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Bhopal नवरात्रि : शक्ति, समृद्धि और सनातन जागरण का महापर्व Navratri: The grand festival of power, prosperity and eternal awakening

 


Upgrade Jharkhand News.  शारदीय नवरात्रि भारतीय संस्कृति का वह पावन पर्व है, जिसमें शक्ति की आराधना के साथ आत्मशुद्धि, सदाचार और लोककल्याण का संकल्प जागृत होता है। यह केवल देवी के नौ स्वरूपों की उपासना नहीं, अपितु अपने अंतःकरण को निर्मल बनाने, दुर्गुणों पर विजय पाने और जीवन को धर्म, विवेक तथा करुणा से आलोकित करने का अवसर है। वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि का आरंभ रविवार, 11 अक्टूबर को घटस्थापना के साथ होगा और मंगलवार, 20 अक्टूबर को विजयादशमी का पर्व मनाया जाएगा। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा की तिथि 10 अक्टूबर की रात्रि में आरंभ होकर 11 अक्टूबर की रात्रि तक रहेगी। उदयकालीन तिथि के अनुसार नवरात्रि का प्रथम दिन 11 अक्टूबर माना गया है। प्रचलित धार्मिक मान्यता के अनुसार रविवार को नवरात्रि आरंभ होने पर भगवती दुर्गा का आगमन गज अर्थात् हाथी पर माना जाता है। देवी के प्रस्थान के वाहन के विषय में मंगलवार के आधार पर अश्व अथवा चरणायुध अर्थात् कुक्कुट का उल्लेख विभिन्न परंपराओं में मिलता है। इन मान्यताओं को पंचांग-परंपरा और धार्मिक प्रतीक विधान के रूप में समझना उचित है।


भारतीय सांस्कृतिक चेतना में गज सामर्थ्य, धैर्य, गंभीरता और गरिमा का प्रतीक है। गज पर विराजमान जगदम्बा की कल्पना हमें सिखाती है कि वास्तविक शक्ति आत्मसंयम में, वास्तविक वैभव लोकहित में और वास्तविक विजय अपने विकारों पर अधिकार प्राप्त करने में निहित है।गजलक्ष्मी की प्रतिमाओं में देवी लक्ष्मी के दोनों ओर जलाभिषेक करते गज ऐश्वर्य, मंगल और समृद्धि के प्रतीक हैं। इसी भावभूमि पर गजवाहिनी भगवती का आगमन जनमानस में शुभता और कल्याण की कामना जगाता है। इसका अर्थ माना जाता है कि धरती अन्न से परिपूर्ण हो, जलस्रोत समृद्ध हों, औषधियाँ पुष्ट हों और प्रत्येक परिवार में सुख-शांति का वास हो।समृद्धि की सार्थकता केवल कामना से नहीं, कर्तव्य से सिद्ध होती है। वर्षाजल का संचय, नदियों की निर्मलता, वनों की रक्षा, भूमि की उर्वरता और कृषक के श्रम का सम्मान हमारे सामूहिक उत्तरदायित्व हैं। गजागमन की मंगलभावना को लोकहित से जोड़ें, तो वह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और उसके संरक्षण का संकल्प बन जाती है। जिस धरती पर जल सुरक्षित हो, किसान सम्मानित हो और कोई भूखा न सोए, उसी धरती पर समृद्धि का वास्तविक उत्सव खिलता है।


मनुष्य का मन अपार सामर्थ्य का भंडार है। विवेक से निर्देशित होकर वही ज्ञान, सृजन और करुणा का स्रोत बनता है,अनियंत्रित होने पर वही लोभ, क्रोध, मोह और अहंकार का कारण बन जाता है। योगदर्शन में मन के निग्रह के लिए अभ्यास और वैराग्य का महत्व प्रतिपादित किया गया है। नवरात्रि की साधना इसी आत्मानुशासन का अवसर है। जप चित्त को एकाग्र करता है, ध्यान अंतर्मन के निरीक्षण की दृष्टि देता है और सेवा आत्मकेंद्रितता को परिष्कृत करती है। देवी के अंकुश को विवेक का प्रतीक मानें, तो उसका संदेश है,इच्छाओं पर मर्यादा हो, सामर्थ्य पर सद्बुद्धि का शासन हो और अधिकार के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा हो। क्रोध में धैर्य, विपत्ति में साहस, सफलता में विनम्रता और संपन्नता में उदारता ही साधना के वास्तविक आभूषण हैं। पुष्प भारतीय उपासना परंपरा में पवित्रता, सौंदर्य, कोमलता और समर्पण के प्रतीक हैं। नवरात्रि में पुष्पांजलि अर्पित करने का मर्म केवल देवी के चरणों में फूल चढ़ाना नहीं, बल्कि अपने अंतःकरण की श्रेष्ठ भावनाओं को भी समर्पित करना है। जिस प्रकार पुष्प अपनी सुगंध से परिवेश को सुरभित करता है, उसी प्रकार सदाचारी मनुष्य अपने व्यवहार से परिवार और समाज में माधुर्य भरता है।


