नहीं रहे जब विस्फोट हुआ। नागासाकी के आधिकारिक अभिलेख बताते हैं कि तत्काल मृत्यु और चोटों के पीछे विस्फोट की लहर और तापीय विकिरण के साथ-साथ गंभीर विकिरण-जनित चोटें भी महत्वपूर्ण थीं। बाद के वर्षों में परमाणु विकिरण से संबंधित अनेक स्वास्थ्य प्रभाव सामने आए, जिनमें कुछ प्रकार के कैंसर और अन्य दीर्घकालिक प्रभाव शामिल थे। नागासाकी की त्रासदी का सबसे महत्वपूर्ण मानवीय पक्ष यह है कि परमाणु हथियार युद्ध के मैदान और नागरिक जीवन के बीच की सीमा को लगभग समाप्त कर देता है। बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएँ, श्रमिक, विद्यार्थी और सामान्य नागरिक,किसी के पास स्वयं को बचाने का वास्तविक अवसर नहीं था। इसलिए नागासाकी को केवल अमेरिका और जापान के बीच युद्ध के इतिहास के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह मानव सभ्यता के सामने उपस्थित उस नैतिक प्रश्न का प्रतीक है कि क्या ऐसी तकनीकी क्षमता, जो कुछ क्षणों में एक शहर को तबाह कर सकती है, मानव सुरक्षा का साधन कही जा सकती है।
नागासाकी के अनुभव ने दुनिया को यह भी समझाया कि परमाणु हथियारों की समस्या केवल किसी एक देश की सुरक्षा का प्रश्न नहीं है। जब परमाणु हथियार अस्तित्व में आए तो उनके साथ परमाणु प्रतिस्पर्धा, हथियारों की दौड़, परीक्षणों, प्रसार और आकस्मिक या गलत आकलन से होने वाली तबाही का खतरा भी जुड़ गया। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने परमाणु हथियारों और परमाणु तकनीक के प्रसार को नियंत्रित करने के लिए अनेक संस्थागत और कानूनी व्यवस्थाएँ विकसित कीं। परमाणु अप्रसार संधि (NPT), परमाणु परीक्षणों को सीमित करने के प्रयास और विभिन्न द्विपक्षीय तथा बहुपक्षीय हथियार नियंत्रण समझौते इसी व्यापक प्रयास का हिस्सा रहे हैं। लेकिन 2026 में दुनिया के सामने चुनौती अभी समाप्त नहीं हुई है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के अनुसार जनवरी 2026 में दुनिया में अनुमानतः 12,187 परमाणु हथियार मौजूद थे। इनमें लगभग 9,745 सैन्य भंडार में संभावित उपयोग के लिए उपलब्ध माने गए और लगभग 4,012 तैनात थे। SIPRI के अनुसार नौ परमाणु सशस्त्र राज्यों ने 2025 में अपने परमाणु शस्त्रागारों के आधुनिकीकरण और विकास को जारी रखा। ये आँकड़े इस बात की याद दिलाते हैं कि नागासाकी की स्मृति केवल अतीत की स्मृति नहीं है, परमाणु हथियार आज भी मानव सभ्यता के सामने वास्तविक जोखिम हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि परमाणु हथियारों की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण उनका राजनीतिक और रणनीतिक वातावरण है। जब देशों के बीच अविश्वास बढ़ता है, संवाद कमजोर होता है और हथियारों पर निर्भरता बढ़ती है, तब दुर्घटना, गलत सूचना, तकनीकी त्रुटि या गलत राजनीतिक आकलन का खतरा भी बढ़ता है। फरवरी 2026 में अमेरिका और रूस के बीच न्यू स्टार्ट समझौते की अवधि समाप्त होने पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने इसे गंभीर क्षण बताया और कहा कि इससे पहली बार पांच दशकों से अधिक समय में दोनों देशों के रणनीतिक परमाणु शस्त्रागारों पर कोई बाध्यकारी सीमा नहीं रही। उन्होंने तत्काल नए सत्यापन योग्य हथियार नियंत्रण ढाँचे की आवश्यकता पर बल दिया। इसी पृष्ठभूमि में परमाणु हथियारों से मुक्त विश्व की मांग को केवल आदर्शवादी सपना मानना उचित नहीं है। संयुक्त राष्ट्र भी परमाणु हथियारों से मुक्त विश्व को अपने प्रमुख निरस्त्रीकरण लक्ष्यों में रखता है। 