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Bhopal विश्वकर्मा : सृजन, शिल्प और श्रम की भारतीय परंपरा Vishwakarma: The Indian Tradition of Creation, Craft and Labour

 


Upgrade Jharkhand News.  भारत में कुछ पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते, वे किसी सभ्यता की मूल चेतना को अभिव्यक्त करते हैं। विश्वकर्मा पूजा ऐसा ही पर्व है। यह केवल औजारों, मशीनों, कारखानों और निर्माण-स्थलों की पूजा का दिन नहीं, बल्कि उस भारतीय दृष्टि का उत्सव है जिसमें सृजन को साधना, श्रम को सम्मान और कौशल को संस्कृति माना गया है। धार्मिक परंपरा में भगवान विश्वकर्मा को देवशिल्पी कहा गया है। देवताओं के वास्तुकार, निर्माण-कला के आचार्य और शिल्पविद्या के आदिगुरु। पौराणिक मान्यताओं में उन्हें दिव्य नगरों, भवनों, विमानों और अनेक अद्भुत संरचनाओं के निर्माता के रूप में स्मरण किया जाता है। पुष्पक विमान, इंद्रपुरी, त्रेतायुग की लंका, द्वापरयुग की द्वारका और हस्तिनापुर जैसी रचनाओं का संबंध भी धार्मिक आख्यानों में विश्वकर्मा से जोड़ा गया है। वास्तुशास्त्र, यंत्र-निर्माण, धातु-कर्म और विविध शिल्पकलाओं की परंपरा भी उनके नाम से जुड़ी हुई है। इन कथाओं का ऐतिहासिक मूल्य अलग-अलग हो सकता है, लेकिन उनका सांस्कृतिक अर्थ अत्यंत गहरा है। वे यह बताती हैं कि भारतीय मानस ने निर्माण और तकनीकी कौशल को कभी केवल भौतिक गतिविधि नहीं माना। सृजन स्वयं एक साधना था और शिल्पी केवल मजदूर नहीं, सृष्टि के सह-रचनाकार की तरह देखा जाता था। विश्वकर्मा पूजा इसी चेतना को आज के औद्योगिक और तकनीकी युग से जोड़ती है।


इस परंपरा की एक अद्भुत कड़ी देवघर के बाबा बैद्यनाथ धाम से जुड़ती है। धार्मिक विश्वास है कि बाबा बैद्यनाथ धाम के मंदिर और परिसर के कुछ प्रमुख मंदिरों के निर्माण का संबंध देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा से है। मंदिर के विश्वकर्मा-निर्मित होने की मान्यता आज भी प्रचलित है। सरकारी पर्यटन विवरण भी इस लोकविश्वास का उल्लेख करता है और मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के साथ अन्य अनेक मंदिरों की उपस्थिति बताता है। देवघर की लोककिंवदंती इस विश्वास को और रोचक बना देती है। कहा जाता है कि एक बार भगवान विश्वकर्मा पुष्पक विमान से आकाश मार्ग में भ्रमण कर रहे थे। तभी उनकी दृष्टि रावण द्वारा स्थापित पावन ज्योतिर्लिंग पर पड़ी। उन्होंने इस पवित्र स्थल पर एक ही रात में पांच दिव्य मंदिरों के निर्माण का संकल्प लिया। मान्यता के अनुसार, सबसे पहले भगवान शिव का मंदिर बना। उसके बाद माता पार्वती, भगवान गणेश और संध्या मंदिर का निर्माण हुआ। इसके पश्चात विश्वकर्मा अपने लिए सबसे भव्य मंदिर बनाने लगे।   


