Upgrade Jharkhand News. हम अपने समय को सहज ही नया समय कह देते हैं। लेकिन केवल नया कह देने से उसकी प्रकृति समझ में नहीं आती। शायद यह नया कम, अलग समय अधिक है,और कुछ अर्थों में उल्टा समय भी। जिन शब्दों, मूल्यों और संबंधों के सहारे पिछली पीढ़ियाँ समाज को समझती थीं, वे तेजी से बदल रहे हैं। ज्ञान का अर्थ बदल रहा है, कौशल की माँग बदल रही है, तकनीक मनुष्य के जीवन में पहले से कहीं अधिक गहरे प्रवेश कर चुकी है और परंपरा को लेकर भी एक नया आग्रह दिखाई दे रहा है। इन सबके बीच सबसे बड़ा परिवर्तन मनुष्य की आकांक्षा में आया है। हम गांधी से जुड़े एक सुंदर प्रसंग को अक्सर याद करते हैं। उनके सामने कोई व्यक्ति चाय की ट्रे लेकर आता है और गांधी स्वयं उसके हाथ से ट्रे ले लेते हैं। इस प्रसंग में मनुष्य की गरिमा और बराबरी का एक नैतिक संदेश निहित है। लेकिन यदि उसी प्रसंग को आज के समय में रखा जाए तो तस्वीर कुछ और दिखाई देगी। जिसके हाथ में कभी ट्रे थी, उसके बेटे के हाथ में आज स्मार्टफोन है। उसे दुनिया के बारे में उतनी ही सूचना उपलब्ध है जितनी किसी संपन्न परिवार के बच्चे को। वह केवल सम्मान नहीं चाहता,वह अवसर चाहता है, बराबरी चाहता है, सफलता चाहता है, सत्ता और प्रतिष्ठा में हिस्सा चाहता है।
यह परिवर्तन छोटा नहीं है। आधुनिक समाज ने मनुष्य को आकांक्षा दी है। बाजार ने उसे उपभोग के असंख्य स्वप्न दिए हैं। शिक्षा ने उसे ऊपर उठने का भरोसा दिया है। लोकतंत्र ने उसे बराबरी का वादा दिया है। डिजिटल दुनिया ने उसे यह दिखा दिया है कि दूसरे लोग किस तरह का जीवन जी रहे हैं। लेकिन इन आकांक्षाओं के अनुपात में अवसरों का विस्तार नहीं हुआ। यहीं हमारे समय की बेचैनी का बड़ा स्रोत है। आज लाखों-करोड़ों युवा ऐसे हैं जिनके पास डिग्री है, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं,शिक्षा है, लेकिन रोजगार नहीं, रोजगार है तो सुरक्षा नहीं और यदि कुछ उपलब्ध भी है तो उसके सामने आकांक्षा का संसार कहीं बड़ा है। इस अंतर ने एक ऐसा असंतोष पैदा किया है जिसे केवल नैतिक उपदेश से शांत नहीं किया जा सकता। राजनीति इस असंतोष को पहचानती है। इसलिए वह ऐसे वादे करती है जिन्हें कोई शिक्षक, इतिहासकार या गंभीर चिंतक करने का साहस नहीं कर सकता। सबको रोजगार मिलेगा, सबको बेहतर भविष्य मिलेगा, हर आकांक्षा पूरी होगी,राजनीति यह कह सकती है। लेकिन समाज का गंभीर अध्येता जानता है कि कोई भी व्यवस्था हर इच्छा को पूरा नहीं कर सकती। इसीलिए हमारे समय का संकट केवल आर्थिक नहीं है, यह आकांक्षा और यथार्थ के बीच बढ़ती दूरी का संकट भी है।
यहीं गांधी हमारे सामने फिर से उपस्थित होते हैं। लेकिन जिस गांधी को हमने स्मारकों, तस्वीरों और औपचारिक श्रद्धांजलियों में सुरक्षित कर लिया है, वह इस संकट को समझने में बहुत मदद नहीं करेगा। गांधी को हमने जरूरत से अधिक बाबा बना दिया है। एक शांत, नैतिक और उपदेश देने वाला व्यक्तित्व। इस छवि में वह बेचैन, प्रयोगधर्मी और कभी-कभी बेहद कठोर गांधी लगभग गायब हो गया है जो अपने समय की सभ्यता को ही कठघरे में खड़ा कर देता था। गांधी की असहमति केवल ब्रिटिश शासन से नहीं थी। वे उस सभ्यता से भी असहमत थे जिसमें प्रगति का अर्थ निरंतर अधिक उत्पादन, अधिक उपभोग, अधिक गति और अधिक इच्छाएँ बनता जा रहा था। हिंद स्वराज में आधुनिक सभ्यता की उनकी आलोचना कई बार अतिरंजित लग सकती है, लेकिन उनके मूल प्रश्न को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। क्या प्रगति मनुष्य को अधिक स्वतंत्र बना रही है, या वह नई निर्भरताएँ पैदा कर रही है? कृत्रिम बुद्धिमत्ता, एल्गोरिद्म, डिजिटल प्लेटफॉर्म और स्वचालन ने हमारे जीवन को असाधारण रूप से सुविधाजनक बनाया है। लेकिन उसी अनुपात में हम मशीनों, नेटवर्क और डेटा-व्यवस्थाओं पर निर्भर भी हुए हैं। हम तकनीक का उपयोग करते हैं, पर धीरे-धीरे तकनीक हमारे समय, हमारी पसंद, हमारी स्मृति और यहाँ तक कि हमारे ध्यान को भी संचालित करने लगती है। इसलिए तकनीक के बारे में गांधीवादी प्रश्न बहुत सीधा हो सकता है कि "तकनीक तुम्हें अधिक स्वाधीन बना रही है या अधिक निर्भर?"
