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Bhopal दृष्टिकोण -अभिव्यक्ति की मर्यादा और संवैधानिक पदों का सम्मान Viewpoint: Dignity of expression and respect for constitutional posts

 


Upgrade Jharkhand News.  लोकतंत्र में अभिव्यक्ति का अधिकार सभी को है, किन्तु अभिव्यक्ति भी मर्यादित सीमा में होनी चाहिए। यदि अभिव्यक्ति के नाम पर किसी भी व्यक्ति को मनमाना आचरण करने की छूट मिलती है, तो यह स्थिति लोकतंत्र के लिए घातक ही सिद्ध होगी। कौन नहीं जानता कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवैधानिक पदों का सम्मान अपेक्षित होता है। लोकतंत्र में नियमों, उपनियमों, प्रावधानों के प्रति सहमति अथवा असहमति होना स्वाभाविक है, जिसके चलते न्यायिक प्रक्रिया अपनाकर न्याय की अपेक्षा की जा सकती है, किन्तु यदि किसी भी असहमति पर संवैधानिक पदों पर दायित्व निर्वहन करने वाले व्यक्तियों पर व्यक्तिगत लांछन लगाकर कोई भी व्यक्ति या दल त्यागपत्र की मांग करने लगे, तब देश में अराजकता का वातावरण उत्पन्न न हो, ऐसा संभव नहीं है। 


विगत दिनों नीट परीक्षा के संपन्न होने के उपरांत भी जिस प्रकार से सत्ता से बेदखल हो चुके लोगों ने नए रूप में देश के शिक्षा मंत्री को त्यागपत्र देने के लिए विवश किया, उससे जहाँ सत्ता की किरकिरी हुई, वहीं आंदोलन का चेहरा बने कतिपय लोगों को यह गलतफहमी हो गई, कि वह देश की सर्वोच्च न्याय व्यवस्था से भी ऊपर हैं तथा अपने मनचाहे आरोपों के आधार पर देश के संवैधानिक शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों को अपमानित कर सकते हैं। यदि ऐसा न होता, तो देश के विभिन्न हिस्सों में लोकतांत्रिक चुनावों में हार का ठीकरा देश के मुख्य चुनाव आयुक्त पर फोड़ने का दुस्साहस न करते। वस्तुस्थिति यह है, कि चुनावी पारदर्शिता में सभी राजनीतिक दलों के सम्मुख मतदाता सूचियां रहती है, तथा चुनाव संचालन में ईवीएम सहित अन्य उपकरणों का प्रयोग राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के सम्मुख करके चुनाव संपन्न कराए जाते हैं, ऐसी स्थिति में चुनाव हार जाने के उपरांत राजनीतिक दल चुनाव आयोग को दोषी ठहराने में विलंब नहीं करते। जिन राज्यों में विरोधी राजनीतिक दल विजय का परचम फहराते हैं, वहां चुप्पी साध जाते हैं और हार होने पर हार का मंथन करने के स्थान पर सीधे सीधे चुनाव आयोग पर प्रहार करने लगते हैं। यह दोहरा आचरण निसंदेह स्वीकार योग्य नहीं होना चाहिए। 


कौन नहीं जानता कि स्वस्थ लोकतंत्र में पारदर्शिता अनिवार्य होती है, जिसके लिए मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण कर मृत अथवा फर्जी मतदाताओं की पहचान कर उनके नाम मतदाता सूचियों से काटकर नए मतदाताओं के नाम सूची में जोड़ना चुनाव आयोग के कार्यों में सम्मिलित है। ऐसे में जनविश्वास अर्जित करने के स्थान पर यदि कतिपय राजनीतिक दल केवल आरोपों के आधार पर संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को बलि का बकरा बनाने का दुस्साहस करते हैं, तब इस समस्या की जड़ तलाश कर व्यापक स्तर पर चिंतन अनिवार्य है, ताकि देश में स्वस्थ लोकतंत्र पर आंच न आए। डॉ. सुधाकर आशावादी



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