अब देवताओं के सामने प्रश्न था कि यदि विश्वकर्मा का मंदिर बाबा बैद्यनाथ के मंदिर से भी अधिक भव्य हो गया तो? लोककथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने मुर्गे का रूप धारण किया और समय से पहले ही बांग दे दी। मुर्गे की आवाज सुनकर विश्वकर्मा को लगा कि भोर हो चुकी है। एक रात में निर्माण पूरा करने का उनका संकल्प अधूरा रह गया और उनका अपना मंदिर अधूरा ही रह गया। लोकमान्यता में इसे आज लक्ष्मी नारायण मंदिर से जोड़ा जाता है। एक अन्य कथा में नारद मुनि द्वारा भगवान शिव को यह बताए जाने का प्रसंग आता है कि विश्वकर्मा उनसे भी अधिक भव्य मंदिर का निर्माण कर रहे हैं। कथा के अनुसार, भगवान शिव ने अपने बाएं पैर के अंगूठे से उस मंदिर को दबा दिया। इसलिए उसका स्वरूप आज भी कुछ झुका और अधूरा दिखाई देता है।           इन कथाओं को इतिहास के दस्तावेज के रूप में नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही लोकआस्था और धार्मिक स्मृति के रूप में देखना चाहिए। देवघर का महत्व केवल स्थापत्य में नहीं है। यह वह भूमि है जहां रावण, शिव, विष्णु और विश्वकर्मा से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएं एक-दूसरे में गुंथी हुई हैं। बैद्यनाथ धाम की मुख्य ज्योतिर्लिंग कथा भी रावण, शिव और विष्णु से जुड़ी हुई है। यही कारण है कि देवघर में विश्वकर्मा की स्मृति केवल निर्माण की कथा नहीं है,वह आस्था और स्थापत्य के मिलन का प्रतीक  है।


यदि देवघर विश्वकर्मा की धार्मिक और स्थापत्य स्मृति को सामने लाता है, तो अंग जनपद उनकी परंपरा के सामाजिक और कर्मशील पक्ष को समझने का एक व्यापक सांस्कृतिक क्षेत्र प्रदान करता है।अंग की धरती प्राचीन काल से ही व्यापार, कृषि, शिल्प और विविध प्रकार के कर्म से जुड़ी रही है। यहां की लोकसंस्कृति में श्रम और कौशल जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। धातु-कर्म से लेकर हस्तशिल्प तक, निर्माण से लेकर कृषि उपकरणों तक, मनुष्य के हाथ और उसकी तकनीकी बुद्धि ने इस भूभाग के जीवन को आकार दिया।समय बदला। औद्योगिक युग आया। पारंपरिक औजारों की जगह मशीनों ने लेनी शुरू की,लेकिन श्रम और कौशल की मूल चेतना समाप्त नहीं हुई, उसने नया रूप ग्रहण कर लिया। इसी परिवर्तन का एक बड़ा प्रतीक है मुंगेर का जमालपुर रेल कारखाना। जमालपुर की रेलवे कार्यशाला की स्थापना 1862 में हुई थी और विश्वकर्मा पूजा यहां की एक विशिष्ट औद्योगिक परंपरा बन गई। उपलब्ध स्थानीय अभिलेखीय और समाचार रिपोर्टों के अनुसार, जमालपुर रेल इंजन कारखाने में देश के अन्य हिस्सों से अलग 16 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा मनाने की परंपरा चली आ रही है। 2024 की रिपोर्टों में भी इस परंपरा के जारी रहने का उल्लेख है। यह तारीख अपने आप में जमालपुर की विशिष्ट पहचान बन चुकी है।जहां देश के अधिकांश हिस्सों में विश्वकर्मा पूजा सामान्यतः 17 सितंबर के आसपास मनाई जाती है, वहीं जमालपुर रेल कारखाने में 16 सितंबर की परंपरा पीढ़ियों से अंग्रेजों के समय से चली आ रही है। यह केवल पूजा की तारीख नहीं, बल्कि रेलवे की औद्योगिक विरासत और श्रम-संस्कृति की स्मृति है।