2026 की NPT समीक्षा बैठक किसी ठोस सर्वसम्मत परिणाम के बिना समाप्त हुई, और संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने परमाणु जोखिम घटाने, संवाद बढ़ाने तथा अंततः परमाणु खतरे को समाप्त करने के लिए तत्काल प्रयासों का आह्वान किया। परमाणु हथियारों के पूर्ण उन्मूलन का रास्ता आसान नहीं है। परमाणु-सशस्त्र देश सुरक्षा, प्रतिरोधक क्षमता और राष्ट्रीय संप्रभुता के तर्क प्रस्तुत करते हैं। उनके लिए एकतरफा निरस्त्रीकरण रणनीतिक जोखिम पैदा कर सकता है। इसलिए विश्व को केवल भावनात्मक अपील से आगे बढ़कर क्रमिक, पारस्परिक, सत्यापन योग्य और कानूनी रूप से बाध्यकारी निरस्त्रीकरण की दिशा में बढ़ना होगा। किसी एक देश से यह अपेक्षा करना कि वह अपनी सुरक्षा व्यवस्था बदल दे, जबकि दूसरे देश अपनी क्षमताएँ बनाए रखें, व्यावहारिक समाधान नहीं है। आवश्यकता ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की है जिसमें सुरक्षा सामूहिक हो और हथियारों पर निर्भरता धीरे-धीरे कम की जा सके।
इस दिशा में ट्रीटी ऑन द प्रोहिबिशन ऑफ न्यूक्लियर वेपन्स (TPNW) एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय पहल है। यह संधि 7 जुलाई 2017 को अपनाई गई और 22 जनवरी 2021 को प्रभावी हुई। संयुक्त राष्ट्र के संधि अभिलेख के अनुसार जुलाई 2026 तक इसके 95 हस्ताक्षरकर्ता और 75 पक्षकार थे। इसका उद्देश्य परमाणु हथियारों पर कानूनी प्रतिबंध स्थापित करना और उनके पूर्ण उन्मूलन की दिशा में आगे बढ़ना है। दूसरी ओर,कंप्रिहेन्सिव न्यूक्लियर टेस्ट बैन ट्रीटी (CTBT) अभी तक प्रभावी नहीं हुई है, क्योंकि इसके लागू होने के लिए आवश्यक सभी शर्तें पूरी नहीं हुई हैं। इससे स्पष्ट है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने रास्ता बनाया है, लेकिन उस रास्ते पर अभी बहुत दूरी तय करनी बाकी है। फिर भी परमाणु हथियारों से मुक्त विश्व की स्थापना केवल संधियों और सम्मेलनों से संभव नहीं होगी। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति की मूल प्राथमिकताओं में परिवर्तन आवश्यक है। आज दुनिया के अनेक हिस्सों में गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, अशिक्षा, स्वास्थ्य संकट, जलवायु परिवर्तन, जल-संकट और असमानता जैसी समस्याएँ करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे समय में मानव सभ्यता के संसाधनों का बड़ा हिस्सा ऐसी सैन्य क्षमताओं पर खर्च होना, जिनका वास्तविक उपयोग स्वयं सभ्यता के लिए विनाशकारी हो सकता है, गंभीर नैतिक प्रश्न पैदा करता है।
यहीं से जनकल्याण केंद्रित अंतरराष्ट्रीय समन्वित विकास की अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है। विश्व की सुरक्षा को केवल सीमाओं, मिसाइलों और सैन्य शक्ति से नहीं मापा जाना चाहिए। वास्तविक सुरक्षा वह है जिसमें प्रत्येक बच्चे को शिक्षा, प्रत्येक परिवार को भोजन, प्रत्येक नागरिक को स्वास्थ्य सुविधा, प्रत्येक युवा को रोजगार और प्रत्येक समुदाय को सम्मानजनक जीवन का अवसर मिले। यदि किसी देश के नागरिक भूख, बीमारी, बेरोजगारी और असमानता से जूझ रहे हों, तो केवल परमाणु हथियारों की मौजूदगी उस समाज को सुरक्षित नहीं बना सकती। इसलिए विश्व को सुरक्षा की अपनी परिभाषा बदलनी होगी मिलिट्री सिक्योरिटी से ह्यूमन सिक्योरिटी की ओर। अंतरराष्ट्रीय सहयोग का लक्ष्य यह होना चाहिए कि रक्षा प्रतिस्पर्धा को विकास प्रतिस्पर्धा में बदला जाए। जिन संसाधनों का उपयोग हथियारों के निर्माण, रखरखाव और आधुनिकीकरण में होता है, उनका एक हिस्सा शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छ ऊर्जा, जल प्रबंधन, खाद्य सुरक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग में लगाया जा सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि सभी देशों की सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज कर दिया जाए बल्कि यह कि सुरक्षा को व्यापक मानवीय संदर्भ में पुनर्परिभाषित किया जाए। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय संस्थाओं को अधिक प्रभावी बनाया जाना आवश्यक है।
