Jamshedpur (Nagendra) एमजीएम अस्पताल में बायो-मेडिकल कचड़े के प्रबंधन की स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। झारखंड मानवाधिकार सम्मेलन-जेएचआरसी का एक प्रतिनिधिमंडल, संगठन के प्रमुख मनोज मिश्रा के नेतृत्व मे एमजीएम अस्पताल के बायो-मेडिकल कचरा स्थल का निरीक्षण किया, जहां बायो-मेडिकल वेस्ट के साथ आलू और सब्जियों के छिलके काले प्लास्टिक मे भर कर फेकते पाए गए । खुले आकाश में बिखरे कचरे के पास एक आवारा कुत्ता बायो-मेडिकल कचरे के प्लास्टिक से भरे थैले में मुंह लगाकर कुछ खाते हुए भी दिखाई दिया।
जेएचआरसी प्रमुख मनोज मिश्रा ने कहा कि यह स्थिति सामान्य लापरवाही का मामला नहीं है। 26 फरवरी 2026 को झारखंड हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देश का खुला उल्लंघन का है। मनोज मिश्रा ने कहा कि बायो-मेडिकल कचरे को नगर निकाय के सामान्य कचरे के साथ नहीं मिलाया जाए। इसकी निगरानी की जिम्मेदारी जिला उपायुक्त सहित संबंधित अधिकारियों को दी गई है तथा झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद को नियमित और औचक जांच के निर्देश भी दिए गए हैं। हाई कोर्ट के आदेश के सात माह बाद भी स्थिति जस की तस है। उन्होंने कहा कि बायो-मेडिकल कचरा मैनेजमेंट रूल्स -2016 के अनुसार बिना उपचारित बायो-मेडिकल कचरे को दूसरे कचरे के साथ मिलाना प्रतिबंधित है। कचरे को निकलने के स्थान पर ही निर्धारित रंगों के थैले अथवा पात्र में अलग करना और सुरक्षित स्थान पर रखना अनिवार्य है। मानव या पशु अंग जैसे कुछ श्रेणियों के बायो-मेडिकल कचरे को 48 घंटे से अधिक रखने की भी अनुमति नहीं है। जबकि एमजीएम अस्पताल मे लगे कचरे के अम्बार को देख कर यही लग रहा है कि यह कचरा कई दिनों से यहाँ पड़ा है।
विडंबना यह है कि जिस स्थान पर अलग-अलग कचरे के लिए रंगों के अनुसार रूम की व्यवस्था और कॉडिंग लिखें गए हैं, वहीं रूम के बाहर जमीन पर विभिन्न प्रकार के कचरे के थैले एक साथ बेतरतीब बिखरे पड़े मिले। जेएचआरसी ने सवाल उठाया कि जब नियम और व्यवस्था मौजूद हैं तो उनका पालन जमीन पर क्यों नहीं दिखाई दे रहा है? हाईकोर्ट ने 26 फरवरी के आदेश में कचरे की उत्पत्ति से लेकर संग्रह, परिवहन और उपचार तक बार-कोड एवं डिजिटल निगरानी, अधिकृत एजेंसी से उठाव तथा 30 से अधिक बिस्तरों वाले स्वास्थ्य संस्थानों में बायो-मेडिकल कचरा प्रबंधन समिति गठित करने के निर्देश भी दिए हैं। जिसका अनुपालन अब तक दृष्टवय नहीं है।
जेएचआरसी ने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश के लगभग सात महीने बाद भी यदि एमजीएम जैसे बड़े सरकारी अस्पताल में बायो-मेडिकल कचड़ा और सामान्य कचरा एक साथ मिलता है, तो यह जिला उपायुक्त, अस्पताल प्रबंधन और प्रदूषण नियंत्रण पर्षद की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। प्रतिनिधिमंडल ने अस्पताल अधीक्षक डाक्टर बलराम झा को ज्ञापन सौंपकर तत्काल मामले की जांच करने,कचरे का पृथक्करण, खुले में पड़े बायो-मेडिकल कचरे को हटाने तथा हाईकोर्ट के सभी निर्देशों का अक्षरशः पालन सुनिश्चित करने की मांग की। मनोज मिश्रा ने कहा कि बायो-मेडिकल कचरा केवल गंदगी नहीं, बल्कि संक्रमण और जनस्वास्थ्य से जुड़ा संवेदनशील एक पर्यावरण का विषय है। हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद यदि ऐसी तस्वीर सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी गंभीरता से जांच कर जवाबदेही तय करनी चाहिए।
प्रतिनिधि मंडल मे मनोज मिश्रा के साथ सलावत महतो, विश्वजीत सिंह, गुरूमुख सिंह, श्याम लाल, किशोर वर्मा, एस के बसु, देवाशीष दास एवं अन्य सदस्य शामिल थे। अधीक्षक को दिए ज्ञापन मे यह भी कहा गया है कि एक माह के भीतर यदि हाई कोर्ट के निर्देशों का अनुपालन नहीं किया गया तो सड़क से लेकर न्यायालय तक लड़ाई लड़ी जाएगी ।



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