इसी संदर्भ में ज्ञान और कौशल की वर्तमान बहस को भी देखना चाहिए। आज विश्वविद्यालयों से लगातार कहा जा रहा है कि वे रोजगारोन्मुख बनें, विद्यार्थियों को कौशल दें और बाजार की जरूरतों के अनुरूप शिक्षा तैयार करें। यह माँग अपने आप में गलत नहीं है। शिक्षा का जीवन से संबंध होना चाहिए। लेकिन यदि विश्वविद्यालय का अर्थ केवल कौशल-प्रशिक्षण रह जाए, तो हम शिक्षा की बड़ी भूमिका खो देंगे। कौशल हमें बताता है कि कोई काम कैसे किया जाए। ज्ञान हमें यह पूछना सिखाता है कि वह काम क्यों किया जाए, किसके लिए किया जाए और उसके सामाजिक परिणाम क्या होंगे। कौशल किसी मशीन को संचालित करना सिखा सकता है,इतिहास और दर्शन हमें यह समझने में सहायता करते हैं कि उस मशीन से बनने वाली दुनिया कैसी होगी। यदि विश्वविद्यालय केवल बाजार के लिए प्रशिक्षित मनुष्य तैयार करने लगें तो वे नागरिक नहीं, केवल कुशल श्रमिक तैयार करेंगे इसलिए ज्ञान और कौशल को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना उचित नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब कौशल को ज्ञान का विकल्प समझ लिया जाता है।
गांधी के चिंतन को समझने के लिए 1922 से 1927 का समय विशेष रूप से उल्लेखनीय है। चौरी-चौरा की घटना के बाद असहयोग आंदोलन वापस लेने का उनका निर्णय राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत जोखिमपूर्ण था। उनके अनेक सहयोगी नाराज़ हुए, देश के भीतर निराशा फैली और गांधी की आलोचना भी हुई। लेकिन इस घटना ने उन्हें एक मूल प्रश्न की ओर लौटाया कि क्या केवल आक्रोश किसी समाज को स्वतंत्र बना सकता है?