परमाणु-सशस्त्र और गैर-परमाणु देशों के बीच संवाद को संस्थागत रूप देना होगा। परमाणु हथियारों की संख्या, तैनाती और जोखिम संबंधी जानकारी में पारदर्शिता बढ़ानी होगी। संकट के समय सीधे संवाद के लिए स्थायी संचार तंत्र मजबूत करने होंगे। परमाणु हथियारों के आकस्मिक या अनधिकृत उपयोग को रोकने के उपायों को मजबूत करना होगा। साथ ही परमाणु परीक्षणों और हथियारों के प्रसार को रोकने वाले वैश्विक मानदंडों को अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है लेकिन अंतरराष्ट्रीय शांति का सबसे मजबूत आधार केवल सरकारें नहीं, बल्कि विश्व के नागरिक भी हैं। नागासाकी के बचे हुए लोगों,हिबाकुशा की स्मृतियाँ इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उनकी गवाही यह बताती है कि परमाणु युद्ध का वास्तविक अर्थ रणनीतिक दस्तावेजों की भाषा से कहीं अधिक भयावह होता है। नागासाकी का आधिकारिक शांति कार्यक्रम भी आने वाली पीढ़ियों तक परमाणु हमले के अनुभव को पहुँचाने और विश्व शांति की दिशा में सामूहिक प्रयास की आवश्यकता पर बल देता है। आज की पीढ़ी के सामने इसलिए दो रास्ते हैं। पहला रास्ता भय, अविश्वास, हथियारों की प्रतिस्पर्धा और सुरक्षा की संकीर्ण अवधारणा का है। दूसरा रास्ता संवाद, पारस्परिक विश्वास, निरस्त्रीकरण, मानव सुरक्षा और साझा विकास का है। पहला रास्ता कुछ देशों को अल्पकालिक रणनीतिक लाभ का भ्रम दे सकता है, लेकिन उसकी अंतिम सीमा विनाश है। दूसरा रास्ता कठिन और धीमा अवश्य है, लेकिन उसकी मंजिल मानव जीवन की सुरक्षा और सभ्यता की निरंतरता है। नागासाकी हमें यह सिखाता है कि विज्ञान स्वयं न अच्छा है, न बुरा,उसकी दिशा मनुष्य की राजनीतिक और नैतिक पसंद तय करती है। वही परमाणु विज्ञान ऊर्जा, चिकित्सा, कृषि और वैज्ञानिक अनुसंधान में मानव कल्याण में योगदान दे सकता है, जबकि हथियार के रूप में वही ज्ञान विनाश का माध्यम बन सकता है।
अंतरराष्ट्रीय परमाणु व्यवस्था के विकास का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य भी यही रहा है कि परमाणु विज्ञान के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देते हुए हथियारों के प्रसार और जोखिम को नियंत्रित किया जाए इसलिए 9 अगस्त केवल नागासाकी के मृतकों को श्रद्धांजलि देने का दिन नहीं होना चाहिए। यह विश्व समुदाय से एक सामूहिक प्रश्न पूछने का दिन होना चाहिए कि क्या मानव सभ्यता अपनी सुरक्षा के लिए ऐसे हथियारों पर निर्भर रह सकती है जिनका बड़े पैमाने पर उपयोग मानव सभ्यता के अस्तित्व को ही संकट में डाल सकता है? नागासाकी की राख से उठने वाला संदेश स्पष्ट है मानवता को अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों को विनाश की प्रतिस्पर्धा से निकालकर जीवन के निर्माण की दिशा में लगाना होगा। दुनिया को ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की ओर बढ़ना होगा जिसमें शक्ति का अंतिम पैमाना हथियारों की संख्या नहीं, बल्कि लोगों की खुशहाली हो, राष्ट्रों की प्रतिष्ठा सैन्य क्षमता से नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान, पर्यावरण और मानवीय विकास में योगदान से तय हो और सुरक्षा का अर्थ भय पैदा करना नहीं, बल्कि भय को समाप्त करना हो। परमाणु हथियारों से मुक्त विश्व कोई केवल नैतिक कल्पना नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व की दीर्घकालिक आवश्यकता है। इसके लिए एक दिन में कोई चमत्कार नहीं होगा। लेकिन यदि राष्ट्र निरस्त्रीकरण, संवाद, सत्यापन, विश्वास-निर्माण और जनकल्याण केंद्रित विकास को अपनी साझा प्राथमिकता बनाएं, तो नागासाकी की त्रासदी को केवल अतीत का दुःख नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक निर्णायक चेतावनी बनाया जा सकता है। दुनिया को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें विज्ञान जीवन बचाए,अर्थव्यवस्था जीवन सुधारे,राजनीति शांति बनाए और अंतरराष्ट्रीय सहयोग प्रत्येक मनुष्य को बेहतर भविष्य देने का माध्यम बने।
नागासाकी की सबसे बड़ी पुकार यही है मानवता को ऐसी शक्ति नहीं चाहिए जो पूरी दुनिया को नष्ट कर सके, मानवता को ऐसी साझा शक्ति चाहिए जो पूरी दुनिया को बेहतर बना सके। डॉ. शैलेश शुक्ला

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