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Chaibasa जल, जंगल और जमीन पर संवैधानिक अधिकारों के लिए आज भी संघर्ष कर रहे हैं आदिवासी Tribals are still fighting for constitutional rights over water, forest and land.

 


  • 9 अगस्त अंतर्राष्ट्रीय विश्व आदिवासी दिवस पर विशेष

Upgrade Jharkhand News.  अंतर्राष्ट्रीय विश्व आदिवासी दिवस इस धरती के मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा, उनके संरक्षण और उनके योगदान के सम्मान के लिए समर्पित है। विश्वभर के मूल निवासियों के मानवाधिकारों की रक्षा करना और उनकी अनूठी सांस्कृतिक पहचान तथा पर्यावरण संरक्षण में उनके योगदान को मान्यता देना है। भारत की कुल आबादी में लगभग 8.6 प्रतिशत आदिवासी हैं, लेकिन विकास परियोजनाओं और वनों के दोहन के कारण हो रहे विस्थापन में उनका अनुपात लगभग 40 प्रतिशत तक है। विकास परियोजनाओं, खनन, बांध, परमाणु परियोजनाओं, औद्योगिक कॉरिडोर और वन संरक्षण के नाम पर सबसे अधिक विस्थापन का बोझ इन्हीं समुदायों ने उठाया है। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और पूर्वोत्तर राज्यों के आदिवासी आज भी जल, जंगल और जमीन पर अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जल, जंगल और जमीन से बेदखल होकर ये समुदाय शहरों और बाहरी इलाकों में सस्ते मजदूर  बनने को मजबूर हो जाते हैं। अपने देवस्थलों, पैतृक जमीनों और समुदाय से दूर होने के बाद वे अपनी पारंपरिक पहचान खोने लगते हैं। विस्थापितों के बच्चे अक्सर शिक्षा से वंचित हो जाते हैं। नई जगहों पर कुपोषण, आधारभूत स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। सरकारी मुआवजा अक्सर नाकाफी होता है और सही पुनर्वास के अभाव में विस्थापित परिवार शरणार्थी जैसा जीवन जीने को विवश हैं।


आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल, पोषण और संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी आज भी गंभीर चुनौती बनी हुई है। कुपोषण,मातृ एवं शिशु मृत्यु दर, मलेरिया, सिकल सेल एनीमिया तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव आदिवासी समाज के विकास में बड़ी बाधाएं हैं। युवाओं में बेरोज़गारी और पलायन लगातार बढ़ रहा है। मध्यप्रदेश में विस्थापन की मार झेल रहे आदिवासियों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति अत्यंत चिंताजनक और हाशिए पर है। राज्य की कुल आबादी का लगभग 21.1 प्रतिशत  आदिवासी है, जो देश में सबसे अधिक है, लेकिन सिंचाई परियोजनाओं (जैसे नर्मदा घाटी परियोजनाएं), खनन और वन्यजीव अभ्यारण्यों के कारण इन्हें बार-बार विस्थापन का दंश झेलना पड़ता है। विस्थापन के कारण आदिवासियों का जंगलों और कृषि से सदियों पुराना नाता टूट जाता है। इमारती लकड़ी, औषधीय पौधे और लघु वनोपज से मिलने वाला रोजगार समाप्त हो जाता है। वन क्षेत्रों और कृषि भूमि के छिनने के बाद मिलने वाला मौद्रिक मुआवजा अक्सर अपर्याप्त होता है। पैसे के सही प्रबंधन और आधुनिक अर्थव्यवस्था की जानकारी न होने से वे पीढ़ियों तक गरीबी चक्र में फंसे रहते हैं। जंगलों और प्रकृति के नजदीक रहने वाले यह आदिवासी विकास होने पर अपनी जगह से खदेड़ दिये जाते हैं, जो किसी भी गांव या शहरों के जनजीवन से सामंजस्य मिला पाने में पूरी तरह विफल रहते हैं क्योंकि इनकी अपनी जीवनशैली है, खान-पान और रहने का एक अलग सलीका है। अपनी जगह से उजड़ने के बाद वनों में उपलब्ध विविधतापूर्ण प्राकृतिक भोजन की जगह शहरों के कम पोषक तत्वों वाली आहार ने ले ली है।  विभिन्न   रिपोर्टों के अनुसार, मध्यप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लगभग 58.58 प्रतिशत आदिवासी परिवार गरीबी रेखा  के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। आदिवासी समाज को आम तौर पर आर्थिक रूप से कमजोर माना जाता है, लेकिन उस प्रक्रिया का कोई अध्ययन ही नहीं होता जिसके परिणामस्वरूप उसे गरीबी के अंधेरे में धकेला गया। उनके आर्थिक पिछड़ेपन के अध्ययनों ने उनकी अर्थव्यवस्था और स्वायत्तता को समझने का कोई प्रयास ही नहीं किया। आदिवासियों की अपनी जीवन-शैली, दर्शन, इतिहास, भाषा, साहित्य और चिंतन है, इस पर कोई गौर ही नहीं किया गया।


