Upgrade Jharkhand News. हनुमान जी का चरित्र केवल एक पौराणिक कथा नहीं है, बल्कि वह जीवन जीने की उस सर्वोच्च कला का दर्शन है, जहाँ शक्ति, भक्ति और विनम्रता का अद्भुत संगम होता है। शास्त्रों में कलयुग के विषय में कहा गया है कि इस युग में केवल प्रभु का नाम ही वह आधार है, जिसके सुमिरन मात्र से मनुष्य भवसागर को पार कर सकता है। इस सत्य को यदि किसी ने पूर्णतः आत्मसात किया, तो वे स्वयं हनुमान जी हैं। उन्होंने राम नाम के प्रताप को न केवल समझा, बल्कि उसे अपने अस्तित्व के रोम-रोम में बसा लिया, जिसके परिणामस्वरूप वे अजर-अमर हो गए। हनुमान जी का व्यक्तित्व हमें सिखाता है कि महानता बड़े-बड़े कार्य करने में नहीं, बल्कि उन कार्यों को करने के बाद मिलने वाले श्रेय का त्याग करने और निरंतर सेवा भाव में लीन रहने में है। उनके जीवन की यात्रा समर्पण की एक ऐसी मिसाल है जो हमें बुद्धि और विवेक के सही उपयोग का मार्ग दिखाती है।
हनुमान जी ने जब पहली बार भगवान श्री राम और लक्ष्मण को ऋष्यमूक पर्वत पर देखा, तो उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए सीधे आत्मसमर्पण नहीं किया। उन्होंने साधु का वेश धारण किया और पहले अपने होने वाले स्वामी को परखा। यह उनके विवेक की पराकाष्ठा थी कि वे सुनिश्चित करना चाहते थे कि क्या ये वही पुरुषोत्तम हैं जिनका संपूर्ण जगत प्रतीक्षा कर रहा है। लेकिन एक बार जब उन्हें विश्वास हो गया और उन्होंने श्री राम को अपना स्वामी स्वीकार कर लिया, तो उनके मन में कभी कोई संशय या प्रश्न नहीं उठा। यह 'अनन्य भक्ति' का वह स्तर है जहाँ भक्त और भगवान के बीच तर्क की दीवारें गिर जाती हैं और केवल अटूट विश्वास शेष रह जाता है। आज के समय में, जहाँ लोग हर कदम पर संदेह और स्वार्थ देखते हैं, हनुमान जी का यह समर्पण सिखाता है कि यदि लक्ष्य बड़ा हो और विश्वास गहरा, तो सफलता निश्चित है।
महान विजय और बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति कभी भी अहंकार से नहीं होती, बल्कि उसके लिए अपमान सहने की शक्ति और धैर्य की आवश्यकता होती है। हनुमान जी चाहते तो रावण की सभा में अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर क्षण भर में शत्रु का विनाश कर सकते थे। उनके पास संकल्प मंत्र की वह शक्ति थी जो किसी भी बाधा को समाप्त कर सकती थी, लेकिन उन्होंने एक बड़ी सिद्धि और प्रभु के कार्य की पूर्णता के लिए मेघनाद के प्रहारों को सहा, रावण के कटु वचनों को सुना और यहाँ तक कि लंकावासियों की लातें भी सहीं। ब्रह्मास्त्र के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए उन्होंने स्वयं को बंधनों में स्वीकार किया, जबकि वे उन बंधनों से मुक्त होने में पूरी तरह सक्षम थे। यह आचरण हमें सिखाता है कि जब बात धर्म की रक्षा और बड़े उद्देश्य की हो, तो व्यक्तिगत मान-अपमान से ऊपर उठकर कार्य करना ही सच्ची श्रेष्ठता है। विनम्रता का अर्थ कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी शक्ति पर इतना नियंत्रण होना है कि आप प्रतिकूल परिस्थितियों में भी विचलित न हों।
हनुमान जी की निस्वार्थता का कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। जो श्री राम त्रिलोकों के ऐश्वर्य को उपहार में देने की सामर्थ्य रखते थे, उनके द्वारा दी गई एक बहुमूल्य माला को हनुमान जी ने केवल इसलिए अस्वीकार कर दिया क्योंकि उसमें उनके आराध्य 'सीताराम' का वास नहीं था। यह उनके इसी भाव को प्रकट करता है कि संसार की सबसे कीमती वस्तु भी उनके लिए व्यर्थ है यदि उसमें प्रभु की चेतना न हो। उन्होंने सदैव सत्य का साथ दिया। जब बाली जैसा परम शक्तिशाली योद्धा एक तरफ था और सुग्रीव जैसा निर्बल मित्र दूसरी तरफ, तो हनुमान जी ने शक्ति के बजाय सत्य और न्याय का चुनाव किया। उनका वेग पवन के समान तीव्र था, लेकिन उनके व्यवहार में एक गंभीर ठहराव था। उनके पास इतना बल था कि वे तीनों लोकों को उठा सकें, लेकिन उनकी विनम्रता ऐसी थी कि वे सदैव प्रभु के चरणों में ही दास बनकर रहे। वे साक्षात शिव के अंश थे, फिर भी उनकी एक ही रट थी राम काज कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम।
यही वह निष्काम सेवा थी जिसके परिणामस्वरूप उन्हें माता जानकी से 'अष्ट सिद्धि और नवनिधि' के दाता होने का वरदान प्राप्त हुआ। माता ने उन्हें 'अजर अमर गुण निधि सुत' होने का आशीर्वाद दिया और प्रभु श्री राम ने स्वयं घोषणा की कि जब तक इस पृथ्वी पर राम कथा का अस्तित्व रहेगा, हनुमान जी का अस्तित्व बना रहेगा। हनुमान जी का जीवन हमें यह संदेश देता है कि यदि हम अपने भीतर के अहंकार को त्यागकर, अपने कौशल को किसी बड़े और सात्विक उद्देश्य के लिए समर्पित कर दें, तो हम भी उस अमरता और शांति को प्राप्त कर सकते हैं जिसकी खोज में पूरी मानवता भटक रही है। हनुमान जी का चरित्र बल, बुद्धि और विद्या का भंडार होते हुए भी 'भक्ति भाव' की महिमा को सिद्ध करता है। अंततः, उनकी भक्ति हमें यह सिखाती है कि जीवन का वास्तविक सुख पाने में नहीं, बल्कि स्वयं को खोकर परम तत्व को प्राप्त करने में है। जब हम अपने कर्मों का फल प्रभु को अर्पित कर देते हैं, तब हम बंधनों से मुक्त होकर उस परम पद के अधिकारी बन जाते हैं जहाँ केवल आनंद और संतोष का वास होता है। हनुमान जी का जीवन एक दैदीप्यमान शक्तिपुंज है जो कलयुग के अंधकार में भटकते हुए मनुष्यों को कर्म, संयम और अटूट विश्वास का मार्ग दिखाती है। डॉ. राघवेंद्र शर्मा

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