गांधी का उत्तर था-नहीं - क्रोध आवश्यक हो सकता है। अन्याय के प्रति असंतोष भी आवश्यक है। लेकिन क्रोध अपने आप में कोई दिशा नहीं देता। वह परिवर्तन की शक्ति बन सकता है और विनाश की शक्ति भी। इसलिए गांधी ने राजनीतिक आंदोलन के साथ रचनात्मक कार्यक्रमों पर बल देना शुरू किया। खादी, ग्रामकार्य, अस्पृश्यता-विरोध, शिक्षा, श्रम और आत्मानुशासन उनके लिए राजनीति से बाहर की गतिविधियाँ नहीं थीं। वे स्वतंत्रता की सामाजिक तैयारी थे। यहाँ गांधी की राजनीति का वह पक्ष दिखाई देता है जिसे हमने सबसे अधिक भुलाया है। गांधी केवल यह नहीं पूछते थे कि अंग्रेज कब जाएँगे। वे यह भी पूछते थे कि अंग्रेजों के जाने के बाद हम क्या करेंगे। यदि सत्ता का हस्तांतरण हो जाए, लेकिन समाज की हिंसा, जातीय अहंकार, लालच, असमानता और सत्ता-लिप्सा जस की तस बनी रहे, तो स्वतंत्रता का अर्थ कितना बचेगा? इसी प्रश्न को आज की युवा राजनीति पर भी लागू किया जा सकता है। जिस पीढ़ी को आज जेन-ज़ी कहा जा रहा है, उसके भीतर एक गहरी बेचैनी है। दुनिया के अनेक हिस्सों में युवा स्थापित संस्थाओं पर अविश्वास कर रहे हैं। वे भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, असमानता और राजनीतिक जड़ता के विरुद्ध आवाज उठा रहे हैं। इस आक्रोश को केवल अपरिपक्वता कहकर खारिज करना गलत होगा। इसके पीछे वास्तविक सामाजिक और आर्थिक संकट हैं।
लेकिन यहाँ भी गांधी का प्रश्न सामने आता है कि क्रोध के बाद क्या? - क्रोध से प्रतिरोध पैदा होता है। प्रतिरोध सत्ता को चुनौती दे सकता है। सरकारें बदल सकती हैं, नीतियाँ बदल सकती हैं, व्यवस्थाएँ हिल सकती हैं। लेकिन प्रतिरोध के बाद यदि कोई रचनात्मक सामाजिक स्वप्न नहीं है तो परिवर्तन बहुत जल्दी एक नए सत्ता-संघर्ष में बदल सकता है। इसलिए हमारे समय का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न शायद यही हैकि विरोध की ऊर्जा को निर्माण की शक्ति में कैसे बदला जाए? गांधी के आंदोलन और निर्माण एक-दूसरे से अलग नहीं थे। सत्याग्रह सत्ता को चुनौती देता था,रचनात्मक कार्यक्रम समाज के भीतर परिवर्तन की जमीन तैयार करता था। आज यदि किसी आंदोलन के पास केवल असहमति है, लेकिन शिक्षा, अर्थव्यवस्था, सामाजिक संबंध, पर्यावरण, नागरिकता और नैतिकता की कोई सकारात्मक कल्पना नहीं है, तो उसका भविष्य सीमित होगा। गांधी की अपनी त्रासदी भी यहीं थी। उनके बहुत-से अनुयायियों ने उनके राजनीतिक नेतृत्व को स्वीकार किया, लेकिन उनके सामाजिक स्वप्न को नहीं। स्वतंत्रता के संघर्ष में गांधी की जनसंगठन की क्षमता अत्यंत उपयोगी थी, लेकिन सत्ता के हस्तांतरण के बाद उनकी ग्राम-केंद्रित अर्थव्यवस्था, नैतिक राजनीति, सीमित उपभोग और विकेंद्रीकृत समाज की कल्पना मुख्यधारा से बाहर होती गई।
गांधी के अंतिम वर्षों की पीड़ा को इसी संदर्भ में समझना चाहिए। जब वे कहते हैं कि अब उनकी कोई नहीं सुनता, तो वह केवल व्यक्तिगत उदासी नहीं है। वह एक गहरे ऐतिहासिक विरोधाभास का बयान है। जिन लोगों ने उनके नेतृत्व में स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी, उन्हीं की राजनीति अब एक ऐसे भारत के निर्माण की ओर बढ़ रही थी जो गांधी की कल्पना से काफी अलग था। इसलिए गांधी को केवल ‘राष्ट्रपिता’ के रूप में स्मरण करना पर्याप्त नहीं है। गांधी को असुविधाजनक प्रश्न पूछने वाले चिंतक के रूप में पढ़ना होगा। यही बात परंपरा पर भी लागू होती है। हमारे समय में भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और सभ्यतागत गौरव की चर्चा बहुत बढ़ी है। इसमें बहुत कुछ मूल्यवान है। लंबे औपनिवेशिक अनुभव ने भारतीय समाज को अपने अतीत से कई प्रकार की दूरी दी थी। उसे फिर से पढ़ना आवश्यक है। लेकिन परंपरा का अर्थ केवल संरक्षण नहीं हो सकता। परंपरा कोई संदूक नहीं है। उसे बंद कर सुरक्षित रख देने से वह जीवित नहीं रहती। परंपरा का जीवन संवाद में है। प्रत्येक पीढ़ी अपने समय के प्रश्नों के साथ परंपरा के पास जाती है। कुछ स्वीकार करती है, कुछ अस्वीकार करती है, कुछ की पुनर्व्याख्या करती है। यही परंपरा का स्वभाव है।
