Jamshedpur (Nagendra) विश्व ऑटिज़्म जागरूकता दिवस के अवसर पर, टाटा स्टील फाउंडेशन ने सबल–ज्ञानोदय में एक संवेदनशील और समावेशी पहल का आयोजन किया, जिससे न्यूरोडाइवर्सिटी और बाल-केंद्रित शिक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया। पारंपरिक कार्यक्रमों के स्वरूप से अलग हटते हुए, फाउंडेशन ने “डे विदाउट डिमांड्स” नामक एक अनोखी पहल प्रस्तुत की—जो बच्चों की सहजता पर आधारित, उनकी जरूरतों के अनुरूप एक अनुभव है। इसका उद्देश्य ऐसा वातावरण तैयार करना है, जहाँ बच्चे किसी भी अपेक्षा, निर्देश या प्रदर्शन के दबाव से मुक्त होकर स्वाभाविक रूप से रह सकें। सबल–ज्ञानोदय में इस पहल के तहत माहौल को बच्चों की विविध संवेदी, भावनात्मक और संचार संबंधी जरूरतों के अनुरूप ढाला गया, न कि बच्चों से स्वयं को ढालने की अपेक्षा की गई।
परिचर्चा के लिए कक्ष को एक सहज, जमीन पर आराम से बैठने के लिए आरामदायक माहौल में परिवर्तित किया गया, जहाँ मैट, खेलने के लिए नरम खिलौने और खुले स्थान उपलब्ध कराए गए। इस व्यवस्था ने बच्चों को बैठने, लेटने, स्वतंत्र रूप से घूमने या सिर्फ देखने की पूरी स्वतंत्रता दी। साथ ही, हल्के वाद्य संगीत की निरंतर धुन ने एक शांत और संवेदीनशील माहौल बनाया, जिससे ऐसा वातावरण तैयार हुआ जो सिर्फ अनुपालन के बजाय बच्चों को अपनी भावनाओं और व्यवहार को संतुलित रखना सिखाता है। बच्चों को बिना किसी निर्देश, विषय या अपेक्षित परिणाम के कागज़, रंग और मिट्टी जैसे खुले एवं रचनात्मक संसाधन उपलब्ध कराए गए। अभिव्यक्ति को उसके हर रूप में स्वीकार किया गया, जिसमें गैर-मौखिक संचार, शांति से रहना, संवेदी अनुभव और स्वतंत्र रूप से जुड़ाव शामिल था। कम दबाव वाले सामाजिक संपर्क को बढ़ावा देने के लिए वैकल्पिक “बडी टाइम” की व्यवस्था की गई, जहाँ बच्चे बिना किसी संवाद या प्रदर्शन के दबाव के, एक साथ समय बिता सकते थे या सरल गतिविधियों में शामिल हो सकते थे।
“साथ रहना”, भले ही बिना बातचीत के, भी उतना ही महत्वपूर्ण और अर्थपूर्ण माना गया। दिन की गतिविधियाँ लचीले और संवेदनशील ढंग से संचालित की गईं, जिससे बच्चों को अपनी गति के अनुसार विभिन्न गतिविधियों के बीच सहज रूप से आने-जाने की स्वतंत्रता मिली। शिक्षकों ने निर्देश देने की पारंपरिक भूमिका से आगे बढ़कर सहायक और समझदार मार्गदर्शक की भूमिका निभाई। बच्चों के साथ बैठकर उन्होंने अवलोकन, सीमित संवाद और सह-नियमन पर ध्यान केंद्रित किया, ताकि हर बच्चे की गति और पसंद का सम्मान सुनिश्चित हो सके। बेचैनी या अलग-थलग रहने जैसे व्यवहारों को भी संचार के वैध रूप के रूप में समझा गया, और उनके प्रति प्रतिक्रिया सुरक्षा, सहानुभूति और सहयोग पर आधारित रही। अभिभावकों को भी इस अनुभव को देखने के लिए आमंत्रित किया गया, जिससे वे अपने बच्चों की सहजता के पैटर्न को बेहतर ढंग से समझ सकें और घर व स्कूल के वातावरण के बीच बेहतर सामंजस्य स्थापित हो सके।
इस अवसर पर अपने संबोधन में कैप्टन अमिताभ, हेड – स्किल डेवलपमेंट, डिसेबिलिटी एंड स्पोर्ट्स, टाटा स्टील फाउंडेशन ने कहा: “जब मैं सबल में बच्चों के साथ समय बिताता हूँ, तो मुझे यह एहसास होता है कि समावेशन का अर्थ यह नहीं है कि बच्चे हमारी व्यवस्थाओं के अनुसार खुद को ढालें, बल्कि यह है कि हम अपनी व्यवस्थाओं को उनकी जरूरतों के अनुसार ढालें। ‘डे विदाउट डिमांड्स’ इसी सोच से प्रेरित एक पहल है, जिसमें हमने जानबूझकर एक कदम पीछे लिया, अपेक्षाएँ कम कीं और बच्चों को अपनी शर्तों पर जुड़ने का अवसर दिया। इसका परिणाम यह रहा कि बच्चे अधिक शांत, आत्म-नियंत्रित और स्वाभाविक रूप से अपने तरीके से जुड़ते हुए नजर आए। टाटा स्टील फाउंडेशन में हम ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास करते हैं, जहाँ बच्चे बिना किसी दबाव के खुद को समझ सकें, अभिव्यक्त कर सकें और सहज रूप से रह सकें।”
सबल के माध्यम से टाटा स्टील फाउंडेशन लगातार ऐसे मार्ग विकसित कर रहा है, जो न्यूरोडाइवर्सिटी का सम्मान करते हैं और बच्चों को उनके स्वाभाविक तरीके से आगे बढ़ने और विकसित होने के अवसर प्रदान करते हैं।

No comments:
Post a Comment