कभी विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर जमालपुर रेल कारखाना आम लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाता था। दूर-दराज से लोग मशीनों, रेल इंजनों और कार्यशाला की विशाल दुनिया को देखने आते थे। यह आयोजन कर्मचारियों और उनके परिवारों के साथ-साथ शहर के आम नागरिकों के लिए भी एक बड़े उत्सव का रूप ले लेता था। इस परंपरा में एक अद्भुत दृश्य दिखाई देता था,एक ओर धार्मिक आस्था, दूसरी ओर आधुनिक इंजीनियरिंग, एक ओर देवशिल्पी विश्वकर्मा की पूजा, दूसरी ओर लोहे, इस्पात, भट्ठियों, मशीनों और रेल तकनीक के बीच काम करते हजारों हाथ।यहीं विश्वकर्मा पूजा का वास्तविक अर्थ समझ में आता है। जिस औजार से निर्माण होता है, वह पूजनीय है। जिस मशीन से उत्पादन होता है, वह पूजनीय है। लेकिन उससे भी अधिक पूजनीय वह श्रम है, जो मशीन को चलाता है और उस निर्माण को संभव बनाता है। विश्वकर्मा की भारतीय अवधारणा इसलिए आधुनिक भारत में भी प्रासंगिक है। आज मशीनें पहले से अधिक जटिल हैं। रोबोटिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन और अत्याधुनिक इंजीनियरिंग ने उत्पादन की दुनिया बदल दी है। लेकिन किसी भी तकनीक के पीछे मनुष्य की कल्पना, बुद्धि और श्रम मौजूद है। विश्वकर्मा पूजा हमें इसी मानवीय शक्ति की याद दिलाती है।


यह पर्व इंजीनियर को सम्मान देता है, कारीगर को सम्मान देता है, लोहार को सम्मान देता है, बढ़ई को सम्मान देता है, मशीन ऑपरेटर को सम्मान देता है, तकनीशियन को सम्मान देता है और उस हर हाथ को सम्मान देता है जो किसी वस्तु को आकार देता है। भारतीय दर्शन में कर्म का अपना विशिष्ट महत्व है। कर्म केवल जीविका का साधन नहीं, आत्म-अभिव्यक्ति और साधना का माध्यम भी हो सकता है। इस दृष्टि से विश्वकर्मा पूजा कर्मयोग और शिल्प-साधना के बीच एक सांस्कृतिक सेतु का निर्माण करती है। देवघर की लोककथा में विश्वकर्मा एक रात में मंदिर बनाने वाले देवशिल्पी हैं। अंग की स्मृति में वे शिल्प और कर्म की चेतना के प्रतीक बनते हैं। और जमालपुर में वही विश्वकर्मा आधुनिक औद्योगिक भारत के लोहे और मशीनों के बीच दिखाई देते हैं। देवताओं के लिए नगर बनाने वाले विश्वकर्मा जब आधुनिक युग में स्मरण किए जाते है, तो उसके हाथ में केवल दिव्य हथौड़ा नहीं होता, वह मनुष्य की रचनात्मक क्षमता का प्रतीक बन जाते है।


आज विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर यदि हम केवल मशीनों पर फूल चढ़ाकर आगे बढ़ जाएं, तो पर्व का आधा अर्थ ही समझ पाएंगे। वास्तविक श्रद्धांजलि तब होगी जब हम श्रम की गरिमा को स्वीकार करेंगे, कारीगर के कौशल को सम्मान देंगे और तकनीकी शिक्षा तथा हुनर को समाज में प्रतिष्ठा देंगे क्योंकि किसी भी सभ्यता की ऊंचाई केवल उसके मंदिरों, महलों या कारखानों से नहीं मापी जाती। वह इस बात से भी मापी जाती है कि वह निर्माण करने वाले हाथों का कितना सम्मान करती है। देवघर का बैद्यनाथ धाम हमें आस्था और स्थापत्य के मिलन की कथा सुनाता है। अंग की धरती हमें कर्म और कौशल की पुरानी स्मृति से जोड़ती है। जमालपुर रेल कारखाना उस परंपरा का आधुनिक औद्योगिक रूप सामने रखता है। इन तीनों को एक साथ देखें तो विश्वकर्मा पूजा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं रह जाती। वह बन जाती है- सृजन का उत्सव, श्रम का सम्मान, कौशल का अभिनंदन और मनुष्य की रचनात्मक शक्ति को नमन। आज के दौर में यही विश्वकर्मा की सबसे बड़ी प्रासंगिकता है।  कुमार 

कृष्णन



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