यदि हम केवल यह कहते रहें कि हमारी परंपरा महान है, तो हम उससे सीख नहीं रहे, हम केवल उसकी पूजा कर रहे हैं। जीवित परंपरा वह है जो वर्तमान के प्रश्नों का सामना कर सके। स्त्री की स्वतंत्रता, जातिगत समानता, लोकतंत्र, विज्ञान, पर्यावरण, तकनीक और आर्थिक न्याय जैसे प्रश्नों के सामने हमें अपनी परंपराओं को भी परखना होगा। गांधी स्वयं परंपरा के साथ ऐसा ही व्यवहार करते थे। वे परंपरा को अस्वीकार नहीं करते थे, लेकिन उसके भीतर सुधार और पुनर्व्याख्या की निरंतर गुंजाइश देखते थे। इसलिए गांधी का सबसे उपयोगी पाठ शायद यही है कि परंपरा को बचाने से अधिक जरूरी है उससे संवाद करना। यही प्रश्न हमारे विश्वविद्यालयों पर भी लागू होता है। हम अक्सर उनकी दुर्दशा के लिए सरकार, व्यवस्था और धन की कमी को जिम्मेदार ठहराते हैं। इसमें बहुत सचाई है। लेकिन क्या पूरी जिम्मेदारी बाहर की है? शिक्षक, विद्यार्थी और विश्वविद्यालय समुदाय स्वयं अपने संस्थानों के लिए कितना करते हैं? हम उपलब्ध संसाधनों का कितना उपयोग करते हैं? पुस्तकालय कितने जीवित हैं? हम अपने विद्यार्थियों को कितना समय देते हैं? हम कितनी नई बौद्धिक गतिविधियाँ स्वयं शुरू करते हैं?
हर विफलता का उत्तर ‘फंड नहीं है’ नहीं हो सकता। गांधी का प्रश्न यहाँ भी असुविधाजनक होगा,जो तुम्हारे हाथ में है, उसका तुमने क्या किया? यहीं से नैतिक उत्तरदायित्व शुरू होता है।हमारे समय की एक और समस्या सत्य से जुड़ी हुई है। डिजिटल युग में किसी विचार की शक्ति इस बात से मापी जाने लगी है कि वह कितना वायरल हुआ। लेकिन वायरल होना और सत्य होना एक ही बात नहीं है। कोई झूठ लाखों लोगों तक पहुँच सकता है और कोई कठिन सत्य बहुत कम लोगों तक इसलिए आज का नैतिक प्रश्न यह भी है कि हम सत्य के साथ खड़े होंगे या लोकप्रियता के साथ? गांधी की राजनीति में सत्य केवल दार्शनिक अवधारणा नहीं था। वह सार्वजनिक आचरण की कसौटी था। वे जानते थे कि बहुमत हमेशा सही नहीं होता, लोकप्रियता हमेशा नैतिक नहीं होती और प्रगति हमेशा मानवीय नहीं होती। लगभग एक शताब्दी पहले गांधी सिलोन गए थे। आज दुनिया उस समय से बहुत आगे आ चुकी है। चरखे की जगह स्मार्टफोन है। सार्वजनिक सभा के साथ डिजिटल नेटवर्क है। औपनिवेशिक शासन की जगह वैश्विक पूँजी, एल्गोरिद्म, प्लेटफॉर्म और नई आर्थिक शक्तियाँ हैं। लेकिन गांधी के कुछ प्रश्न अब भी हमारे सामने हैं।
ज्ञान किसका है? कौशल किसके काम आता है? तकनीक हमें स्वतंत्र बनाती है या निर्भर? परंपरा को कौन परिभाषित करता है? और सबसे बढ़कर,विरोध की ऊर्जा को निर्माण की शक्ति में कैसे बदला जाए? शायद गांधी की समकालीन प्रासंगिकता इन्हीं प्रश्नों में है। गांधी को वापस लाने का अर्थ उनकी पूजा करना नहीं है। उनसे असहमत होना भी गांधी परंपरा का हिस्सा है। उनके विचारों की सीमाएँ थीं, उनके प्रयोगों में विरोधाभास थे और उनके अनेक निष्कर्षों को आज स्वीकार नहीं किया जा सकता। लेकिन उनका आग्रह कि राजनीति को नैतिकता, समाज-निर्माण और आत्मालोचना से अलग नहीं किया जा सकता,आज भी हमारे लिए चुनौती है। हमारे समय को केवल क्रोध की जरूरत नहीं है। प्रतिरोध की भी जरूरत है, लेकिन प्रतिरोध पर्याप्त नहीं है। क्रोध से प्रतिरोध और प्रतिरोध से निर्माण की ओर बढ़ना होगा। शायद हमारे समय का गांधी यहीं से शुरू होता है। हितेन्द्र पटेल

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