मधुर वाणी, सत्यनिष्ठ आचरण, परस्पर सम्मान, क्षमाशीलता और परोपकार संबंधों की फुलवारी को हरा-भरा रखते हैं। पूजा में दीप प्रज्वलित करना तभी सार्थक है, जब हम किसी निराश व्यक्ति के जीवन में आशा जगाएँ; देवी को पुष्प अर्पित करना तभी पूर्ण है, जब हमारे व्यवहार में करुणा और विनम्रता भी पुष्पित हों। नवरात्रि के गरबा और डांडिया भारतीय लोकसंस्कृति की जीवंत अभिव्यक्तियाँ हैं। उनकी लय, ताल और सामूहिक सहभागिता अनुशासन, सहयोग तथा सहअस्तित्व का बोध कराती है। गरबा के केंद्र में प्रज्वलित दीप को अंतःप्रकाश का प्रतीक मानें, तो वह स्मरण कराता है कि संसार की चकाचौंध के बीच अपने अंतर्मन की ज्योति को सुरक्षित रखना आवश्यक है। संस्कृति का वास्तविक संरक्षण तभी होता है, जब उत्सव के साथ मर्यादा, सुरक्षा, सम्मान और आत्मीयता भी बनी रहे। देवी के प्रस्थान के वाहन से जुड़ी परंपराएँ हमें जीवन के विभिन्न पक्षों पर विचार करने का अवसर देती हैं। अश्व को गति, कर्मठता और तत्परता का प्रतीक माना जा सकता है, जबकि कुक्कुट को प्रभात के उद्घोषक के रूप में जागरण और नवप्रारंभ का प्रतीक समझा जा सकता है। इन प्रतीकों का जीवनोपयोगी संदेश है कि धैर्य के साथ कर्म, श्रद्धा के साथ विवेक और संकल्प के साथ परिश्रम आवश्यक हैं। केवल प्रार्थना करके कर्तव्य से विमुख हो जाना साधना नहीं, सच्ची साधना वह है, जो मनुष्य को अधिक सजग, कर्मशील और उत्तरदायी बनाए।


विजयादशमी हमें विजय का व्यापक अर्थ समझाती है। विजय केवल रणभूमि में प्राप्त सफलता नहीं, अपितु अहंकार पर संयम, अन्याय के विरुद्ध साहस और सत्य के प्रति अडिग निष्ठा भी है। भ्रष्टाचार, हिंसा, शोषण, भेदभाव और संवेदनहीनता जैसी सामाजिक बुराइयों का परिष्कार तभी संभव है, जब व्यक्ति अपने आचरण में ईमानदारी अपनाए और समाज न्याय, समानता तथा मानवीय गरिमा को महत्व दे। नारी का सम्मान, बालिका की शिक्षा, वृद्धजन की सेवा, श्रमिक के परिश्रम का उचित प्रतिफल, किसान की गरिमा और निर्धन के प्रति संवेदना,ये लोकमंगल के आधार हैं। देवी की शक्ति का सच्चा सम्मान तब प्रकट होता है, जब निर्बल को संबल, निराश को आशा, अशिक्षित को ज्ञान और पीड़ित को न्याय दिलाने में समाज सहभागी बनता है। इस नवरात्रि जल, वन, भूमि और जीव-जगत की रक्षा का संकल्प लें। परिवार में प्रेम और सम्मान बढ़ाएँ, वाणी में मधुरता रखें, जरूरतमंद की सहायता करें और प्रतिदिन आत्मचिंतन, स्वाध्याय तथा सद्कर्म के लिए समय निकालें। श्रद्धा जब कर्म बनती है, साधना जब संस्कार बनती है और सद्भाव जब लोकसेवा में परिणत होता है, तभी उपासना जीवन को सार्थक बनाती है।


आइए, इस शारदीय नवरात्रि अपने अंतःकरण को निर्मल बनाएँ। हमारी बुद्धि में विवेक, वाणी में माधुर्य, व्यवहार में करुणा, कर्म में निष्ठा और संकल्प में विश्वकल्याण का भाव जागृत हो। गज जैसी गंभीरता से अपने मूल्यों पर अडिग रहें, अश्व जैसी तत्परता से कर्तव्य निभाएँ, पुष्प जैसी कोमलता से संबंध सँवारें और दीपक की भाँति स्वयं प्रकाशमान होकर दूसरों के जीवन में आशा जगाएँ। देवी का वास्तविक स्वागत स्वर्णिम द्वारों से नहीं, निर्मल हृदय से होता है,उनकी सच्ची आराधना आडंबर से नहीं, सदाचार से होती है। शक्ति की उपासना तभी पूर्ण होती है, जब हमारा जीवन अपने सुख के साथ समस्त सृष्टि के कल्याण का भी साधन बने। यही नवरात्रि का आत्मबोध, सनातन संस्कृति की लोकमंगलकारी चेतना और मानवजीवन को सदाचार से आलोकित करने वाली शाश्वत प्रेरणा है। डॉ. दीपक गोस्वामी



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