इसी नासमझी के परिणामस्वरूप आदिवासियों को कथित मुख्यधारा में जोड़ने की अवधारणा विकसित हुई।आज सभी आदिवासियों का विकास करना चाहते हैं, लेकिन कोई उनसे नहीं पूछता कि क्या वे विकास की इस अंधी दौड़ में शामिल होना भी चाहते हैं या नहीं। यूं तो विकास प्रकृति का स्वाभाविक नियम है, लेकिन यहां हम विकास के पीछे छिपी पूंजीवादी ताकतों के एजेंडे की बात कर रहे हैं। पूंजीवादी प्रणाली में उत्पादन और वितरण सामाजिक समानता, न्याय और पर्यावरण की सुरक्षा की बजाय निजी मुनाफे से संचालित होती है। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और विनाश पर अधारित विकास के कारण उन समुदायों को विस्थापित होना पड़ता है जो इन संसाधनों पर निर्भर हैं। देश और प्रदेश में विकास का मॉडल विस्थापन विहीन विकास पर आधारित होना चाहिए। सरकार को भूरिया समिति की अनुशंसाओं को पूरी तरह लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए। मध्यप्रदेश में वर्ष 1998–99 में भूरिया समिति के ढांचे को स्वीकार किया गया था। इस ढांचे के अनुसार अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की केंद्रीय भूमिका सुनिश्चित की गई है तथा ग्राम सभा की सहमति के बिना भूमि का हस्तांतरण या अधिग्रहण नहीं किया जा सकता। सरकार द्वारा अनुसूचित क्षेत्रों में किया जाने वाला कोई भी विकास कार्य ग्राम सभा की पूर्व सहमति के बाद ही आगे बढ़ाना चाहिए। विकास की ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जिसमें स्थानीय लोगों की भागीदारी और अधिकार सुनिश्चित हों। अब केवल विकास करते रहना ही जरूरी नहीं है, बल्कि अब विकास और विकास नीतियों की समीक्षा जरूरी है।  संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1986 में विकास के अधिकार की उदघोषणा तैयार की,जिस पर भारत सहित अनेक राष्ट्रों ने हस्ताक्षर किए हैं । इस संधि के अनुसार विकास सभी नागरिकों का अधिकार है।


