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Bhopal आधुनिकता की चमक में खोते संस्कार और बिखरते परिवार Values ​​are lost and families are disintegrating in the glare of modernity.

 


Upgrade Jharkhand News. 

“धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी।

आपतकाल परखिए चारी॥”

रामचरितमानस की यह चौपाई आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी सदियों पहले थी। गोस्वामी तुलसीदास ने जीवन के चार महत्वपूर्ण आधार बताए हैं- धैर्य, धर्म, मित्र और जीवनसाथी। इनकी वास्तविक परीक्षा संकट के समय ही होती है। दुर्भाग्य से आज के समाज में सबसे अधिक कमी जिस गुण की दिखाई दे रही है, वह है धैर्य।         हम अपने बच्चों को श्रेष्ठ शिक्षा दिलाने, प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल बनाने, तकनीकी रूप से दक्ष बनाने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। हम चाहते हैं कि वे अच्छे पैकेज प्राप्त करें, बड़ी कंपनियों में काम करें और समाज में प्रतिष्ठित हों लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में हम अक्सर उन्हें जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संस्कार धैर्य, सहनशीलता और संबंधों को निभाने की कला सिखाना भूल जाते हैं,   आज परिवार न्यायालयों में आने वाले अधिकांश वैवाहिक विवादों में एक बात समान दिखाई देती है वह है छोटी-छोटी बातों पर समझौते की कमी। नई पीढ़ी त्वरित परिणामों की आदी हो चुकी है। मोबाइल पर एक क्लिक में सुविधा मिलने वाली दुनिया में रिश्तों को समय देना, दूसरे की भावनाओं को समझना और परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बैठाना कठिन होता जा रहा है। परिणामस्वरूप विवाह जैसे पवित्र बंधन भी थोड़े से मतभेदों में टूटने लगे हैं।


विवाह भारतीय संस्कृति में केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन माना गया है। यह एक सामाजिक और आध्यात्मिक संस्कार है, जिसका उद्देश्य केवल साथ रहना नहीं, बल्कि जीवन के सुख-दुःख में सहभागी बनना है। आज आधुनिकता की चमक-दमक में विवाह का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अनेक स्थानों पर विवाह एक सांस्कृतिक और पारिवारिक आयोजन से अधिक प्रदर्शन और मनोरंजन का माध्यम बनते जा रहे हैं। डेस्टिनेशन वेडिंग, प्री-वेडिंग शूट, भव्य मंच और सोशल मीडिया पर दिखावे की होड़ ने विवाह की मूल भावना को पीछे धकेल दिया है। रिश्तेदारों की सक्रिय भागीदारी, पारंपरिक रीति-रिवाजों का महत्व और परिवारों के बीच आत्मीयता का भाव धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। जहां कभी विवाह परिवार और समाज को जोड़ने का माध्यम था, वहीं अब कई बार वह कुछ दिनों का आयोजन बनकर रह जाता है।


यह कहना उचित नहीं होगा कि आधुनिकता ही सभी समस्याओं की जड़ है। समस्या आधुनिकता नहीं, बल्कि मूल्यों से दूरी की है। समय के साथ परंपराओं में परिवर्तन स्वाभाविक है, लेकिन यदि परिवर्तन के साथ धैर्य, सम्मान, त्याग और पारिवारिक जिम्मेदारियों की भावना भी कमजोर पड़ जाए, तो रिश्तों की नींव डगमगाने लगती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने बच्चों को केवल सफल पेशेवर बनने की शिक्षा न दें, बल्कि सफल जीवन जीने की शिक्षा भी दें। उन्हें यह समझाया जाए कि विवाह कोई अनुबंध नहीं, बल्कि विश्वास, समर्पण और धैर्य पर आधारित जीवन-यात्रा है। मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन हर मतभेद का समाधान अलगाव नहीं होता।परिवार समाज की सबसे छोटी और सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। यदि परिवार मजबूत होंगे तो समाज भी मजबूत होगा। इसलिए हमें अपने घरों में फिर से संवाद, संस्कार और धैर्य की संस्कृति को स्थापित करना होगा। विवाह को दिखावे का मंच बनाने के बजाय उसे पारिवारिक और सांस्कृतिक मूल्यों का उत्सव बनाना होगा।


रामायण की यह सीख आज भी हमारा मार्गदर्शन करती है कि संकट के समय धैर्य ही वह शक्ति है जो रिश्तों को टूटने से बचाती है। यदि हम आने वाली पीढ़ियों को यह एक संस्कार दे पाए, तो न केवल विवाह मजबूत होंगे बल्कि परिवारों की वह गरिमा भी बनी रहेगी जो भारतीय समाज की सबसे बड़ी पहचान रही है।  संदीप सिंह गहरवार



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