विकास परियोजना के लिए तीन मापदंड निर्धारित किये गए हैं, (1)प्रभावित व्यक्तियों की सहमति, (2)परियोजना में निर्मित संसाधन के लाभ में हिस्सेदारी तथा (3)विकास के प्रभावितों का आजीविका के संसाधनों पर अधिकार। वर्ष 2007 में आदिवासी समुदायों के अधिकारों का संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषणा पत्र जारी किया गया, जिसमें आजीविका के संसाधनों पर जनजातीय समाज के अधिकार सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण प्रावधान है। दुर्भाग्य से भारत में इन किसी भी अन्तराष्ट्रीय संधियों का अनुसरण नहीं किया जाता है। प्राकृतिक संसाधनों का जो दोहन हो रहा है, वह समाज- मानवता के लिये दीर्घकालीन संकट पैदा कर रहा है, उस पर भी उसका लाभ समाज और देश को नहीं हो रहा है। उस दोहन से देश के बड़े घराने अपनी हैसियत ऐसी बना रहे हैं कि वे समाज को अपना आर्थिक उपनिवेश बना सकें ।इसमें वो सफल भी हो रहे हैं । दूसरी ओर आर्थिक उपनिवेश बनते समाज को विकास होने का अहसास करवाने के लिए सरकार द्वारा और ज्यादा कर्जे लिए जा रहे हैं। आर्थिक विकास की मौजूदा परिभाषा बहुत गहरे तक उलझाती है। यह पहले उम्मीद और अपेक्षाएं बढ़ाती है, फिर उन्हे पूरा करने के लिए समाज के बुनियादी आर्थिक ढांचे पर समझौता करवाती है, शर्ते रखती है और समाज के संसाधनों पर एकाधिकार मांगती है।आदिवासी क्षेत्रों के लिए विशेष आर्थिक प्रावधानों में भी काफी गड़बड़ी देखने को मिलती है। जैसे आदिवासी उपयोजना की राशि को गैर आदिवासी क्षेत्रों में खर्च किया जाना।इसलिए आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं जैसे स्कूल, अस्पताल, सड़क,पेयजल,  सिंचाई साधनों की व्यवस्था लचर है। सबसे अधिक आदिवासियों वाला राज्य होने के बाद भी देश में सबसे अधिक अपराध आदिवासियों के ऊपर मध्यप्रदेश में होते है। सर्वाधिक निर्दोष आदिवासी मध्यप्रदेश में जेल के अंदर हैं,क्योंकि उनके पास न्यायालय जाने का आर्थिक माद्दा नहीं है।आदिवासी क्षेत्र के बच्चो में कुपोषण की मात्रा अधिक है। वहीं मानव तस्करी भी काफी बढ़ी है। इस विकास के नए मॉडल ने आदिवासी समाज को विकास का सहभागी बनाने के बजाय सबसे अधिक विस्थापन, गरीबी, कुपोषण, बेरोजगारी और सांस्कृतिक विघटन का शिकार बनाया है। जल, जंगल और जमीन से उनका रिश्ता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि उनकी पहचान, संस्कृति और अस्तित्व का आधार है। इसलिए विकास का मूल्यांकन केवल आर्थिक वृद्धि, जीडीपी या बड़े निवेशों से नहीं, बल्कि इस आधार पर होना चाहिए कि उससे सबसे कमजोर और प्रभावित समुदायों के जीवन में कितना न्याय, सम्मान और सुरक्षा सुनिश्चित हुई है। भारत के संविधान, पाँचवीं अनुसूची, पेसा कानून, वनाधिकार कानून तथा संयुक्त राष्ट्र की विकास के अधिकार (1986) और आदिवासी अधिकार घोषणा (2007) जैसी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं की भावना के अनुरूप विकास परियोजनाओं में प्रभावित समुदायों की पूर्व सहमति, संसाधनों के लाभ में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी और आजीविका के अधिकार को अनिवार्य रूप से सुनिश्चित किया जाना चाहिए। 


अब समय आ गया है कि विकास नीतियों की गंभीर समीक्षा कर ऐसा मॉडल अपनाया जाए जो प्रकृति के संरक्षण, सामाजिक न्याय और आदिवासी समुदायों के अधिकारों के सम्मान पर आधारित हो। यही समावेशी, लोकतांत्रिक और टिकाऊ विकास की वास्तविक दिशा होगी। विश्व आदिवासी दिवस पर अक्सर आदिवासी नृत्य, वेशभूषा और संस्कृति का प्रदर्शन तो होता है, लेकिन उनके भूमि अधिकार, विस्थापन, आजीविका, प्राकृतिक संसाधनों पर स्वामित्व, पर्यावरणीय न्याय और संवैधानिक अधिकारों जैसे मूल प्रश्न सार्वजनिक विमर्श से गायब रहते हैं। इसलिए विश्व आदिवासी दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन और जवाबदेही का दिन होना चाहिए। आदिवासी विकास का अर्थ केवल योजनाओं की घोषणा नहीं, बल्कि संविधान प्रदत्त अधिकारों का वास्तविक क्रियान्वयन, ग्राम सभाओं का सम्मान, जल-जंगल-जमीन की रक्षा, सम्मानजनक पुनर्वास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा-स्वास्थ्य और आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। जब तक विकास की नीतियों में आदिवासी समुदायों की भागीदारी, सहमति और अधिकारों को केंद्र में नहीं रखा जाएगा, तब तक विश्व आदिवासी दिवस का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा। राजकुमार सिन्हा



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